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Friday, 11 September 2020

मुख्य मंत्री एक बीघा योजना के अंतर्गत चौंतड़ा ब्लॉक में 306 कार्यों को मिली स्वीकृति

योजना से ग्रामीण अर्थव्यवस्था व महिला सशक्तीकरण को मिलेगी मजबूती, प्रदेश भर में डेढ लाख महिलाएं होंगी लाभान्वित
प्रदेश सरकार ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने तथा महिला सशक्तीकरण की दिशा में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) को जोडक़र मुख्य मंत्री एक बीघा योजना की शुरूआत की है। इस योजना के तहत एक महिला या उसका परिवार जिनके पास एक बीघा या 0.4 हेक्टेयर तक की भूमि है, वह सब्जियों और फल को उगाने के लिए बैकयार्ड किचन गार्डन तैयार कर सकते हैं।
इस योजना के तहत पांच हजार स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से लगभग डेढ़ लाख महिलाओं को शामिल करने का लक्ष्य रखा गया है। इसी योजना में लाभार्थी महिला को मनरेगा के अंतर्गत रोजगार प्राप्त करने का भी अधिकार रहेगा। इसके अलावा महिलाओं के कौशल को बढ़ाने के लिए उन्हे प्रशिक्षण भी दिया जाएगा। साथ ही पहाड़ी भूमि को समतल करने, पानी को चैनेलाइज करने, वर्मी कम्पोस्ट पिट स्थापित करने, गाय व बकरी का शैड बनाने, डंगा लगाने तथा पौधे व बीज इत्यादि खरीदने के लिए अनुदान भी दिया जाएगा।
इसी योजना के तहत जोगिन्दर नगर विधानसभा क्षेत्र के चौंतड़ा विकास खंड की विभिन्न पंचायतों से अबतक प्राप्त 306 आवेदनों को अनुमति प्रदान की गई है तथा 17 लाभार्थियों ने कार्य भी प्रारंभ कर दिया है। बीडीओ चौंतड़ा विवेक चौहान ने बताया कि प्रदेश सरकार ने कोरोना काल से प्रभावित ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों के पुनरूथान के लिए मुख्य मंत्री एक बीघा योजना की शुरूआत की है। इस योजना का प्रमुख उद्देश्य मनरेगा और स्वच्छ भारत मिशन का अभिसरण कर ग्रामीणों को किचन गार्डनिंग के लिए प्रोत्साहित करना है। ग्रामीण स्तर पर गठित स्वयं सहायता समूहों को इस योजना का लाभ प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया जाना है। साथ ही बताया कि स्वयं सहायता समूह जो मनरेगा के अंतर्गत जॉब कार्ड धारक हैं वे इस योजना का लाभ उठा सकते हैं। इसी योजना के माध्यम से चौंतड़ा विकास खंड से भी आवेदन प्राप्त हुए हैं तथा
अब तक 306 को स्वीकृति प्रदान कर दी है तथा 17 ने कार्य भी प्रारंभ कर दिया है।
भडयाड़ा पंचायत से 59, टिकरी मुशैहरा से 53 तथा भडयाड़ा बूहला से मिले हैं 47 आवेदन
मुख्य मंत्री एक बीघा योजना के तहत चौंतड़ा विकास खंड में अब तक कुल 306 आवेदनों को स्वीकृति प्रदान की गई है जिनमें ग्राम पंचायत भडयाड़ा से सबसे अधिक 59 जबकि टिकरी मुशैहरा से 53, भडयाड़ा बूहला से 47 तथा द्राहल पंचायत से 37 आवेदन प्राप्त हुए हैं। इसी तरह ऐहजु से 23, बडैहर से 22, चौंतड़ा से पांच, गोलवां से 20, कथौण से 13, खुडडी से एक, लांगणा से चार, मैन भरोला से 5, पस्सल से 11 तथा सगनेहड़ व तलकेहड़ पंचायतों से प्राप्त तीन-तीन आवेदनों को स्वीकृति प्रदान की गई है।
17 आवेदकों ने शुरू कर दिया है कार्य, 25 ग्राम पंचायतों से नहीं प्राप्त हुआ है कोई आवेदन
इस योजना के अंतर्गत स्वीकृत आवेदनों में से 17 ने अपना कार्य भी प्रारंभ कर दिया है। जिनमें चौंतड़ा पंचायत से 3, द्राहल से चार, कथौण से चार तथा पस्सल से 6 आवेदक शामिल हैं। चौंतड़ा विकास खंड की 25 ग्राम पंचायतों में से अबतक कोई भी आवेदन प्राप्त नहीं हुआ है जिनमें बाग, भड़ोल, दलेड, धार, ढ़ेलू, द्रुब्बल, गलू, खद्दर, खडीहार, कोलंग, कुठेहड़ा, ममाण-बनांदर, मतेहड़, मटरू, पीहड-बेहडलू, पीपली, रोपड़ी, रोपड़ी कलैहडू, सैंथल पडैन, सिमस, टिकरू, त्रैम्बली, तुलाह, ऊपरीधार व ऊटपुर शामिल है।







Thursday, 10 September 2020

पंचवटी योजना के तहत चौंतड़ा ब्लॉक में प्राप्त हुए 51 प्रस्ताव, 15 को मिली स्वीकृति

ग्रामीण क्षेत्रों में वरिष्ठ नागरिकों को मिलेगी मनोरंजन के साथ-साथ पार्क व बागीचों की सुविधा
प्रदेश सरकार ने वरिष्ठ नागरिकों को ग्रामीण स्तर पर मनोरंजन के साथ-साथ पार्क व बागीचों की सुविधा मुहैया करवाने के लिए पंचवटी योजना की शुरूआत की है। इस योजना में ग्रामीण विकास विभाग के माध्यम से मनरेगा, स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) तथा 14वें वित्तायोग के तहत प्रदेश के सभी विकास खंडों में एक बीघा समतल भूमि पर सभी आवश्यक सुविधाओं से लैस पार्क व बागीचे विकसित किये जाएंगे। वरिष्ठ नागरिकों की स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों को ध्यान में रखते हुए इन पार्कों में आयुर्वेदिक व औषधीय पौधों का भी रोपण किया जाएगा। पूरे प्रदेश भर में चालू वित्त वर्ष में ऐसे लगभग एक सौ पंचवटी पार्क विकसित करने का लक्ष्य रखा है। इस योजना का शुभारंभ प्रदेश के मुख्य मंत्री जय राम ठाकुर ने गत जून माह में शिमला से किया था।
इसी पंचवटी योजना के अंतर्गत जोगिन्दर नगर विधानसभा क्षेत्र के चौंतड़ा ब्लॉक की 40 ग्राम पंचायतों में से अब तक कुल 51 प्रस्ताव प्राप्त हुए हैं। जिनमें से 15 प्रस्तावों को अनुमति प्रदान कर दी गई है तथा 8 पर कार्य भी प्रारंभ हो गया है।
इस बारे खंड विकास अधिकारी चौंतड़ा विवेक चौहान से बातचीत की तो उन्होने बताया कि ग्राम पंचायतों से अब तक प्राप्त प्रस्तावों में से विभिन्न योजनाओं के तहत लगभग 3 करोड़ रूपये की राशि से बनने वाले 15 पंचवटी पार्कों के निर्माण को स्वीकृति प्रदान कर दी गई है तथा इनमें से आठ पंचायतों में पंचवटी पार्क विकसित करने का कार्य भी शुरू हो गया है। ग्रामीण स्तर पर पंचवटी पार्क विकसित करने के लिए मनरेगा, 14 वां वित्तायोग तथा अन्य योजनाओं के माध्यम से राशि को स्वीकृति प्रदान की जा रही है।
इन पंचायतों में शुरू हुआ है पंचवटी पार्क विकसित करने का कार्य
चौंतड़ा ब्लॉक की आठ ग्राम पंचायतों भडयाड़ा, चौंतड़ा, द्राहल, ममाण-बनांदर, सैंथल पडैन, सिमस, टिकरी मुशैहरा तथा ऊटपुर में पंचवटी पार्क विकसित करने का कार्य शुरू हो चुका है। इसके अलावा ग्राम पंचायत गलू में एक, लांगणा में दो, पीहड़-बेहड़लू में भी एक तथा तुलाह में तीन पार्क विकसित करने को स्वीकृति प्रदान कर दी है।
सबसे अधिक तुलाह पंचायत से प्राप्त हुए हैं 5, तो लांगणा से मिले हैं 4 प्रस्ताव
वरिष्ठ नागरिकों की सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए पंचवटी पार्क विकसित करने को ग्राम पंचायत तुलाह से कुल पांच प्रस्ताव प्राप्त हुए हैं जिनमें से 3 को स्वीकृति प्रदान कर दी गई है जबकि लांगणा पंचायत से 4 प्रस्ताव प्राप्त हुए हैं जिनमें से 2 को स्वीकृति दे दी गई है। इसी तरह गोलवां व खद्दर पंचायतों से तीन-तीन, बाग, भडयाड़ा, द्राहल, खुड्डी, मतेहड़ तथा सैंथल पड़ैन से दो-दो पंचवटी पार्क विकसित करने को प्रस्ताव प्राप्त हुए हैं।
इन पंचायतों से पंचवटी पार्क विकसित करने को नहीं प्राप्त हुआ कोई प्रस्ताव
पंचवटी योजना के अंतर्गत पार्क विकसित करने को चौंतड़ा ब्लॉक की 40 ग्राम पंचायतों में से 34 ने अपने प्रस्ताव बीडीओ कार्यालय को प्रस्तुत किये हैं। जबकि 6 ग्राम पंचायतों जिनमें दलेड, धार, द्रुब्बल, खडीहार, कोलंग तथा त्रैंबली से कोई भी प्रस्ताव अब तक प्राप्त नहीं हुआ है।




Tuesday, 1 September 2020

अंतरजातीय विवाह करने पर राजेश कुमार व बीना देवी को सरकार ने दिये 50 हजार

जोगिन्दर नगर उपमंडल में अंतर जातीय विवाह योजना के तहत 58 परिवार लाभान्वित
हमारे समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव को खत्म करने की दिशा में सरकार न केवल अनेक योजनाएं कार्यान्वित कर रही है बल्कि प्रोत्साहन स्वरूप आर्थिक मदद भी दी जा रही है। जोगिन्दर नगर उप-मंडल में गत तीन वर्षों के दौरान 58 परिवारों को अंतरजातीय विवाह प्रोत्साहन योजना का लाभ प्राप्त हुआ है जिनमें से जोगिन्दर नगर तहसील के अंतर्गत 36 जबकि लडभड़ोल तहसील के तहत 22 परिवार शामिल हैं।
अंतरजातीय विवाह योजना के तहत जोगिन्दर नगर के आरठी गांव निवासी राजेश कुमार व बीना देवी को सरकार ने 50 हजार रूपये की प्रोत्साहन राशि प्राप्त हुई है। जब इस बारे लाभार्थी राजेश कुमार व बीना देवी से बातचीत की तो उनका कहना है कि सरकार द्वारा समाज में जातिगत भेदभाव को समाप्त करने की दिशा में शुरू की गई अंतरजातीय विवाह प्रोत्साहन योजना न केवल आर्थिक तौर पर लाभकारी है बल्कि जाति प्रथा को खत्म करने में भी कारगर सिद्ध हो रही है। आरठी निवासी राजेश कुमार का कहना है कि उनकी शादी धमच्याण (थल्टूखोड़) निवासी बीना देवी से वर्ष 2016 में हुई है जो दोनों अलग-अलग जाति से संबंध रखते हैं। लेकिन जब उन्हे प्रदेश सरकार की अंतर जातीय विवाह प्रोत्साहन योजना बारे जानकारी मिली तो आर्थिक प्रोत्साहन के लिए अपना आवेदन संबंधित कार्यालय में प्रस्तुत कर दिया तथा कुछ समय के बाद उन्हे 50 हजार रूपये की राशि सरकार की ओर से प्राप्त हुई है। इसी तरह जोगिन्दर नगर के वार्ड नम्बर-दो निवासी हेम सिंह की शादी मियोट (बरोट) की गुडडी देवी से वर्ष 2013 में हुई है जो दोनों भी अलग-अलग जाति से संबंध रखते हैं। इन्हे भी सरकार की ओर से 25 हजार रूपये की प्रोत्साहन राशि प्राप्त हुई है।
इस योजना के तहत लाभान्वित इन दोनों परिवारों ने प्रदेश सरकार का आभार जताते हुए कहा कि ऐसी योजनाएं निश्चित तौर पर हमारे समाज से जातिगत भेदभाव को समाप्त करने में समाज के लिए हितकारी सिद्ध होगी। उनका कहना है कि अंतरजातीय विवाह करने पर उन्हे न केवल परिवार बल्कि समाज से भी पीड़ा को सहन करना पड़ा है। लेकिन बदलते वक्त के साथ परिवार व समाज की दी हुई यह पीड़ा खत्म हो गई है तथा सरकार की अंतरजातीय प्रोत्साहन योजना की इसमें बड़ी भूमिका रही है।
इसी तरह आरठी गांव के शेष राम व मीना कुमारी, टिकरू के गदयाड़ा निवासी विजय कुमार व नेहा, त्रामट के सिहारल निवासी सीमा देवी व अनुपम, भराडू के गडूही निवासी नरेश कुमार व अन्जुु वाला, चौंतड़ा के धनैतर गांव वासी अमर सिंह व रेखा देवी, गंगोटी की रितु देवी व मंगत राम, ऊटपुर के अमरनाथ व सुनीता देवी, गांव बाग के अजय कुमार व मती देवी, पंडोल गांव के सुरजीत व पवन कुमार इत्यादि ऐसे कई परिवार हैं जिन्हे भी सरकार की अंतरजातीय विवाह प्रोत्साहन योजना का लाभ मिला है।
किन्हे मिलती है सहायता:
अंतरजातीय विवाह योजना का लाभ प्राप्त करने के लिए लाभार्थियों का हिमाचली बोनाफाईड होना लाजिमी है। साथ ही दोनों लाभार्थियों में से एक का अनुसूचित जाति के साथ-साथ सामान्य या अन्य पिछड़ा वर्ग श्रेणी से होना भी अनिवार्य है। साथ ही पंचायत द्वारा जारी विवाह पंजीकरण प्रमाण पत्र के साथ-साथ पंचायत प्रधान द्वारा जारी पति-पत्नि के बीच मधुर संबंध रिपोर्ट प्रस्तुत करना भी जरूरी है। साथ ही पात्र लाभार्थियों की आयु हेतु मैट्रिक प्रमाणपत्र के साथ-साथ शादी के लिए लडक़े की आयु 21 जबकि लडक़ी की आयु 18 वर्ष होना भी आवश्यक है।
कैसे करें आवेदन:
योजना का लाभ हासिल करने के लिए पात्र परिवार सभी आवश्यक दस्तावेजों सहित अपने नजदीकी तहसील कल्याण अधिकारी के कार्यालय में निर्धारित प्रपत्र पर अपना प्रामणपत्र प्रस्तुत कर सकते हैं।
क्या कहते हैं अधिकारी:
इस संबंध में तहसील कल्याण अधिकारी, जोगिन्दर नगर व लड भड़ोल चंदन वीर सिंह का कहना है कि वित्तीय वर्ष 2019-20 के लिए जोगिन्दर नगर विस क्षेत्र में कुल 29 पात्र लाभार्थी परिवारों को अंतरजातीय विवाह प्रोत्साहन योजना के तहत लाभान्वित किया गया है। जिनमें लड भड़ोल तहसील के अंतर्गत 12 तथा जोगिन्दर नगर तहसील के तहत 17 पात्र परिवार शामिल हैं। गत तीन वर्षों के दौरान अब तक कुल 58 परिवार इस योजना से लाभान्वित हो चुके हैं।
उनका कहना है कि इस योजना के अंतर्गत सरकार पहले 25 हजार जबकि वर्तमान में 50 हजार रूपये की प्रोत्साहन राशि प्रदान कर रही है। जिसमें से 30 हजार रूपये विवाह करने वाले लडक़ा-लडक़ी के नाम पांच वर्ष के लिए बतौर सावधी जमा राशि तथा 20 हजार रूपये दोनों के संयुक्त बचत खाते में जमा किये जाते हैं।

Saturday, 8 August 2020

सोलरयुक्त बाड़बंदी से खलेही चौंतड़ा निवासी अनिल कुमार ने लिखी सफलता की कहानी

मुख्य मंत्री खेत संरक्षण योजना से कृषि बना फायदे का सौदा, 45 हजार की हुई आय
हिमाचल प्रदेश सरकार की मुख्य मंत्री खेत संरक्षण योजना आज कई किसानों की आर्थिकी को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण साबित हो रही है। इसी योजना के माध्यम से की जा रही बाड़बंदी से न केवल किसानों की फसलें बंदरों व अन्य जंगली जानवरों से बच पा रही हैं बल्कि खेती-बाड़ी फायदे का सौदा भी साबित हो रही है। इस योजना से जुडक़र जोगिन्दर नगर उपमंडल के विकास खंड चौंतड़ा के खलेही गांव निवासी अनिल कुमार ने भी मात्र एक वर्ष के प्रयास में ही सफलता की कहानी लिख डाली है। साथ ही अनिल कुमार भडयाड़ा पंचायत के उप-प्रधान भी हैं।
चौंतड़ा विकास खंड की ग्राम पंचायत भडयाड़ा के खलेही गांव निवासी 54 वर्षीय अनिल कुमार ने मुख्य मंत्री खेत संरक्षण योजना के तहत सोलरयुक्त बाड़बंदी कर न केवल अपनी बंजर पड़ी जमीन को उपजाऊ बनाया बल्कि फसलों को भी बंदरों, जंगली एवं आवारा जानवरों से भी सुरक्षित किया। इसी योजना का नतीजा है कि अनिल कुमार ने महज एक वर्ष में ही बंजर पड़ी जमीन से न केवल साढ़े दस क्विंटल हरा मटर तैयार किया बल्कि एक क्विंटल धनिया का भी उत्पादन किया। साथ ही पारंपरिक फसल गेंहू की पैदावार में भी अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। इसी बाड़बंदी का नतीजा है कि अनिल कुमार ने लगभग 45 हजार रूपये की आय उस जमीन से हासिल कर ली है जिसमें कुछ समय पहले महज आधा क्विंटल गेंहू की पैदावार होती थी।
जब इस बारे किसान अनिल कुमार से बातचीत की तो उनका कहना है कि जुलाई 2018 में कृषि विभाग के माध्यम से मुख्य मंत्री खेत संरक्षण योजना के तहत लगभग सात बीघा जमीन की सोलरयुक्त बाड़बंदी की। जिसमें जहां सरकार ने 2,18,800 रूपये का उपदान दिया जबकि उनकी निजी भागीदारी महज 54,700 रूपये की रही है। बाड़बंदी के उपरान्त उन्होने कृषि विभाग के माध्यम से ही प्राकृतिक खेती बारे कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर में एक सप्ताह का प्रशिक्षण प्राप्त किया। साथ ही उन्हे हरियाणा के गुरूकुलम में भी प्राकृतिक खेती को जानने का अवसर भी मिला। उन्होने बताया कि प्रशिक्षण उपरान्त गेंहूं के साथ-साथ मटर व धनिया की बिजाई की। फसलों पर कीटनाशकों का नहीं बल्कि स्वयं तैयार किया गया जीवा अमृत व घन जीवाअमृत के साथ-साथ खट्टी लस्सी का भी छिडक़ाव किया। प्राकृतिक तौर पर जहां लगभग साढ़े दस क्विंटल हरा मटर व एक क्विंटल धनिया की पैदावार हुई बल्कि साढ़े चार क्विंटल से अधिक गेंहू की भी उपज हुई है।उनका कहना है कि प्राकृतिक खेती से जुडऩे के लिए उन्होने एक पहाड़ी गाय को भी पाल रखा है जिसके गोबर व गोमूत्र से प्राकृतिक खाद व कीटनाशक तैयार किया जाता है। खेतों की सिंचाई के लिए वर्षा जल संग्रहण टैंक का भी निर्माण किया है। जब उपज की मार्केटिंग बारे जानना चाहा तो उन्होने बताया कि उनकी उपज को खेत में ही अच्छे दाम प्राप्त हो गए हैं। उन्होने अब अदरक की बिजाई कर दी। इसके अलावा उन्होने नींबू के लगभग डेढ़ सौ पौधों को भी रोपा है। साथ ही वे नकदी फसलों पर बड़े स्तर पर कार्य योजना बना रहे हैं।
अनिल कुमार का कहना है कि सोलरयुक्त बाड़बंदी से अब न केवल उनकी फसलें बंदरों एवं अन्य आवारा व जंगली जानवरों से सुरक्षित हुई है बल्कि कृषि अब फायदे का सौदा साबित हो रहा है। उन्होने प्रदेश के शिक्षित व बेरोजगार युवाओं से सरकार की इस योजना का लाभ उठाकर कृषि व्यवसाय को अपनाने का आहवान किया है।
क्या कहते हैं अधिकारी:
जब इस बारे विषयवाद विशेषज्ञ कृषि चौंतड़ा सोनल गुप्ता से बातचीत की तो उनका कहना है कि मुख्य मंत्री खेत संरक्षण योजना का लाभ उठाकर किसान अनिल कुमार एक सफल किसान बनने की ओर अग्रसर हैं। उन्होने बताया कि इस योजना के माध्यम से अब तक चौंतड़ा ब्लॉक में 49 किसानों की लगभग 6.16 हैक्टेयर जमीन को सोलरयुक्त बाड़बंदी के तहत लाया गया है। जिस पर सरकार ने 98.87 लाख रूपये बतौर उपदान मुहैया करवाए हैं।
उन्होने बताया कि इस योजना के माध्यम से व्यक्तिगत तौर पर सोलरयुक्त बाड़बंदी के लिए सरकार 80 प्रतिशत जबकि सामूहिक तौर पर 85 प्रतिशत तक उपदान मुहैया करवा रही है। इसके साथ-साथ कम्पोजिट बाड़बंदी के लिए 70 प्रतिशत तथा कांटेदार तार लगाने को 50 प्रतिशत तक अनुदान दिया जा रहा है। उन्होने ज्यादा से ज्यादा किसानों से सरकार की इस योजना का लाभ उठाने का आग्रह किया है ताकि उनकी फसलों को बंदरों, जंगली जानवरों एव आवारा पशुओं से बचाया जा सके।
इसके अलावा चौंतड़ा ब्लॉक में वर्ष 2018-19 से लेकर अब तक 1305 किसानों को प्राकृतिक खेती से जोड़ा गया है। धान, मक्का, कोदरा व सोयाबीन की प्राकृतिक खेती कर किसान कम लागत में अच्छा मुनाफा पा रहे हैं।

Wednesday, 15 July 2020

जोगिन्दर नगर वन मंडल में मानसून के दौरान 104 हैक्टेयर क्षेत्र में रोपे जाएंगे वन

इस वर्ष मानसून मौसम के दौरान 55 हजार नए पौधे रोपने का रखा है लक्ष्य
हरित आवरण को बढ़ाने तथा नए पौधे लगाने के दृष्टिगत इस वर्ष मानूसन मौसम के दौरान जोगिन्दर नगर वन मंडल में लगभग 104 हैक्टेयर क्षेत्रफल में पौध रोपण का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। प्रत्येक वर्ष की भांति इस वर्ष भी विशेष पौध रोपण अभियान के अंतर्गत पूरे वन मंडल में लगभग 104 हैक्टेयर क्षेत्रफल में 55 हजार 250 पौधे रोपित किये जाएंगे जिन पर लगभग 57 लाख रूपये की राशि व्यय की जाएगी। मानसून मौसम के दौरान चलने वाले इस विशेष पौध रोपण अभियान के तहत पूरे वन मंडल की सभी 6 वन रेंज जिनमें धर्मपुर, कमलाह, लडभड़ोल, जोगिन्दर नगर, उरला व बीटन वन रेंज शामिल है में पौध रोपण किया जा रहा है। पौध रोपण के दौरान कायल, देवदार, दाडू, शीशम, बेहड़ा, आंवला, हरड़, चील इत्यादि पौधे संबंधित वन रेंज की जलवायु के आधार पर रोपित किए जा रहे हैं।
इसके अलावा प्रदेश सरकार की विद्यार्थी वन मित्र योजना के माध्यम से स्कूली बच्चों को वन व पर्यावरण के प्रति जागरूक बनाने तथा वनों से जोडऩे के लिए चयनित वन क्षेत्र में भी स्कूली बच्चों के माध्यम से पौध रोपण के साथ-साथ इनकी देखभाल भी सुनिश्चित बनाई जा रही है। जोगिन्दर नगर वन मंडल के अधीन वर्ष 2019-20 के दौरान चार सरकारी स्कूलों जिनमें राजकीय छात्र वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला डोहग, नौहली, हयूण पैहड़ तथा लोपास स्कूलों के माध्यम से क्रमश:आधा-आधा हैक्टेयर वन भूमि में पोधरोपण किया गया था। इस बीच चिन्हित की गई भूमि की बाड़बंदी तथा पौधे वन विभाग द्वारा मुहैया करवाए गए तथा पौध रोपण के साथ-साथ इनकी देखभाल का जिम्मा संबंधित स्कूल के बच्चों को दिया गया है। वित्तीय वर्ष 2020-21 के दौरान भी इस योजना के माध्यम से तीन स्कूलों जिनमें लडभड़ोल रेंज के पंडोल, कमलाह रेज के घरवासड़ा तथा टिक्कन रेंज के सुधार स्कूल शामिल के माध्यम से चिन्हित लगभग डेढ़ हेक्टेयर वन भूमि में स्कूली बच्चों के माध्यम से पौध रोपण का लक्ष्य रखा गया है।
वर्तमान में जोगिन्दर नगर वन मंडल के अधीन कुल 25 हजार 775 हैक्टेयर क्षेत्रफल वनों के अधीन है जो कुल भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 39 प्रतिशत है। जिनमें जोगिन्दर नगर वन रेंज के तहत 6999 हैक्टेयर, उरला वन रेंज के अंतर्गत 5669, लड-भड़ोल वन रेंज के तहत 3091, कमलाह वन रेंज के तहत 1818, धर्मपुर वन रेंज के तहत 2172 जबकि टिक्कन वन रेंज के अंतर्गत 6024 हैक्टेयर क्षेत्रफल शामिल है।
क्या कहते हैं अधिकारी
वन मंडलाधिकारी जोगिन्दर नगर राकेश कटोच का कहना है कि इस वर्ष मानसून मौसम के दौरान जोगिन्दर नगर वन मंडल में लगभग 104 हैक्टेयर क्षेत्रफल में लगभग 57 लाख रूपये की राशि व्यय कर 55 हजार 250 पौधे रोपित करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। साथ ही विद्यार्थी वन मित्र योजना के माध्यम से स्कूली बच्चों को जोड़ते हुए तीन सरकारी स्कूलों के माध्यम से लगभग डेढ़ हेक्टेयर क्षेत्रफल में पौध रोपण करने का भी लक्ष्य रखा गया है। इसके अतिरिक्त एक बूटा बेटी के नाम योजना के माध्यम से भी पौध रोपण किया जाएगा। उन्होने बताया कि वर्तमान में जोगिन्दर नगर वन मंडल क्षेत्र में लगभग 39 प्रतिशत क्षेत्र वनों के अधीन है।
इसके अलावा वन विभाग के माध्यम से चलाई जा रही अन्य योजनाओं का भी बेहतर क्रियान्वयन सुनिश्चित बनाया जा रहा है ताकि जहां हमारी अमूल्य वन संपदा सुरक्षित रखी जा सके तो वहीं पर्यावरण को भी बेहतर व साफ-सुथरा बनाए रखने को भी बल मिल सके। उनका कहना है कि यदि आज हमारे वन सुरक्षित रहेंगे तभी हमारा आने वाला कल भी सुरक्षित रहेगा। उन्होने ज्यादा से ज्यादा लोगों से मानसून मौसम के दौरान पौध रोपण करने का आहवान् करने के साथ वनों की सुरक्षा के लिए भी अपना सकारात्मक सहयोग प्रदान करने की अपील भी की है।


Saturday, 11 July 2020

जल शक्ति मंडल चौंतड़ा के लिए चालू वित्तीय वर्ष में 1.64 करोड़ का बजट जारी

चौंतड़ा में जल शक्ति मंडल खुलने से पेयजल व सिंचाई योजनाओं के कार्यान्वयन में आई है तेजी
जल शक्ति मंडल चौंतड़ा के लिए सरकार ने चालू वित्तीय वर्ष के लिए अब तक 1.64 करोड़ रूपये का बजट जारी कर दिया है। जिसमें नाबार्ड के अंतर्गत पेयजल योजना के लिए 6.25 लाख जबकि सिंचाई योजनाओं के लिए 1.58 करोड़ रूपये का बजट शामिल है। इसके अतिरिक्त एससीएसपी कंपोनेंट के तहत पेयजल योजनाओं के लिए 1.09 करोड तथा सिंचाई योजना के लिए 8.63 लाख रूपये के बजट की मांग भी की गई है। इसके अलावा इस वर्ष 30 बस्तियों को पेयजल योजना तथा 130 हैक्टेयर भूमि को सिंचाई सुविधा उपलब्ध करवाने का भी लक्ष्य रखा गया है।
जब इस बारे जल शक्ति मंडल चौंतड़ा के अधिशाषी अभियन्ता भारत भूषण गोयल से बातचीत की तो उनका कहना है कि इस मंडल के तहत अब तक 136 पेयजल जिसमें 24 उठाऊ व 112 ग्रेविटी स्कीम शामिल हैं जबकि 47 सिंचाई जिनमें 8 उठाऊ व 39 बहाव योजनाएं शामिल हैं को पूर्ण कर लिया गया है। जबकि 24 पेयजल जिनमें 21 उठाऊ व 3 ग्रेविटी तथा 12 सिंचाई जिनमें 4 उठाऊ तथा 8 बहाव सिंचाई योजनाएं शामिल हैं का कार्य प्रगति पर है। उन्होने बताया कि चौंतड़ा जल शक्ति मंडल के तहत अब तक कुल 636 हैंडपंप स्थापित किये जा चुके हैं जिनमें से 598 कार्यशील हैं।
चौंतड़ा जल शक्ति मंडल के अधीन शामिल हैं तीन उप-मंडल व 9 अनुभाग
चौंतड़ा जल शक्ति मंडल के अधीन जोगिन्दर नगर विस क्षेत्र की 55 ग्राम पंचायतें व एक नगर परिषद् क्षेत्र शामिल है। जिसमें चौंतड़ा विकास खंड की 40 ग्राम पंचायतों के तहत 271 गांव व 604 बस्तियां तथा द्रंग विकास खंड की 15 ग्राम पंचायतों के अंतर्गत 85 गांवों व 219 बस्तियों को शामिल किया गया है। इस मंडल के अधीन तीन उप-मंडल जोगिन्दर नगर, चौंतड़ा तथा लडभड़ोल एवं 9 अनुभाग जोगिन्दर नगर, भराडू, मकरीड़ी, चौंतड़ा, चौंतड़-एक, रोपड़ी, लडभड़ोल, तुलाह व पंडोल कार्य कर रहे हैं।
क्या कहते हैं विधायक
जोगिन्दर नगर के विधायक प्रकाश राणा का कहना है कि जय राम ठाकुर सरकार ने जोगिन्दर नगर विधानसभा क्षेत्र की लंबे समय से चली आ रही मांग जलशक्ति मंडल को खोलकर क्षेत्र वासियों को एक बड़ी सौगात दी है। चौंतड़ा में जलशक्ति मंडल खुल जाने से जहां जोगिन्दर नगर विस क्षेत्र में विभिन्न पेयजल व सिंचाई योजनाओं को कार्यान्वित करने में तेजी आई है तो वहीं क्षेत्रवासियों की पेयजल समस्या के स्थाई समाधान के साथ-साथ खेतों को सिंचाई सुविधा उपलब्ध करवाने की दिशा में चरणबद्ध तरीके से कार्य किया जा रहा है। उन्होने चौंतड़ा में जलशक्ति मंडल कार्यालय खोलने के लिए मुख्य मंत्री जय राम ठाकुर का जोगिन्दर नगर वासियों की ओर से विशेष तौर पर आभार व्यक्त किया है।






Tuesday, 30 June 2020

फांउडेशन बीज तैयार कर किसानों को उपलब्ध करवाता है जोगिन्दर नगर बीज गुूणन फार्म

वर्ष 2019 मेें तैयार हुआ है 72 क्विंटल धान का बीज, लगभग 8 हैक्टेयर क्षेत्र में फैला है यह फार्म
मंडी जिला के जोगिन्दर नगर में कृषि विभाग के बीज गुणन फार्म में वर्ष 2019 में 72 क्विंटल धान का बीज तैयार हुआ है। इसके अलावा जहां लगभग साढ़े चार क्विंटल सोयाबीन बीज की भी पैदावार हुई है तो वहीं वर्तमान रबी फसल के दौरान लगभग 40-50 क्विंटल गेंहू का बीज भी तैयार हुआ है।
जोगिन्दर नगर स्थित कृषि विभाग का बीज गुणन फार्म न केवल किसानों को अच्छी किस्म का धान व गेहूं का बीज उपलब्ध करवा रहा है बल्कि देश में खाद्यान्न क्रांति लाने के साथ-साथ किसानों की आय को बढ़ाने में इसकी बहुत बड़ी भूमिका है। साथ ही कोरोना महामारी के दौर में जिस तरह लोगों का रूझान कृषि की ओर बढ़ा है निश्चित तौर पर इसकी अहमियत ओर भी बढ़ जाती है। ऐसे में यदि इसे कृषि शोध केंद्र के तौर पर विकसित करने की दिशा में प्रयास किये जाएं तो यह प्रदेश के साथ-साथ देश के किसानों के लिए एक बूस्टर का काम कर सकता है।
वर्ष 1962 में कृषि विभाग द्वारा स्थापित यह बीज गुणन फार्म 7.76 हैक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ है। जिसमें से 4.76 हैक्टेयर क्षेत्र में धान व गेंहूं बीज तैयार किया जाता है जबकि 3 हैक्टेयर क्षेत्र में सडक़ एवं अन्य भवन निर्माण कार्य हुआ है। वर्तमान में इस बीज गुणन फार्म में बीज की पैदावार से लेकर उसकी कटाई इत्यादि तक के विभिन्न कार्यों का मशीनीकरण किया गया है तथा विभिन्न तरह की आधुनिक मशीनों को यहां लाया गया है।
खरीफ 2019 की बात करें तो इस फार्म के 4.118 हैक्टेयर क्षेत्र में 160 किलोग्राम धान लगाया गया जिसमें से 72 क्विंटल बीज की पैदावार हुई है। इसके साथ ही 0.642 हैक्टेयर क्षेत्र में 80 किलोग्राम सोयाबीन का बीज लगाकर लगभग साढ़े चार क्विंटल बीज तैयार किया गया है। वर्तमान रबी फसल के दौरान गेहूं की बात करे तो फार्म की 4.76 हैक्टेयर भूमि पर 477 किलोग्राम बीज लगाकर इसके उत्पादन का आंकलन किया जा रहा है तथा इससे लगभग 40-50 क्विंटल बीज तैयार होने की संभावना है।
क्या है इस फार्म का मुख्य उद्देश्य:
इस फार्म का प्रमुख उद्देश्य प्रजनक (ब्रीडर सीड) बीज या अन्य अच्छा बीज को उगाकर आगे आधारबीज यानि कि फांउडेशन बीज को पैदा करना है। इस तैयार बीज को आगे किसानों का पंजीकरण करवाकर पंजीकृत किसानों को गुणन (मल्टीप्लिकेशन) के लिए दिया जाता है ताकि यह बीज ज्यादा से ज्यादा किसानों को उपलब्ध हो सके।
बीज गुणन प्रक्षेत्र (फार्म) एवं मशीनीकरण:
वर्तमान में आधुनिक कृषि तकनीकों का उपयोग इस फार्म में कृषि कार्यों के लिए किया जा रहा है। जिसमें ट्रैक्टर, कल्टीवेटर, रिपर, बाइन्डर, धान व गेहूं थ्रैसर प्रमुख हैं। इसके अलावा खेतों की मेढ़ों पर उन्नत किस्म की घास को भी लगाया जाता है, जिससे फार्म को एक अच्छी आय प्राप्त हो जाती है। साथ ही आवारा पशुओं से फसलों को बचाने के लिए सोलर फेंसिंग भी गई है।
इसके अतिरिक्त फार्म में एक पॉली टनल तथा 105 वर्गमीटर क्षेत्र में पॉलीहाउस भी लगाया गया है। इस पॉलीहाउस में शिमला मिर्च, टमाटर तथा बेंगन की खेती की जाती है। जबकि पॉली टनल में सब्जी की नर्सरी भी लगाई जाती है। इनसे फार्म को अतिरिक्त आय प्राप्त हो जाती है। कृषि फार्म में सिंचाई के लिए कूहलों का भी निर्माण किया गया है।
क्या कहते हैं अधिकारी:
विषयवाद विशेषज्ञ (एसएमएस) कृषि पधर पूर्ण चंद का कहना है कि जोगिन्दर नगर स्थित बीज गुणन फार्म में मुख्यत: धान व गेंहू के बीज की पैदावार की जाती है। तैयार बीज को कृषि विभाग के भंडारण केंद्र भंगरोटू भेजा जाता है, जहां पर बीज की ग्रेडिंग व पैकेजिंग कर इसे गुणन (मल्टीप्लिकेशन) के लिए पंजीकृत किसानों को आवंटित किया जाता है। तदोपरान्त किसानों द्वारा तैयार बीज को अन्य किसानों को भेजा जाता है ताकि बीज की मांग को पूरा किया जा सके।
फार्म को चलाने के लिए यहां पर एक कृषि विकास अधिकारी, एक कृषि प्रसार अधिकारी तथा एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी को तैनात किया गया है। वर्तमान में एडीओ का पद रिक्त चल रहा है। इसके अलावा फार्म में समय-समय पर फसलों की जरूरत अनुसार कैजुअल श्रमिकों की सेवाएं भी ली जाती है।

Wednesday, 24 June 2020

तुलसी उगाकर किसान प्रति एकड़ अर्जित करें 25 हजार रूपये तक की शुद्ध आए

आयुर्वेद, यूनानी, होम्योपैथी व एलोपैथी दवा निर्माण में तुलसी का होता है इस्तेेमाल
तुलसी की चर्चा शुरू होते ही हमारे सामने प्रत्येक घर के आंगन में उगने वाली तुलसी की तस्वीर सामने आ जाती है। तुलसी भारतीय संस्कृति का एक अहम हिस्सा भी है। धार्मिक आस्था की दृष्टि से घर में तुलसी का पौधा लगाने को न केवल शुभ माना जाता है बल्कि तुलसी की पूजा भी की जाती है। आखिर हो भी क्यों न? तुलसी महज एक पौधा ही नहीं है बल्कि कई औषधीय गुणों का खजाना भी है। घर आंगन में लगा तुलसी का पौधा न केवल विभिन्न कीड़ों व वैक्टीरिया को समाप्त करता है बल्कि हवा को भी शुद्ध बनाता है। ऐसे में यदि किसान तुलसी की खेती को बड़े पैमाने पर शुरू करते हैं तो इससे उन्हे आमदनी बढ़ाने का एक बेहतरीन विकल्प भी मिलेगा। 
हिमाचल प्रदेश की बात करें तो इसकी खेती को समुद्रतल से 900 मीटर ऊंचाई वाले उष्ण कटिबंधीय और उप-उष्ण कटिबंधीय जलवायु वाले क्षेत्र अनुकूल हैं। प्रदेश के मंडी, ऊना, बिलासपुर, सिरमौर, कांगड़ा और सोलन जिलों के निचले क्षेत्रों में इसे आसानी से उगाया जा सकता है। इसकी रोपाई के लिए प्रति एकड़ 80 से 120 ग्राम बीज पर्याप्त होता है। इसका बीज 8-12 दिनों में अंकुरित हो जाता है जबकि नर्सरी पौध 6 सप्ताह में रोपाई के लिए तैयार हो जाती है। पौधों को 40-40 या 40-50 सेंटीमीटर की दूरी पर प्रत्यारोपित करें। तुलसी की पहली फसल को 90-95 जबकि इसके बाद 65-75 दिनों के अंतराल में फसल को काटा जा सकता है। एक एकड़ भूमि से लगभग पांच क्विंटल सूखा पंचांग प्राप्त किया जा सकता है तथा औसतन 80 रूपये प्रति किलोग्राम की दर से 40 हजार रूपये तक की सकल जबकि 25 हजार रूपये तक की शुद्ध आय अर्जित की जा सकती है।
तुलसी एक खास औषधीय महत्व वाला पौधा है। इसके जड़, तना, पत्तियों समेत सभी भाग उपयोगी हैं। तुलसी का इस्तेमाल आयुर्वेदिक, यूनानी, होम्योपैथी व एलोपैथी दवा निर्माण में किया जाता है। इसकी पत्तियों में चमकीला वाष्पशील तेल पाया जाता है जो कीड़ों व वैक्टीरिया के खिलाफ काफी कारगर साबित होता है। तुलसी मुख्यत: तीन प्रकार जिसमें हरी, काली व नीली बैंगनी रंग शामिल है की पत्तियों वाली होती है। तुलसी एक झाड़ी के रूप मेें उगती है तथा इसका पौधा एक से तीन फुट तक ऊंचा होता है। पत्तियां एक से दो इंच लंबी सुगंधित और अंडाकार या आयताकार होती है। बीज चपटे पीतवर्ण के छोटे काले चिन्हों से युक्त अंडाकार होते हैं तथा इसका पौधा सामान्यता दो से तीन वर्ष तक हरा बना रहता है।
तुलसी की खेती सामान्य मिटटी में आसानी से की जा सकती है। इसके लिए गरम जलवायु बेहतर है। तुलसी की नर्सरी फरवरी माह में तैयार, अप्रैल माह में इसकी रोपाई शुरू कर सकते हैं। वास्तव में तुलसी मूलरूप से बरसात की फसल है जिसे गेहूं काटने के बाद लगाया जाता है। यह फसल लगभग 90 दिनों में तैयार हो जाती है तथा इसमें रोग और कीट बहुत ही कम लगते हैं।
क्या कहते हैं अधिकारी:
नेशनल मेडिसिनल प्लांट्स बोर्ड के क्षेत्रीय निदेशक उत्तर भारत स्थित जोगिन्दर नगर डॉ. अरूण चंदन का कहना है कि कोरोना संकट के बीच औषधीय पौधों एवं जड़ी बूटियों की मांग में एकाएक बढ़ौतरी दर्ज हुई है। इस क्षेत्र में स्वरोजगार की अपार संभावनाओं को देखते हुए युवा किसान इस ओर आगे बढ़ सकते हैं। सरकार राष्ट्रीय आयुष मिशन (एनएएम) योजना के तहत औषधीय पौधों की खेती को समुचित वित्तीय सहायता प्रदान कर रही है। उनका कहना है कि सरकार तुलसी की खेती के लिए प्रति हैक्टेयर लगभग 13 हजार रूपये तक की वित्तीय मदद प्रदान करती है। वित्तीय मदद एवं तुलसी की खेती से जुड़ी अन्य जरूरी शर्तों से संबंधित अधिक जानकारी के लिए कृषक निदेशक आयुर्वेद विभाग हिमाचल प्रदेश से संपर्क कर सकते हैं।

Sunday, 7 June 2020

वैश्विक महामारी कोविड-19 एवं भारतीय स्वदेशी विकास मॉडल

वैश्विक महामारी कोरोना वायरस (कोविड-19) से जर्जर परिस्थिति में देश की अर्थ व्यवस्था को दोबारा पटरी पर लाने के लिए प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने देश वासियों को संबोधित करते हुए 20 लाख करोड़ रूपये के एक बड़े आर्थिक पैकेज का ऐलान किया है। निश्चित तौर पर यह आर्थिक पैकेज न केवल हमारी अर्थ व्यवस्था के लिए एक बूस्टर का काम करेगा बल्कि कोरोना महामारी के कारण देश के विभिन्न क्षेत्रों की टूट चुकी कमर को भी सीधा करने में भी बड़ा सहायक सिद्ध होगा।
लेकिन इस आर्थिक पैकेज के बीच फिलवक्त कोरोना वायरस की बात करें तो महामारी से उपचार को लेकर अभी तक दवा व उपचार पद्धति दुनिया में किसी के पास उपलब्ध नहीं है। लेकिन इस दौरान भारत की हाइड्रॉक्सिक्लोरोक्विन जैसी दवा मांगने के लिए दुनिया भर के देश हमारे सामने हाथ जोड़े खड़े हैं। साथ ही आयुर्वेदिक काढ़े व जड़ी बूटियों आदि जिस से शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, की मांग भी लगातार बढ़ रही है। वैश्विक सामाजिक-आर्थिक संरचनाएं भी इस समय निर्रथक सिद्ध हो रही है, और भारत जैसे देश की ओर मुंह ताक रही हैं। ऐसी परिस्थिति में भारतीय प्रतिभा ने अपनी जिस लंबी सोच के आधार पर स्वदेशी प्रतिमान को कभी इस देश में खड़ा किया, कोरोना महामारी से लडख़ड़ाती दुनियां अब इस ओर बड़ी आशा से देख रही है। ऐसे में देश का आर्थिक पुनर्निर्माण कैसे हो यह एक विस्तृत चर्चा का न केवल विषय बन गया है बल्कि प्रत्येक भारतवासी को भी इस मुद्दे पर गंभीरता से मंथन करना होगा।
कोविड-19 की इस वैश्विक महामारी के कारण जहां देश में बड़े पैमाने पर विदेशों के साथ-साथ शहरों से ग्रामीण क्षेत्रों की ओर पलायन हुआ है। ऐसे में ग्रामीण क्षेत्रों में ही रोजगार के नए-नए अवसर सृजित करने की बड़े पैमाने पर जरूरत होगी। ऐसी परिस्थिति में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का ग्राम स्वराज, पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम आजाद का पूरा (PURA Provision of Urban Amenities in Rural Areas) तथा नानाजी देशमुख के समग्र विकास के मॉडल पर गंभीरता से मंथन करने की न केवल आवश्कता है बल्कि इन दृष्टिकोण को केन्द्रित रखकर लाखों कामगारों व कारीगरों को गांव में ही रोजगार उपलब्ध करवाने की दिशा में प्रयास करना होगा। साथ ही जो लोग काम की तलाश में पुन: शहरों की ओर रूख करेंगे उनके लिए किस प्रकार से नए काम धंधे पैदा कर सकते हैं इस दिशा में भी गंभीरता से आत्म मंथन करना होगा।
कोविड-19 महामारी के कारण भारत सहित पूरी दुनिया के उद्योगों को न केवल बड़ा झटका लगा है बल्कि वैश्विक स्तर पर मांग में भी कमी आ रही है। ऐसे परिस्थिति में देश के लाखों कामगारों को कार्य कौशलता के आधार पर रोजगार के नए अवसर सृजित करना एक बड़ी चुनौती रहेगी। जहां तक उद्योगों की बात है तो लंबे लॉकडाउन तथा बड़ी संख्या में श्रम शक्ति के पलायन के कारण उनकी वर्तमान स्थिति पर भी विपरीत प्रभाव पड़ा है। मुमकीन है कि अधिकतर उद्योग भारी घाटे के कारण श्रमिकों व कामगारों को उनकी क्षमता के आधार पर पुन: रोजगार उपलब्ध करवाने में सक्षम न हो। ऐसे में आपसी सदभाव व समन्वय पैदा कर उद्योगों व श्रमिकों को कहीं न कहीं अपने हितों से समझौता करते हुए कार्य करने की जरूरत होगी। इससे न केवल पुर्ननिर्माण को बल मिलेगा बल्कि दोनो पक्षों के हित आने वाले वक्त के लिए कारगर सिद्ध हो सकेगें।
लेकिन इन सबसे आगे बढक़र हमें विकास के स्वदेशी यानि की भारतीय मॉडल पर गंभीरता से काम करना होगा। पिछले दिनों प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने देश भर के सरपंचों से बातचीत में स्वावलंबन शब्द पर फोकस करते हुए इस दिशा में आगे बढऩे के संकेत भी दिए हैं। साथ ही स्व शब्द पर जोर देते हुए स्वदेशी मॉडल को विकसित करने की भी बात कही है। देश वासियों को संबोधित करते हुए प्रधान मंत्री ने देश को आत्म निर्भर बनाने की दिशा में कोरोना महामारी की चुनौती को अवसर में बदलने के लिए मिलकर काम करने का भी आहवान किया है। साथ ही अर्थ व्यवस्था को गति प्रदान करने के लिए विशेष आर्थिक पैकेज का ऐलान भी निश्चित तौर पर भारतीय विकास मॉडल में एक अहम कदम साबित हो सकता है।
स्वदेशी विकास मॉडल की दिशा में अब शासन, प्रशासन तथा समाज को मिलकर बड़ी भूमिका निभानी होगी। सरपंचों के साथ वार्तालाप के दौरान नरेंद्र मोदी ने आत्मनिर्भर स्वदेशी मॉडल के चार पायदान गिनाए हैं जिनमें गांव, जिला, प्रांत व देश शामिल है। मॉडल को धरातल पर उतारने के लिए समाज के साथ-साथ शासन व प्रशासन को बड़ी गंभीरता से कार्य करने की आवश्यकता होगी। हमें इस बात पर गौर करना होगा कि हमें जो जीवन के लिए आवश्यक होगा उसे यहां गुणवत्ता पर समझौता किये बिना तैयार करना होगा। विदेशी आयात पर निर्भरता कम करनी होगी, जिसमें विशेषकर चीन एक बड़ी चुनौती रहेगा। कोरोना महामारी के बीच चीन न केवल भारत बल्कि दुनिया की तमाम आर्थिक ताकतों के लिए भी खतरे की घंटी बजा रहा है। साथ ही चीन सहित दुनिया भर की कई कंपनियां भारत में आने को व्याकुल है, ऐसे में आने वाला वक्त बड़ा महत्वपूर्ण होगा। बशर्ते कि हम इसके लिए तैयार हो जाएं।
ऐसा भी नहीं है कि आज भारत का स्वदेशी मॉडल किसी स्तर पर कम है। कम्प्यूटर, परमाणु विज्ञान, स्पेस टेक्रोलॉजी के क्षेत्र में हमने बड़ी उड़ान भरी है। पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छता, जैविक कृषि, गौ उत्पादन, योग व आयुर्वेद के प्रति भी हमें तेजी से कदम बढ़ाने होंगे। इस दिशा में अमूल व पतंजलि जैसे स्वदेशी मॉडल के सफल प्रयोग प्रोत्साहन का कार्य कर सकते हैं।
लेकिन स्वदेशी मॉडल पर आगे बढऩे से पहले हमें अपनी कार्यप्रणाली को भी स्वदेशी मॉडल के आधार पर तैयार करना होगा। हमें यह नहीं भूलना है कि कहीं न कहीं अभी भी हमारी वर्तमान कार्यप्रणाली अंग्रेजों द्वारा पैदा की हुई मानसिकता पर ही केन्द्रित है जिसे अब भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप विकसित करना होगा। कुल मिलाकर आने वाला वक्त भारतवासियों के लिए न केवल एक स्वर्णिम समय सिद्ध हो सकता है बल्कि विकास की राह पर देश को नई दिशा प्रदान कर सकता है।

Wednesday, 20 May 2020

शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है औषधीय गुणों से भरपूर 'काफलÓ

हिमालय के एक विशेष क्षेत्र में जंगली तौर पर पाया जाता है यह फल, कई रोगों में है रामबाण
हिमाचल प्रदेश सहित हिमालय के अन्य क्षेत्रों में जंगली तौर पर पाया जाने वाला फल 'काफलÓ कई औषधीय गुणों से भरपूर होने के कारण शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने का काम करता है। प्रति वर्ष अप्रैल से जून माह के बीच काफल पक कर तैयार हो जाता है। काफल आर्थिक तौर पर भी स्थानीय लोगों के लिए लाभकारी सिद्ध होता है। काफल के कारण प्रतिवर्ष स्थानीय लोग बड़ी मात्रा में इसकी खेप को आसपास के स्थानीय बाजारों में पहुंचाकर काफी लाभ अर्जित करते हैं।


काफल जंगली तौर पर पाया जाने वाला एक फल ही नहीं है बल्कि हमारे शरीर में एक औषधी का काम भी करता है। काफल में विटामिन्स, आयरन और एंटी ऑक्सीडेंन्टस प्रचूर मात्रा में पाये जाते हैं। इसके साथ ही यह कई तरह के प्राकृतिक तत्वों जैसे माइरिकेटिन, मैरिकिट्रिन और ग्लाइकोसाइड्स से भी परिपूर्ण है। इसकी पत्तियों में लावेन -4-हाइड्रोक्सी-3 पाया जाता है। काफल के पेड़ की छाल, फल तथा पत्तियां भी औषधीय गुणों के लिये जानी जाती है। काफल की छाल में एंटी इन्फलैमेटरी, एंटी-हेल्मिंथिक, एंटी-माइक्रोबियल, एंटी-ऑक्सीडेंट और एंटी-माइक्रोबियल क्वालिटी पाई जाती है। इतने गुणों से परिपूर्ण काफल न केवल रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है बल्कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारी की रोकथाम का भी काम करता है। काफल का अत्यधिक रस-युक्त फल पाचक होता है। काफल के फल के ऊपर लगा भूरे व काले धब्बों से युक्त मोर्टिल मोम अल्सर की बीमारी में प्रभावी माना गया है। काफल का फल खाने से पेट के कई प्रकार के विकार दूर होते हैं। साथ ही इसका सेवन मानसिक बीमारियों समेत कई प्रकार के रोगों के लिए भी फायदेमन्द माना गया है। इसके पेड़ की छाल का सार, अदरक तथा दालचीनी का मिश्रण अस्थमा, डायरिया, बुखार, टाइफाइड, पेचिश तथा फेफड़े से ग्रस्त बीमारियों के लिए अत्यधिक उपयोगी माना गया है। साथ ही काफल के पेड़ की छाल का पाउडर जुकाम, आँख की बीमारी तथा सरदर्द में सूँधनी के रूप में प्रयोग में लाया जाता है। 


काफलड़ी चूर्ण को अदरक के जूस तथा शहद के साथ मिलाकर उपयोग करने से गले की बीमारी, खाँसी तथा अस्थमा जैसे रोगों से मुक्ति दिलाने में मददगार होता है। इसके अलावा काफल की छाल दांत दर्द तथा छाल का तेल कान दर्द के लिये भी अत्यधिक उपयोगी माना गया है। यही नहीं काफल के फूल का तेल भी कान दर्द, डायरिया तथा लकवे की बीमारी में उपयोग के साथ-साथ हृदय रोग, मधुमेय रोग उच्च एंव निम्न रक्त चाप को नियान्त्रित करने में भी सहायक होता है।
कहां पाया जाता है काफल
काफल उत्तरी भारत और नेपाल के पर्वतीय क्षेत्र, मुख्यत हिमालय की तलहटी क्षेत्रों में पाया जाने वाला सदा हरा भरा रहने वाला एक काष्ठीय वृक्ष प्रजाति है। काफल का पेड़ 1300 मीटर से 2100 मीटर (4000 फीट से 6000 फीट) तक की ऊँचाई पर प्राकृतिक रूप से पैदा होने वाला बृक्ष है। काफल अधिकतर हिमाचल प्रदेश, उतराखंड, उत्तर-पूर्वी राज्य मेघालय और नेपाल में बहुतायत मात्रा में पाया जाता है। काफल को बॉक्स मर्टल और बेबेरी के नाम से भी जाना जाता है।
कैसा होता है काफल का फल
काफल खाने में स्वादिष्ठ, रंग में हरा, लाल और काले रंग का फल है। इस फल को वैज्ञानिक तौर पर माइरिका एस्कुलेंटा के नाम से भी जाना जाता है। काफल का फल गर्मी में शरीर को ठंडक प्रदान करता है। साथ ही इसके फल को खाने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है।
क्या कहते हैं अधिकारी
नेशनल मेडिसिनल प्लांट्स बोर्ड के क्षेत्रीय निदेशक, क्षेत्रीय एवं सुगमता केंद्र उत्तर भारत स्थित जोगिन्दर नगर डॉ. अरूण चंदन का कहना है कि काफल जंगली तौर पर पाया जाना वाला एक विशेष मौसमी फल है। औषधीय गुणों से भरपूर यह फल शरीर में प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने का काम करता है। इस फल के सेवन से कई तरह की बीमारियों से बचाव होता है तथा इसके कारण स्थानीय लोगों की आर्थिकी को भी बल मिलता है।