जोगिन्दर नगर के ऐहजू में 500 वर्ग मीटर क्षेत्र में स्थापित किया है हाईड्रोपोनिक्स पॉलीहाउस
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥ (श्रीमद् भगवद्गीता)
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Wednesday, 16 March 2022
कॉर्पोरेट सेक्टर की नौकरी छोड़, हाईड्रोपोनिक्स खेती से 50 हजार महीना कमा रहे नवीन शर्मा
Sunday, 20 February 2022
तीन नदियों का पवित्र संगम स्थल है त्रिवेणी महादेव
जोगिन्दर नगर उपमंडल मुख्यालय से लगभग 45 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है पवित्र धार्मिक स्थान त्रिवेणी महादेव। तीन नदियों ब्यास, बिनवा तथा गुप्त गंगा (क्षीर गंगा) के मिलन स्थल को ही त्रिवेणी महादेव के नाम से जाना जाता है। यहां पर जो शिवलिंग स्थापित है वो स्वयंभू शिवलिंग है जो अपने आप धरती से निकला है। हमारे पुराणों में एवं सनातन धर्मशास्त्रों में इसकी बड़ी व्याख्या की गई है। माना जाता है कि इस पवित्र स्थान का इतिहास लगभग तीन सौ वर्ष से अधिक पुराना है।
त्रिवेणी महादेव मंदिर का इतिहास
इस पवित्र धार्मिक स्थान से जुड़े इतिहास की चर्चा करें तो माना जाता है कि आज से करीब तीन सौ वर्ष पहले मण्डी रियासत के वजीर कर्म सिंह के कोई सन्तान नहीं थी जिसके लिए उन्होंने कई यज्ञ व अनुष्ठान किए। इसके पश्चात् उन्हें स्वपन में आदेश हुआ कि बैजनाथ से नीचे जहां पर ब्यास नदी व बिनवा नदी मिलती है उस स्थान पर जाइए। उसी संगम स्थल के ऊपर एक गुुफा है जिसमें एक महात्मा जी रहते हैं, वे महात्मा जी ही आपको सन्तान दे सकते हैं। वजीर अपने कर्मचारियों को साथ लेकर गुुुुफा में पहुंचे तथा महात्मा जी के दर्शन करके उनसे सन्तान प्राप्ति के लिए प्रार्थना की। महात्मा जी ने उन्हें साफ इन्कार कर दिया कि तुम्हारा पिछला जन्म जो था वह अच्छा नहीं था, इसलिए तुम्हें सन्तान प्राप्ति नहीं होगी। मगर वजीर को पूर्ण विश्वास था कि महात्मा जी के आशीर्वाद से सन्तान प्राप्ति हो सकती है।तब वजीर अपने कर्मचारियों के साथ उसी गुुफा के सामने एक तंबू लगाकर बैठ गये। उस जमाने में वजीरों का बहुत बोलबाला होता था, जिसकी वजह से दूर-दूर गांव से लोग आने लगे। इसी प्रकार जब सात-आठ दिन बीत गये तो महात्मा जी गुफा से निकले और वजीर से बोले कि तुम यहां पर इतना शोरगुल क्यों कर रहे हो? मेरी साधना में बाधा हो रही है। वजीर महात्मा जी से प्रार्थना की कि महाराज जी आपके आशीर्वाद से ही मुझे सन्तान प्राप्ति होगी, यह मुझे पूर्ण विश्वास है। महात्मा जी बोले ठीक है आपको सन्तान प्राप्ति होगी या नहीं यह मैं कल सुबह बताउंगा।
इसके पश्चात जब दूसरे दिन महात्मा जी गुफा से बाहर निकले तो वजीर ने जाकर उन्हें प्रणाम किया तब महात्मा जी ने उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहा कि मैं तुम्हें दो सन्तान प्राप्ति के लिए अशीर्वाद देता हूँ। मगर भगवान स्वयं यहां प्रकट होना चाहते हैं। उनके लिए दिव्य मंदिर यहां पर बनाना होगा। वजीर के पास धन की कोई कमी नहीं थी, उन्होनें उसी समय राजमहल में आदमी भेजकर उस जमाने के चान्दी के सवा लाख सिक्के मंगवाकर महात्मा जी के चरणों में रख दिये और महात्मा जी से आग्रह किया कि आप मंदिर बनाइये व सन्तान प्राप्ति का आशीर्वाद दीजिए। वर्तमान में जिस स्थान पर शिवजी का मंदिर है उस स्थान पर पुराने वक्त में ब्यास नदी का स्वरूप अत्यंत भयंकर होता था। ऐसे में एक तरफ ब्यास नदी तो दूसरी तरफ पहाड़ होने से वहां पर मंदिर का निर्माण करना मुश्किल था। ऐसा देखते हुए लोग जब आगे बढ़े तब उन्हें नजऱ आया कि नीचे नदी किनारे एक काली गाय खड़ी है। उसके स्तनों से दूध अपने आप बह रहा था। वह गाय ब्यास नदी तैर कर आई हुई थी। तब महात्मा जी बोले कि भगवान यहीं पर होंगे, जब वहां से मिट्टी हटाई तो जो शिवलिंग अभी मंदिर में है उसके दर्शन हुए। तब महात्मा जी ने वहां पर मन्दिर का काम शुरू करवाया। आज जितनी चिनाई करते कल वह शिवलिंग उतना ही ऊपर आ जाता। यह सारा वृतांत देखकर महात्मा जी बड़े आश्चर्य चकित हुए और उन्होंने वहां पर एक हवन यज्ञ किया। हवन होने के पश्चात् महात्मा जी को भारी जनसमूह के सामने भविष्यवाणी हुई कि जब तक मैं स्थिर न हो जाऊं तब तक मंदिर का निर्माण नहीं करना। इसी प्रकार चिनाई के साथ साथ शिवलिंग भी ऊपर आता गया। शिवलिंग के स्थिर होने के बाद मंदिर का निर्माण किया गया।एक साल बाद वजीर के घर जो लडक़ा हुआ उसके पांच साल के होने तक मंदिर बनकर तैयार हो गया। बाद में उसी लडक़े से मंदिर की प्रतिष्ठा कराई गई। मन्दिर के एक तरफ ब्यास नदी, दूसरी तरफ बिनवा नदी तथा शिवलिंग के नीचे से एक गुप्त गंगा (क्षीर गंगा) बहती है। जिसका पानी गंगा नदी की तरह ही पवित्र माना जाता है। इन्हीं तीन नदियों के संगम के कारण इस मंदिर का नाम त्रिवेणी महादेव पडा़। शिखर मण्डलीय शैली में बना यह भव्य एवं प्राचीन मन्दिर नींव से लगभग 50 फुट ऊंचाई पर बना हुआ है।
वर्तमान में मुख्य मंदिर के आसपास दूसरे छोटे मंदिर भी स्थापित किये गए हैं जिनमें श्री गणेज जी, हनुमान जी, शनि महाराज, मां बगुलामुखी, बाबा बालक नाथ, राधा-कृष्ण मंदिर, नवग्रह, देवी शक्ति इत्यादि शामिल हैं। श्रद्धालु प्राचीन गुफा के भी दर्शन कर सकते हैं जो मुख्य मंदिर से महज 100 या 150 मीटर की दूरी पर है। इस मंदिर का संचालन मंदिर प्रबंधन समिति द्वारा किया जा रहा है। महाशिवरात्रि पर्व के अवसर पर यहां पर भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है।
प्राकृतिक सौंदर्य की दृष्टि से भी कम खूबसूरत नहीं है यह स्थान
धार्मिक महत्व के साथ-साथ प्राकृतिक सौंदर्य की दृष्टि से भी यह स्थान कम खूबसूरत नहीं है। इस स्थान पर जहां ब्यास, बिनवा व क्षीर गंगा का अनूठा संगम देखते ही बनता है तो वहीं यहां का शांत वातावरण एवं नदियों की कल-कल बहती धाराओं की गूंज मन को एक आलौकिक सुकून भी प्रदान करती हैं। ध्यान साधना की दृष्टि से भी यह स्थान महत्वपूर्ण है।कैसे पहुंचें त्रिवेणी महादेव
इस पवित्र धार्मिक स्थान के दर्शन करने के लिए श्रद्धालु जोगिन्दर नगर से लडभड़ोल होते हुए सडक़ मार्ग से इस पवित्र स्थान तक आसानी से पहुंच सकते हैं। यह पवित्र स्थान जोगिन्दर नगर उपमंडल के अंतर्गत ग्राम पंचायत उटपुर के गांव घटोड में स्थित है। प्रसिद्ध धार्मिक स्थान बैजनाथ से यहां की दूरी लगभग 35 किलोमीटर है। इसके अलावा श्रद्धालु संधोल से होकर बैरी गांव तक सडक़ मार्ग से आ सकते हैं। यहां से झूला पुल के माध्यम से वे त्रिवेणी महादेव के दर्शन कर सकते हैं। इसके अलावा कांगडा जिला के जयसिंहपुर, हारसीपतन होते हुए सरीमोलग से भी इस पवित्र स्थान तक पहुंचा जा सकता है। यहां से सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन बैजनाथ-पपरोला ही है जबकि नजदीकी हवाई अड्डा कांगडा है।
Friday, 18 February 2022
द्वापर काल से जोड़ा जाता है श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर नेर का इतिहास
जोगिन्दर नगर उपमंडल के अंतर्गत ग्राम पंचायत नेर घरवासड़ा के गांव नेर में भगवान श्री लक्ष्मी नारायण का प्राचीन मंदिर स्थापित है। इस मंदिर के इतिहास को द्वापर काल में भगवान श्री विष्णु की तपस्या से भी जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि गांव नेर में द्वापर काल में भगवान श्री विष्णु ने कई वर्षों तक तपस्या की थी तथा इसी काल में उनका यह मंदिर यहां स्थापित हुआ माना जाता है।
इस ऐतिहासिक श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर की निर्माण शैली को देखें तो यह मंडी शहर में स्थापित अन्य मंदिरों जैसी ही है। ऐसे में माना जाता है कि यह मंदिर भी लगभग 300 या 400 वर्ष पुराना होगा। इस मंदिर से जुड़ी ऐतिहासिक बातों पर गौर करें तो कहा जाता है कि नेर गांव में द्वापर काल में भगवान श्री विष्णु ने कई वर्षों तक तपस्या की थी तथा इसी दौरान यहां पर उनका यह मंदिर स्थापित हुआ होगा। यह भी कहा जाता है कि इसी स्थान की शक्तियों द्वारा इस महाकलियुग को समाप्त किया जाएगा तथा यह स्थान बद्रीनाथ धाम के समकक्ष भी माना जाता है। इस प्राचीन मंदिर को भगवान श्री विष्णु जी के सभी मंदिरों में शक्तिशाली माना है तथा आने वाले समय में इस कलियुग में कल्याण एवं उद्धार करेगा। साथ ही कहा जाता है कि जो श्रद्धालु सच्चे मन से भगवान से प्रार्थना करेगा तो उसकी मनोकामना जरूर पूरी होगी।इस मंदिर से जुड़ी एक घटना का वृतांत यह बताता है कि 16 मार्च, 2004 को भगवान श्री विष्णु जी की पूजा अर्चना की गई। उसी रात्रि करीब 11 बजे मंदिर की घंटियां बजीं और मूर्ति अपने स्थान से तकरीबन 4 से 5 इंच आगे सरक गई। लेकिन दूसरे दिन दोपहर यह मूर्ति फिर अपने स्थान पर आ गई। फिलवक्त इस ऐतिहासिक एवं प्राचीन मंदिर से जुड़ा कोई तथ्यात्मक जानकारी उपलब्ध नहीं है लेकिन मंदिर की निर्माण शैली को देखते हुए निश्चित तौर पर यह कहा जा सकता है कि यह मंदिर 300 या 400 वर्ष पुराना जरूर होगा। वर्तमान में इस मंदिर के रखरखाव के लिये स्थानीय ग्रामीणों ने श्री लक्ष्मी नारायण सेवा समिति पंजीकृत करवा रखी है जो इसका संचालन कर रही है।यह प्राचीन एवं ऐतिहासिक मंदिर जोगिन्दर नगर से लगभग 5 या 6 किलोमीटर की दूरी पर ग्राम पंचायत नेर घरवासड़ा के गांव नेर में स्थित है जो गांव मझारनु से लगभग एक या डेढ़ किलोमीटर दूर है। यह मंदिर पक्की सडक़ से जुड़ा हुआ है। इस मंदिर को वाया बस्सी पॉवर हाऊस होते हुए भी सडक़ मार्ग से पहुंचा जा सकता है।
Friday, 11 February 2022
भंगाल रियासत के पाल वंश शासकों ने निर्मित किया था जोगिन्दर नगर का करनपुर किला
जोगिन्दर नगर के ऐतिहासिक करनपुर किले का निर्माण भंगाल रियासत के पालवंश शासकों ने किया था। इतिहास के पन्नों को खंगालें तो भंगाल रियासत का अस्तित्व लगभग एक से डेढ हजार वर्ष तक माना जाता है। सन एक हजार इस्वी से लेकर 1750 तक भंगाल रियासत का अस्तित्व माना जाता है। भंगाल रियासत में बड़ा भंगाल, छोटा भंगाल, पपरोला, लंदोह तथा रजेर क्षेत्र शामिल रहे हैं। भंगाल रियासत की राजधानी बीड़ रही है। लेकिन समय-समय पर इस रियासत पर हुए हमलों के कारण यह रियासत निरंतर सिकुड़ती गई तथा इस रियासत के अंतिम शासक मानपाल (1749) की मृत्यु के बाद इसका अस्तित्व समाप्त हो गया। यह रियासत मंडी, कुल्लू, कांगड़ा, गुलेर इत्यादि रियासतों का हिस्सा बन गई।
ऐतिहासिक करनपुर किले की बात करें तो इसका निर्माण पालवंश शासकों में से एक रहे राजा करन ने किया माना जाता है तथा राजा करन के कारण ही यह करनपुर किला से प्रसिद्ध हुआ। मंडी रियासत के अनेक शासकों ने भंगाल रियासत पर अपना परचम लहराने के लिये समय-समय पर आक्रमण किये, लेकिन कुल्लू रियासत के राजाओं की सहायता से भंगाल रियासत अपना अस्तित्व बनाये रखने में कुछ समय तक जरूर कामयाब रही। लेकिन बाद में यह रियासत कई रियासतों का हिस्सा बनकर इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह गई।
भंगाल रियासत के शासक पृथी पाल (1710) जो कि मंडी रियासत के राजा सिद्ध सेन के संबंधी थे की हत्या राजा सिद्ध सेन ने ही कर दी थी तथा हत्या करने के बाद दमदमा महल में पृथी पाल के सिर को दफन कर दिया था। इसके बाद राजा सिद्ध सेन ने भंगाल रियासत पर कब्जा करने के लिये अपनी सेना को भेजा, लेकिन पृथीपाल की माता ने कुल्लू के राजा मान सिंह की सहायता से उनके इस आक्रमण को विफल कर दिया था। इस बीच राजा मान सिंह ने इस रियासत के एक बड़े हिस्से पर अपना अधिकार कर लिया। राजा पृथी पाल की मृत्यु के बाद रघुनाथ पाल (1720) भंगाल रियासत के शासक बने। इस दौरान भी राजा सिद्ध सेन ने करनपुर किले को हथियाने के लिये लगातार हमले किये लेकिन वे कामयाब नहीं हो पाए। कहते हैं कि राजा सिद्ध सेन के बाद मंडी रियासत के शासक बने उनके पौत्र शमशेर सेन ने करनपुर किले को उस समय अपने अधीन कर लिया जब राजा रघुनाथ पाल मुगल वायसराय से मिलने पंजाब गये हुए थे।वर्ष 1735 में रघुनाथ पाल की मृत्यु के बाद दलेल पाल भंगाल रियासत के राजा बने। इस दौरान भी भंगाल रियासत पर मंडी, कुल्लू, कहलूर, नालागढ़, गुलेर, जसवां इत्यादि रियासतों के शासकों ने लगातार हमले किये लेकिन वे कामयाब नहीं हो पाए। परन्तु वर्ष 1749 को दलेल पाल की मौत हो गई तथा भंगाल रियासत के बड़े भू-भाग पर मंडी व कुल्लू के शासकों ने अपना एकाधिकार जमा लिया। इतिहास के पन्नें बताते हैं कि राजा दलेल पाल के बाद वर्ष 1749 में मान पाल भंगाल रियासत के शासक बने लेकिन उनके पास अब लंदोह, पपरोला तथा रजेर का इलाका ही शेष रह गया था। मान पाल जब मुगल बादशाह से मिलने दिल्ली जा रहे थे तो इस बीच उनका निधन हो गया तथा भंगाल रियासत के शेष बचे क्षेत्रों में भी कांगड़ा व गुलेर रियासत के शासकों ने अपना परचम लहरा दिया तथा भंगाल रिसासत का अस्तित्व इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह गया।जोगिन्दर नगर का यह ऐतिहासिक करनपुर किला जोगिन्दर नगर कस्बे से महज डेढ या दो किलोमीटर की दूरी पर एक ऊंची पहाड़ी पर स्थित है। यहां पहुंचने के लिये दो रास्ते उपलब्ध हैं। पहला रास्ता जोगिन्दर नगर के गुगली खड्ड पुल से पैदल खड़ी चढ़ाई चढ़ते हुए जाता है। जबकि दूसरा रास्ता गलू पट्ट गांव से होते हुए आता है। दूसरा रास्ता सडक़ से जुड़ा हुआ है तथा महज 300 या 400 मीटर का पैदल रास्ता तय कर किले पर पहुंचा जा सकता है। वर्तमान में यह किला एक खंडहर नुमा स्थान बन चुका है लेकिन अभी भी इस किले की मजबूत दीवारें इसके इतिहास की यादों को ताजा कर देती हैं।
करनपुर किले से समूची जोगिन्दर नगर घाटी को न केवल देखा जा सकता है बल्कि चारों ओर के नैसर्गिक सौंदर्य को भी निहारा जा सकता है। इसी किले से महज 200 या 250 मीटर की दूरी पर ऐतिहासिक बंडेरी मां का भी मंदिर है। मंदिर के आसपास का प्राकृतिक सौंदर्य भी मन को सुकून प्रदान करने वाला है।
(ऐतिहासिक स्त्रोत: दि वंडरलैंड ऑफ हिमाचल प्रदेश, हिमप्रस्थ मंडी जिला विशेषांक अंक मार्च, 2014)
Wednesday, 9 February 2022
जड़ी बूटियों से बनने वाली धूपन सामग्री पर काम करेंगे बैजनाथ के चंद्र दीक्षित
सीएम स्टार्टअप योजना के तहत प्राकृतिक एवं आयुर्वेद तरीके से तैयार होंगे धूप व अगरबत्ती
Thursday, 27 January 2022
हिमाचल के ग्रामीण इलाकों में आज भी जीवित है आयुर्वेद
निरमंड के लीला चंद शिलाजीत निकालने के पुश्तैनी काम को बढ़ा रहे हैं आगे
हिमाचल प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में आयुर्वेद आज भी जिंदा है। हमारे यहां ऐसे कई लोग मिल जाएंगे जो आज भी पुरातन चिकित्सा पद्धति एवं उपचार आयुर्वेद को न केवल आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं बल्कि इसके माध्यम से अपनी आर्थिकी को भी सुदृढ़ करने को प्रयासरत हैं।
ऐसे ही एक व्यक्ति है जिला कुल्लू की तहसील निरमंड के गांव ओडीधार निवासी 55 वर्षीय लीला चंद प्रेमी जो शिलाजीत निकालने के अपने पुश्तैनी काम को न केवल आगे बढ़ाने में लगे हुए हैं बल्कि आर्थिकी को सुदृढ़ करने में भी प्रयासरत हैं। आयुर्वेद अनुसंधान संस्थान जोगिंदर नगर में पहुंचे लीला चंद का कहना है कि उनके पिता ने वर्ष 1960- 61 से निरमंड व आसपास के पहाड़ों से शिलाजीत निकालने का काम शुरू किया था, लेकिन आयुर्वेद विधि का ज्ञान न होने के बावजूद भी वह शिलाजीत से लोगों का उपचार करते रहे हैं तथा लोग ठीक भी होते रहे हैं। लेकिन वर्ष 1979 में उनके मामा जीवन लाल ने जालंधर से आयुर्वेद फार्मासिस्ट का प्रशिक्षण प्राप्त किया। इसके बाद उनके द्वारा तैयार नोटस के आधार पर शिलाजीत के शोधन कार्य को आयुर्वेद पद्धति के आधार पर निकालने का वह काम कर रहे हैं।महज पांचवीं तक की शिक्षा प्राप्त एवं बीपीएल परिवार में शामिल लीला चंद इसी उम्मीद के साथ आयुर्वेद अनुसंधान संस्थान जोगिंदर नगर पहुंचे हैं कि शिलाजीत निकालने के उनके कार्य का प्रमाणीकरण हो सके। इससे न केवल लोगों को गुणवत्तायुक्त शिलाजीत मिल सकेगी बल्कि वे अपनी आर्थिकी को सुदृढ़ कर सकें। उनका कहना है कि वे अब इस पुश्तैनी कार्य को अपने बेटे लोकेंद्र सिंह को सौंप रहे ताकि वह इसे आगे बढ़ा सके।क्या कहते हैं अधिकारी:
इस संबंध में राष्ट्रीय औषध पादप बोर्ड के क्षेत्रीय निदेशक, क्षेत्रीय एवं सुगमता केंद्र उत्तर भारत स्थित जोगिन्दर नगर डॉ. अरूण चंदन का कहना है कि आयुर्वेद निदेशालय के माध्यम से उनके यहां पहुंचे लीला चंद के शिलाजीत निकालने व शोधन पद्धति कि वह जांच करेंगे तथा उनके इस कार्य का प्रमाणीकरण भी किया जाएगा। इससे जहां उनके इस तैयार उत्पाद को एक पहचान मिल सकेगी तो वहीं वे बेहतर तरीके से इसकी मार्केटिंग भी कर पाएंगे। उनका कहना है कि प्रथम दृष्टया में शिलाजीत शोधन की उनकी पद्धति बिल्कुल आयुर्वेदिक आधार पर सही पाई गई है, बावजूद इसके इनके शोधन की प्रक्रिया की पूरी जांच पड़ताल की जाएगी।
क्या होती है शिलाजीत:
शिलाजीत आयुर्वेद में एक ऐसी प्राकृतिक तौर पर तैयार होने वाली औषधी है जिससे न केवल व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाया जा सकता है बल्कि यह एक टोनिक का काम भी करती है। इसके अलावा विभिन्न आयुर्वेदिक दवा निर्माण में भी इसका इस्तेमाल किया जाता है।
शीलाजीत प्राकृतिक तौर पर हिमालय पर्वत की ऊंचे पहाड़ों में ग्रीष्म ऋतु के समय चट्टानों में सूर्य की पडऩे वाली तेज किरणों के कारण पिघलने वाले रस व इसके जमने के कारण तैयार होती है। शीलाजीत देखने में कोलतार के समान काला व गाढ़ा सा द्रव होता है तथा सूखने पर चमकीला व भंगुर हो जाता है। यह द्रव पानी में घुलनशील होता है तथा तारों को छोड़ता है, जबकि रासायनिक प्रक्रिया में उदासीन रहता है।शीलाजीत खनिज पदार्थ के तौर पर चार प्रकार से पाई जाती है। जिसमें स्वर्ण, रजत, लोह व ताम्र शामिल है। निरमंड व आसपास के पहाड़ों में यह लोह व ताम्र रूप में ही पाई जाती है। पहाड़ों से प्राप्त इस खनिज पदार्थ को पानी में घोलने के बाद सूर्य तापी व अग्रि तापी विधि के माध्यम से इसका शोधन किया जाता है जिसमें औसतन 15 दिन से एक महीने तक का समय लग जाता है। शीलाजीत हिमालय क्षेत्र जिसमें हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड इत्यादि शामिल है में पायी जाती है।
चरक संहिता में शीलाजीत को सर्वरोगनाशी बताया गया है। जिसमें उल्लेख किया गया है कि जब सभी प्रकार की दवाईयों का असर खत्म हो जाए तब शीलाजीत का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
Sunday, 23 January 2022
सोलरयुक्त बाड़बंदी से बरनाऊ चौंतड़ा निवासी पूर्ण चंद ने लिखी सफलता की कहानी
मुख्य मंत्री खेत संरक्षण योजना से कृषि बना फायदा का सौदा, जंगली जानवरों से सुरक्षित हो रही फसलें
हिमाचल प्रदेश सरकार की मुख्य मंत्री खेत संरक्षण योजना किसानों के लिये वरदान से कम साबित नहीं हो रही है। इसी योजना के माध्यम से की जा रही बाड़बंदी से न केवल किसानों की फसलें बंदरों व अन्य जंगली जानवरों से बच पा रही हैं बल्कि खेती-बाड़ी फायदे का सौदा भी साबित हो रही है। इसी योजना से जुडक़र जोगिन्दर नगर उपमंडल के विकास खंड चौंतड़ा के अंतर्गत ग्राम पंचायत भडयाड़ा के बरनाऊ गांव निवासी पूर्ण चंद न केवल अपनी फसलों को बचाने में कामयाब हो पाये हैं बल्कि खेती-बाड़ी फायदे का सौदा भी साबित हो रही है।
इस इस बारे ग्राम पंचायत भडयाड़ा के बरनाऊ गांव निवासी 65 वर्षीय पूर्ण चंद से बातचीत की तो उन्होने बताया कि मुख्य मंत्री खेत संरक्षण योजना के तहत सोलरयुक्त बाड़बंदी कर न केवल अपनी बेकार पड़ी पुश्तैनी जमीन को उपजाऊ बना दिया है बल्कि फसलों को भी बंदरों, जंगली एवं आवारा जानवरों से भी सुरक्षित कर लिया है। मार्च 2020 में 70:30 अनुपात में कृषि विभाग के माध्यम से लगभग पांच बीघा जमीन में साढ़े तीन लाख रूपये की लागत से कम्पोजिट बाडबंदी की है। जिस पर सरकार ने लगभग 2 लाख 42 हजार रूपये का उपदान प्रदान किया है। पंजाब बिजली बोर्ड से वर्ष 2014 में सेवा निवृति के बाद पूर्ण चंद ने अपनी पुश्तैनी जमीन में खेती-बाड़ी को आगे बढ़ाने का काम शुरू किया। लेकिन बंदरों एवं अन्य जंगली जानवरों के कारण उनके लिये कृषि घाटे का सौदा साबित होने लगी। उनका कहना है कि उनके पास लगभग 11-12 बीघा जमीन है लेकिन बाडबंदी से पहले जहां महज सात से आठ क्विंटल गेंहू की पैदावार हो पाती थी तो वहीं अब बाड़बंदी के बाद 23 से 24 क्विंटल गेहूं तैयार हो रही है। इसी तरह जहां मक्की की पैदावार महज 40 से 50 किलोग्राम थी तो वहीं अब 7 से 8 क्विंटल जबकि धान की पैदावार में भी काफी वृद्धि हुई है। इसके अलावा वे मौसमी सब्जियों का भी उत्पादन कर रहे हैं जिसमें आलू, लहुसन, धनिया, मिर्च, हल्दी, टमाटर, गोभी, मटर, अदरक के साथ-साथ सोयाबीन की भी पैदावार कर रहे हैं। उनका कहना है कि उनके परिवार में 12 लोग हैं जिनके वर्ष भर की खाने की जरूरतों को वे अपने इन्हीं खेतों से ही पूरा कर लेते हैं जबकि अतिरिक्त पैदावार होने पर वे बेच भी रहे हैं। पूर्ण चंद कहते हैं कि उन्होने सेब के भी 100 पौधे लगाए हैं तथा पहली फसल में 50 पौधों से प्रति पौधा 20 से 25 किलोग्राम की पैदावार प्राप्त हुई है। अपने खेतों में वे स्वयं की तैयार प्राकृतिक खाद का ही इस्तेमाल कर रहे हैं, इसके लिये उन्होने कृषि विभाग के सहयोग से दो वर्मी कम्पोस्ट पिट तैयार किये हैं। जिन पर सरकार ने 12 हजार रूपये का उपदान प्रदान किया है। सिंचाई के लिये उन्होने सरकार के सहयोग से टयूबवैल स्थापित किया है जिस पर सरकार ने लगभग एक लाख 10 हजार रूपये का उपदान दिया है। टयूब वैल को चलाने के लिये उन्होने सोलर पंपिंग सिस्टम भी स्थापित किया है लेकिन यहां की भौगोलिक परिस्थितियों के कारण यह कामयाब नहीं हो पाया है। खेतों में सिंचाई सुविधा के लिये 6 हजार क्यूसेक क्षमता का एक पानी का टैंक भी निर्मित किया है जिस पर सरकार की ओर से 70 हजार रूपये की आर्थिक मदद मिली है। उन्होने बताया कि आने वाले समय में सब्जियों एवं सेब की फसल को खराब मौसम के साथ-साथ कीट पतंगों एवं पक्षियों से बचाने के लिये हेलनेट सुविधा के लिये भी आवेदन किया है। पूर्ण चंद का कहना है कि सोलरयुक्त बाड़बंदी से अब न केवल उनकी फसलें बंदरों एवं अन्य आवारा व जंगली जानवरों से सुरक्षित हुई है बल्कि कृषि अब फायदे का सौदा साबित हो रहा है। उन्होने प्रदेश के किसानों विशेषकर शिक्षित व बेरोजगार युवाओं से सरकार की इन योजनाओं का लाभ उठाकर कृषि व्यवसाय को अपनाने का भी आहवान किया है।क्या कहते हैं अधिकारी:
जब इस बारे विषयवाद विशेषज्ञ कृषि चौंतड़ा ब्लॉक जय सिंह से बातचीत की तो उनका कहना है कि मुख्य मंत्री खेत संरक्षण योजना का लाभ उठाकर किसान पूर्ण चंद एक सफल किसान बनने की ओर अग्रसर हैं। उन्होने बताया कि गत चार वर्षों के दौरान इस योजना के माध्यम से अब तक चौंतड़ा ब्लॉक में 49 किसानों की लगभग 19 हजार 538 वर्ग मीटर जमीन को सोलरयुक्त बाड़बंदी के तहत लाया गया है। जिस पर सरकार ने लगभग एक करोड़ 63 लाख रूपये बतौर उपदान मुहैया करवाए हैं।उन्होने बताया कि इस योजना के माध्यम से व्यक्तिगत तौर पर सोलरयुक्त बाड़बंदी के लिए सरकार 80 प्रतिशत जबकि सामूहिक तौर पर 85 प्रतिशत तक उपदान मुहैया करवा रही है। इसके साथ-साथ कम्पोजिट बाड़बंदी के लिए 70 प्रतिशत तथा कांटेदार तार लगाने को 50 प्रतिशत तक अनुदान दिया जा रहा है। उन्होने ज्यादा से ज्यादा किसानों से सरकार की इस योजना का लाभ उठाने का आग्रह किया है ताकि उनकी फसलों को बंदरों, जंगली जानवरों एव आवारा पशुओं से बचाया जा सके।

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