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Sunday, 6 September 2026

मजदूरों के उत्थान में मददगार बन रहा भवन एवं अन्य निर्माण कामगार कल्याण बोर्ड

  विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से हो रहा कामगार परिवारों का सशक्तिकरण

जिला बिलासपुर में शिक्षा सहायता योजना के माध्यम से पूरे हो रहे हैं बच्चों की शिक्षा के सपने

मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू के नेतृत्व में हिमाचल प्रदेश भवन एवं अन्य सन्निर्माण कामगार कल्याण बोर्ड श्रमिकों और उनके परिवारों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। प्रदेश सरकार द्वारा कामगार कल्याण बोर्ड के माध्यम से संचालित विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं से न केवल श्रमिक परिवारों को आर्थिक एवं सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित हो रही है बल्कि परिवारों का सशक्तिकरण भी हो रहा है। सरकार के प्रयासों से न केवल अब श्रमिक परिवार आर्थिक, सामाजिक दृष्टि से मजबूत हो रहे हैं बल्कि शिक्षा सहायता योजना के माध्यम से इन परिवारों के बच्चे एमबीबीएस, एमएससी, एमकॉम, बीएससी, बीबीए जैसी जैसी व्यावसायिक एवं उच्च शिक्षा प्राप्त कर अपने उज्ज्वल भविष्य का निर्माण कर रहे हैं।

जिला बिलासपुर में ऐसे कई परिवार हैं जिनके लिए कामगार कल्याण बोर्ड की शिक्षा सहायता योजना सहित अन्य योजनाएं लाभकारी साबित हो रही हैं। जब जिला के घुमारवीं तहसील की ग्राम पंचायत फटोह के गांव रोपा निवासी 56 वर्षीय रवि दत्त से बातचीत की तो उनका कहना है कि वह लगभग 25 वर्षों से पेंटर एवं मजदूरी का काम कर रहे हैं। उन्हें लगभग 10-12 वर्ष पूर्व हिमाचल प्रदेश भवन एवं अन्य सन्निर्माण कामगार कल्याण बोर्ड की योजनाओं की जानकारी प्राप्त हुई तथा स्वयं को पंजीकृत कराया तथा बोर्ड के माध्यम से समय-समय पर अनेक योजनाओं का लाभ प्राप्त हुआ।

रविदत्त बताते हैं कि उनके बच्चों को स्कूली शिक्षा के दौरान छात्रवृत्ति का लाभ मिला। उनकी एक बेटी ने एमएससी तक की शिक्षा पूरी की, जिसके उपरांत इस वर्ष उसकी शादी के लिए सरकार की ओर से 60 हजार रुपये की आर्थिक सहायता प्राप्त हुई। उनकी दूसरी बेटी वर्तमान में डॉ. राधाकृष्णन राजकीय मेडिकल कॉलेज, हमीरपुर में एमबीबीएस की पढ़ाई कर रही है, जिसके लिए उन्हें इस वर्ष 1.20 लाख रुपये की शिक्षा सहायता प्रदान की गई। वहीं उनका बेटा बीएससी की शिक्षा पूरी करने के बाद आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

वह कहते हैं कि कामगार कल्याण बोर्ड से प्राप्त आर्थिक सहयोग के कारण बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दिलाने के साथ-साथ आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद बेटी का विवाह भी सम्मान पूर्वक संपन्न करा सके। कामगर बोर्ड की यह सहायता श्रमिक परिवारों के लिए किसी संबल से कम नहीं है।
इसी प्रकार घुमारवीं के वार्ड नंबर-3 निवासी 56 वर्षीय कृष्ण चंद के लिए भी कामगार कल्याण बोर्ड की योजनाएं अत्यंत लाभकारी सिद्ध हुई हैं। तीन बेटियों और एक बेटे के पिता कृष्ण चंद पिछले लगभग 35 से 40 वर्षों से पेंट का कार्य कर अपने परिवार का पालन-पोषण कर रहे हैं। वह बताते हैं कि वर्ष 2013 में उन्हें बोर्ड की योजनाओं की जानकारी मिली, जिसके बाद स्वयं को पंजीकृत कराया। इसके पश्चात बच्चों को स्कूली शिक्षा के दौरान छात्रवृत्ति का लाभ मिलता रहा। उनके बच्चों ने बी.कॉम., पॉलिटेक्निक तथा बीबीए जैसी उच्च शिक्षा प्राप्त की और आज अपने करियर की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

कृष्ण चंद बताते हैं कि बेटी के विवाह के लिए 51 हजार रुपये तथा बेटे को छात्रवृत्ति के रूप में 11 हजार रुपये की सहायता प्राप्त हुई। इसके अतिरिक्त उन्हें चिकित्सा सहायता योजना का लाभ भी मिल रहा है, जिससे उपचार संबंधी खर्च का बोझ काफी कम हुआ है।

दोनों लाभार्थियों ने प्रदेश सरकार का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि कामगार कल्याण बोर्ड की योजनाएं श्रमिकों के जीवन में वास्तविक परिवर्तन ला रही हैं। इन योजनाओं ने न केवल आर्थिक संबल प्रदान किया है, बल्कि उनके बच्चों को बेहतर शिक्षा एवं उज्ज्वल भविष्य सुनिश्चित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

क्या कहते हैं अधिकारी:

उपायुक्त बिलासपुर राहुल कुमार का कहना है कि जिला बिलासपुर में कामगार कल्याण बोर्ड के माध्यम से संचालित विवाह सहायता योजना के अंतर्गत 968 लाभार्थियों को लगभग 5 करोड़ रुपये की सहायता राशि वितरित की गई है। जिससे श्रमिक परिवारों को बेटियों और बच्चों के विवाह जैसे महत्वपूर्ण सामाजिक दायित्वों को पूरा करने में बड़ी राहत मिली है। इसी तरह शिक्षा सहायता योजना के अंतर्गत 503 लाभार्थियों को लगभग 1.48 करोड़ रुपये की सहायता प्रदान की गई है। शिक्षा के क्षेत्र में दी जा रही यह सहायता श्रमिकों के बच्चों को बेहतर भविष्य निर्माण में न केवल सहायक सिद्ध हो रही है बल्कि आर्थिक तंगी के कारण पढ़ाई बीच में छोड़ने की स्थिति को रोकने में भी यह योजना महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

क्या कहते हैं मंत्री:

नगर व ग्राम नियोजन, आवास, तकनीकी शिक्षा, व्यावसायिक एवं औद्योगिक प्रशिक्षण मंत्री राजेश धर्माणी ने कहा कि मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू के नेतृत्व में प्रदेश सरकार निर्माण श्रमिकों के कल्याण एवं उत्थान के लिए पूरी प्रतिबद्धता के साथ कार्य कर रही है। इसी उद्देश्य से हिमाचल प्रदेश भवन एवं अन्य सन्निर्माण कामगार कल्याण बोर्ड के माध्यम से अनेक जनकल्याणकारी योजनाएं प्रभावी ढंग से संचालित की जा रही हैं।
उन्होंने कहा कि जिला बिलासपुर में बोर्ड के अंतर्गत लगभग 50 हजार निर्माण श्रमिक पंजीकृत हैं। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि श्रमिक वर्ग का प्रदेश सरकार की कल्याणकारी नीतियों एवं योजनाओं पर विश्वास लगातार बढ़ रहा है। सरकार भविष्य में भी श्रमिकों और उनके परिवारों के सामाजिक एवं आर्थिक सशक्तीकरण के लिए इसी प्रकार कार्य करती रहेगी।
-000- DOP 28/07/2026

जिला बिलासपुर में जापानी फल देगा बागवानों की आर्थिकी को मजबूती

  घुमारवीं उपमंडल की ग्राम पंचायत लंझता में जापानी फल का कलस्टर रोपित

3.5 हेक्टेयर क्षेत्र में 37 किसानों की जमीन पर रोपित किये हैं 2019 पौधे

जिला बिलासपुर के उपमंडल घुमारवीं की ग्राम पंचायत लंझता में एचपी शिवा परियोजना के माध्यम से जापानी फल का कलस्टर तैयार किया जा रहा है। लगभग 3.5 हेक्टेयर क्षेत्र में स्थापित इस क्लस्टर में कुल 37 किसानों की जमीन पर 2019 पौधों को इस वर्ष फरवरी माह में रोपित किया गया है। इस क्लस्टर के पूरी तरह क्रियाशील हो जाने पर जहां किसानों एवं बागवानों की आर्थिकी सुधार में एक अहम कदम साबित होगा तो वहीं जिला बिलासपुर जापानी फल तैयार कर प्रदेश के बागवानी क्षेत्र में एक अलग पहचान स्थापित होगी।

प्रदेश बागवानी विभाग द्वारा एचपी शिवा परियोजना के माध्यम से लंझता क्लस्टर में फूयू प्रजाति के जापानी फल के पौधों को 4 गुणा 4 क्षेत्रफल की दृष्टि से सफलतापूर्वक रोपित किया जा चुका है तथा प्रत्येक पौधे की जियो टैगिंग की गई है। जिससे जहां भविष्य में प्रत्येक पौधे की उपज से लेकर मार्केट तक की पहुंच की निगरानी की जा सकेगी तो वहीं बागवानों को भी बेहतर दाम प्राप्त करने में मदद मिलेगी। जिला बिलासपुर में जहां जापानी फल का यह दूसरा जबकि घुमारवीं उपमंडल का पहला क्लस्टर है।
इस बीच किसान बहुफसली खेती (मल्टी क्रॉप) के तहत लहसुन, प्याज, मिर्च, गेहूं इत्यादि की फसलें भी तैयार कर रहे हैं जिससे उन्हें न केवल अतिरिक्त आमदन होगी बल्कि क्लस्टर में स्थापित जापानी फल के पौधों का बेहतर पोषण भी हो सकेगा।
क्या कहते हैं किसान:
इस संबंध में लाभान्वित किसान अंजलि ठाकुर का कहना है कि बागवानी विभाग के अंतर्गत एचपी शिवा परियोजना के माध्यम से उन्हें जापानी फल का बागीचा तैयार करने का अवसर मिला है। पहले यह जमीन बेकार पड़ी थी, लेकिन अब जापानी फल के पौधे रोपित हो जाने से जहां भविष्य में बेहतर आमदनी होने की उम्मीद है तो वहीं सिंचाई के लिए पानी की सुविधा प्राप्त हो जाने से इस समस्या का भी समाधान हुआ है। उन्होंने अपनी जमीन में 235 जापानी फल के पौधे रोपित किये हैं।
इसी तरह लाभान्वित किसान राजकुमारी का कहना है कि पहले जमीन में आवारा पशुओं एवं जंगली जानवरों के आंतक के कारण न केवल फसलों को भारी नुक्सान होता था बल्कि जमीन को बंजर छोड़ दिया था। लेकिन अब एचपी शिवा परियोजना के माध्यम से जापानी फल के पौधे रोपित होने तथा बाड़बंदी के कारण अब उन्हें पारंपरिक फसलों का भी लाभ मिलने लगा है तथा भविष्य में जापानी फल उनकी आर्थिकी को मजबूती प्रदान करेगा।
इसी तरह लाभान्वित किसान पवन कुमार का कहना है कि पौधों की देखरेख, दवाई इत्यादि की तकनीकी जानकारी बागवानी विभाग के अधिकारियों के माध्यम से उन्हें नियमित प्राप्त हो रही है। उनका कहना है कि आगामी 5-6 वर्षों के उपरांत इस बागीचे से सेब की तरह जापानी फल से भी अच्छी आमदनी प्राप्त होगी, जिससे आर्थिक स्थिति बेहतर होने की उम्मीद जताई।
सभी लाभान्वित किसानों ने एचपी शिवा परियोजना के माध्यम से जापानी फल का बागीचा रोपित करने तथा पौधों की सुरक्षा के लिए बाड़बंदी के साथ-साथ सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध करवाने के लिए प्रदेश सरकार का आभार जताया।
क्या कहते हैं अधिकारी:
विभागीय अधिकारियों का कहना है कि घुमारवीं उपमंडल के लंझता में एचपी शिवा परियोजना के माध्यम से पहली बार जापानी फल का बगीचा रोपित किया है। इस बगीचे से अगले तीन वर्षों के उपरांत बेहतर उत्पादन होने की उम्मीद है जिससे इस क्षेत्र के लगभग तीन दर्जन किसान लाभान्वित होंगे।
उनका कहना है कि तैयार उत्पादों को बाजार तक पहुंचाने के लिए लाभान्वित किसानों की एक समिति कम्युनिटी हॉर्टिकल्चर प्रोड्यूस मार्केटिंग एजेंसी गठित की गई है। इस समिति के माध्यम से विपणन की सभी संभावनाओं पर कार्य करते हुए किसानों को उत्पाद के अच्छे दाम प्राप्त हों कार्य किया जाएगा।
उपायुक्त बिलासपुर राहुल कुमार का कहना है जिला बिलासपुर में जापानी फल का कलस्टर आने वाले समय में ग्रामीणों की आर्थिकी को मजबूती प्रदान करने में अहम साबित होगा। उन्होंने किसानों एवं बागवानों से सरकार की विभिन्न योजनाओं एवं कार्यक्रमों का लाभ उठाने का आह्वान किया है ताकि उनकी आर्थिकी को अतिरिक्त बल प्रदान किया जा सके।
प्रदेश के 7 जिलों के 52 विकास खंडों में लागू हो रही है एचपी शिवा परियोजना
6 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में 400 कलस्टर किये जा रहे हैं विकसित, 15 हजार किसान परिवार होंगे लाभान्वित
हिमाचल प्रदेश में एचपी शिवा परियोजना लगभग 1 हजार 292 करोड़ रूपये की लागत से प्रदेश के बिलासपुर, हमीरपुर, कांगड़ा, मंडी, सोलन, सिरमौर और ऊना जिलों के 52 विकास खंडों में चरणबद्ध तरीके से लागू की जा रही है।
इस परियोजना के माध्यम से लगभग 6 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में 400 कलस्टर विकसित किये जा रहे हैं, जिससे लगभग 15 हजार किसान परिवार सीधे लाभान्वित होंगे और किसानों को सब ट्रापिकल फलों जैसे मीठा संतरा, अमरूद, अनार, लीची, आम, पलम, जापानी फल इत्यादि की आधुनिक, व्यावसायिक तथा मार्केट आधारित खेती के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। प्रदेश भर में अबतक लगभग एक हजार 140 हेक्टेयर क्षेत्र में फलदार पौधों का रोपण सफलतापूर्वक किया गया है।
इस परियोजना के माध्यम से अब तक लगभग 330 करोड़ रूपये व्यय किये जा चुके हैं तथा वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए लगभग 325 करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया है।
-000-  DOP 13/07/2026








लीची के बागों से महकने लगी बिलासपुर के लंझता गांव की धरती

  13.5 हेक्टेयर क्षेत्र में 54 किसानों ने रोपित किये हैं दस हजार से अधिक लीची के पौधे

एचपी शिवा परियोजना ने किसानों को दी समृद्धि की नई राह, अब फल देने लगे हैं वर्षों की मेहनत के पौधे

जिला बिलासपुर के घुमारवीं उपमंडल की ग्राम पंचायत लंझता आज अपनी पहचान बदल रही है। यहां खेतों में अब केवल मौसमी फसलें ही नहीं, बल्कि लीची के हरे-भरे बाग भी भविष्य की समृद्धि का संदेश दे रहे हैं। प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी एचपी शिवा परियोजना ने इस बदलाव की मजबूत नींव रखी है। कुछ वर्ष पहले तक जिन किसानों के लिए व्यावसायिक फलोत्पादन केवल एक कल्पना मात्र था, आज वही किसान अपने बागों में लगने वाले फलों को देखकर न केवल उत्साहित हैं बल्कि भविष्य में आर्थिक समृद्धि के लिए भी आशान्वित हैं।

गांव में इस परिवर्तन की शुरुआत वर्ष 2019-20 में हुई, जब ग्राम पंचायत लंझता को एचपी शिवा परियोजना के अंतर्गत फ्रंट लाइन डेमोस्ट्रेशन (एफएलडी) के लिए चयनित किया गया। प्रारंभिक चरण में 500 लीची के पौधों का रोपण किया गया। किसानों की सकारात्मक प्रतिक्रिया और परियोजना के सफल क्रियान्वयन ने इस पहल को गति दी। परिणामस्वरूप वर्ष 2020-21 तथा 2021-22 में 9,505 अतिरिक्त पौधों का रोपण किया गया। आज यह प्रयास एक संगठित लीची क्लस्टर का रूप ले चुका है, जहां लगभग 13.5 हेक्टेयर क्षेत्र में 54 किसान आधुनिक लीची फलोत्पादन से जुड़े हैं।
किसी भी बागवानी परियोजना की सफलता केवल पौधे लगाने तक सीमित नहीं होती है, बल्कि पौधों के संरक्षण, सिंचाई और वैज्ञानिक देखभाल के लिए मजबूत आधारभूत सुविधाओं की आवश्यकता भी रहती है। इसी परियोजना के अंतर्गत पौधों की सिंचाई के लिए एक लाख लीटर क्षमता का विशाल जल भंडारण टैंक तथा 20-20 हजार लीटर क्षमता के सात अन्य टैंक निर्मित किए गए हैं। साथ ही बागवानी विभाग के अधिकारी समय-समय पर किसानों का तकनीकी एवं वैज्ञानिक तौर पर मार्गदर्शन भी प्रदान कर रहे हैं। इन तमाम प्रयासों एवं सुविधाओं ने जहां किसानों को सिंचाई संबंधी चिंताओं से काफी हद तक राहत प्रदान की है तो वहीं पौधों की नियमित देखभाल एवं निगरानी से पौधों का बेहतर विकास भी सुनिश्चित हुआ है।

इस संबंध में जब लाभार्थी किसान प्रकाश चंद से बातचीत की तो उनके चेहरे की मुस्कान ने इस परियोजना की सफलता की सबसे बड़ी गवाही दी। उन्होंने अपनी जमीन में लगभग 850 लीची के पौधे लगाए हैं। वे कहते हैं कि जब पौधे लगाए गए थे, तब भरोसा नहीं था कि कुछ वर्षों बाद यही पौधे उनकी आय का महत्वपूर्ण स्रोत बनेंगे। लेकिन आज उन्हीं पौधों पर फल आना शुरू हो गया है। वे कहते हैं, यह केवल लीची का फल नहीं, बल्कि हमारी वर्षों की मेहनत और उम्मीदों का परिणाम है। आने वाले वर्षों में उत्पादन बढ़ेगा तो निश्चित रूप से हमारे परिवार की आर्थिक स्थिति पहले से कहीं अधिक मजबूत होगी।
इसी तरह एक अन्य लाभार्थी किसान लता देवी ने भी अपनी भूमि में 834 लीची के पौधे लगाए हैं तथा पिछले वर्ष से पौधों पर अच्छी गुणवत्ता के फल आने लग गए हैं। वह विश्वास के साथ कहती हैं कि जैसे-जैसे पौधे अधिक परिपक्व होंगे, उन्हें अच्छी फसल प्राप्त होने पर आय में भी वृद्धि होगी। लता देवी कहती हैं कि लीची जैसे व्यावसायिक फलोत्पादन ने उन जैसी अनेक ग्रामीण महिलाओं के लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता की नई संभावनाएं के द्वार खोले हैं।

किसानों का कहना है कि गत वर्ष इस क्लस्टर से लगभग 12 से 15 क्विंटल लीची का उत्पादन प्राप्त हुआ था, लेकिन इस वर्ष मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण उत्पादन लगभग 4 से 5 क्विंटल ही हुआ है। उनका कहना है कि पौधों की बढ़ती आयु के साथ-साथ उत्पादन में स्वाभाविक रूप से वृद्धि होगी और आने वाले वर्षों में यह क्लस्टर कहीं अधिक बेहतर परिणाम देगा।
उद्यान विभाग के अधिकारियों के अनुसार एचपी शिवा परियोजना के अंतर्गत लंझता में प्रथम चरण में एफएलडी तथा दूसरे चरण में पीआरएफ क्लस्टर विकसित किया गया है। इसमें उच्च घनत्व (हाई डेंसिटी) पद्धति से पौधरोपण किया गया है, ताकि सीमित भूमि पर अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सके। विभाग किसानों को नियमित तकनीकी मार्गदर्शन, प्रशिक्षण तथा आवश्यक परामर्श उपलब्ध करा रहा है, जिससे वैज्ञानिक बागवानी को बढ़ावा मिल रहा है। क्लस्टर में पौधों एवं फलों को जंगली जानवरों तथा बेसहारा पशुओं से बचाने के लिए बाड़बंदी भी की गई है। उनका कहना है कि आने वाले वर्षों में लीची का यह क्लस्टर जुड़े परिवारों की आर्थिक समृद्धि का मजबूत आधार बनेगा।

उपायुक्त बिलासपुर राहुल कुमार का कहना है कि एचपी शिवा परियोजना ने यह सिद्ध किया है कि यदि योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन, आधुनिक तकनीक और किसानों की मेहनत एक साथ जुड़ जाए तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा और नई गति दी जा सकती है। जिला के लंझता गांव के हरे-भरे लीची के बाग आज इसी सकारात्मक परिवर्तन के साक्षी बने हैं। जिला प्रशासन का भी यह प्रयास रहता है कि संबंधित विभागों के माध्यम से सरकारी योजनाओं का समयबद्ध एवं बेहतर क्रियान्वयन सुनिश्चित हो ताकि योजनाओं का समयबद्ध लाभ पात्रों तक पहुंच सके तथा उनके जीवन में सकारात्मक एवं आर्थिक बदलाव लाया जा सके।  
-000- DOP 07/07/2026






प्रदेश में कोकून का एमएसपी बढ़ने से रेशमकीट पालकों को मिल रहे हैं बेहतर दाम

  खुली बोली से किसानों को मिला 1,960 रूपये प्रति किलो तक का अधिकत्तम मूल्य 

जिला में 3 हजार किसान कोकून बेचने को पंजीकृत, इस वर्ष 6.6 मीट्रिक टन उत्पादन का लक्ष्य  

हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा कोकून के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में की गई उल्लेखनीय वृद्धि तथा खुली बोली प्रणाली के माध्यम से किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य प्राप्त हो रहा है। सरकार के इस महत्वपूर्ण कदम से प्रदेश में न केवल रेशम कीट उत्पादन क्षेत्र को नई गति मिली है बल्कि कोकून उत्पादन में वृद्धि दर्ज होने के साथ-साथ किसानों की आय में भी बढ़ौतरी हो रही है। जिला बिलासपुर के घुमारवीं स्थित कोकून मंडी में खुली बोली के माध्यम से कोकून को 1,960 रूपये प्रति किलोग्राम तक का रिकॉर्ड मूल्य प्राप्त हुआ है, जो राज्य के रेशम कीट पालन क्षेत्र के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि है।

घुमारवीं कोकून मंडी में गांव पटटा तहसील घुमारवीं से पहुंची किसान मीरा देवी से बातचीत की तो उनका कहना है कि वह पिछले लगभग 40-50 वर्षों से रेशम कीट पालन का कार्य कर रही है, इससे उन्हें काफी लाभ मिला है। उन्होंने कहा कि वर्ष में मात्र 20 से 25 दिन रेशम कीट पालन के कार्य को बेहतर ढ़ंग से कर लिया जाए तो किसान एक अच्छी अतिरिक्त आमदनी प्राप्त कर सकता है। उन्होंने ज्यादा से ज्यादा किसानों से रेशम कीट पालन से जुड़कर अतिरिक्त आय सृजित करने का आह्वान किया है।

इसी तरह घुमारवीं क्षेत्र के गांव लढे़त के किसान विशन दास शर्मा का कहना है कि रेशमकीट पालन के कार्य को मात्र एक या दो सप्ताह कड़ी मेहनत करके किया जाए तो किसान कोकून बेचकर एक अच्छी अतिरिक्त आदमी प्राप्त कर सकते हैं। उनका कहना है कि कोकून का मार्केट में औसतन दाम एक हजार से लेकर 1500 रूपये प्रति किलोग्राम तक आसानी से प्राप्त हो जाता है। उन्होंने किसानों विशेषकर बेरोजगार युवाओं से रेशम कीट पालन को अतिरिक्त आय सृजन का स्त्रोत बनाने के लिए जुड़ने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि इस कार्य में बेहद कम लागत पर अच्छी आय प्राप्त की जा सकती है।

मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविन्द्र सिंह सुक्खू के नेतृत्व में राज्य सरकार ने इस वर्ष ए-ग्रेड कोकून का न्यूनतम समर्थन मूल्य 1,100 रूपये से बढ़ाकर 1,280 रूपये प्रति किलोग्राम निर्धारित किया है। इसके अतिरिक्त बी-ग्रेड कोकून के लिए 1,225 रूपये, सी-ग्रेड के लिए 1,150 रूपये तथा इन्फीरियर गुणवत्ता के कोकून के लिए 1,000 रूपये प्रति किलोग्राम न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किया है।

रेशम कीट पालन क्षेत्र में प्रदेश सरकार के निरंतर प्रयासों के चलते जिला बिलासपुर में रेशम उत्पादन से जुड़े किसानों की संख्या में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज हुई है। इस वर्ष जिला बिलासपुर के लगभग 3,000 किसानों ने कोकून बेचने को पंजीकरण करवाया है, जबकि पिछले वर्ष यह संख्या 1,750 थी।
प्रदेश सरकार ने रेशम कीट पालन क्षेत्र को सुदृढ़ बनाने को वर्ष 2026-27 में हिम सिल्क मिशन की शुरूआत करते हुए 2 करोड़ रूपये का बजटीय प्रावधान किया है। इस मिशन के अंतर्गत शहतूत पौधरोपण का विस्तार, उच्च गुणवत्तायुक्त कोकून उत्पादन को बढ़ावा देना, आधुनिक तकनीकों का प्रसार, विपणन सुविधाओं का सुदृढ़ीकरण तथा युवाओं एवं महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने पर विशेष बल दिया जाएगा। सरकार का लक्ष्य उत्पादन, प्रसंस्करण, विपणन और मूल्य संवर्धन की पूरी रेशम श्रृंखला को मजबूत बनाकर किसानों की आय में स्थायी वृद्धि सुनिश्चित करना है।
जिला बिलासपुर में इस लगभग 6.6 मीट्रिक टन कोकून उत्पादन होने की संभावना है, जबकि पिछले वर्ष यह आंकड़ा 5.4 मीट्रिक टन दर्ज रहा था।

क्या कहते हैं अधिकारी:

उपनिदेशक रेशम बलदेव चैहान ने बताया कि प्रदेश सरकार रेशम कीट पालन को बढ़ावा देने के लिए अनेक योजनाओं को क्रियान्वित कर रही है, जिसमें सिल्क समग्र-दो, राष्ट्रीय कृषि विकास योजना तथा राज्य उत्प्रेरक विकास योजना शामिल है। इन योजनाओं के माध्यम से रेशम कीट पालन भवन निर्माण सहायता, रेशम कीट पालन सामग्री के साथ-साथ प्रशिक्षण तथा जागरूकता कार्यक्रम भी आयोजित किये जाते हैं।

उन्होंने बताया कि प्रदेश सरकार प्रति किसान 80 रुपये में रेशम कीट का बीज उपलब्ध करवा रही है, जिससे एक किसान 15 से 20 किलोग्राम सूखा कोकून तैयार कर लगभग 20 से 25 हजार रुपये की अतिरिक्त आमदनी प्राप्त कर रहा है।
इस वर्ष घुमारवीं स्थित कोकून मंडी में कर्नाटक और पश्चिम बंगाल सहित विभिन्न राज्यों के व्यापारी खरीद प्रक्रिया में शामिल हुए हैं। प्रतिस्पर्धी बोली के कारण किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य से कहीं अधिक दाम प्राप्त हुए हैं। खुली बोली के दौरान कोकून को 1,960 रुपये प्रति किलोग्राम तक का रिकॉर्ड मूल्य प्राप्त हुआ है, जो राज्य के रेशम कीट पालन क्षेत्र के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि है।
उपायुक्त राहुल कुमार का कहना है कि हिमाचल सरकार की न्यूनतम समर्थन मूल्य नीति, उद्योग विभाग के रेशम अनुभाग के सतत प्रयासों और प्रतिस्पर्धी विपणन व्यवस्था का लाभ सीधे किसानों तक पहुंच रहा है। रेशम कीट पालन क्षेत्र में आ रहा यह सकारात्मक बदलाव न केवल किसानों की आय बढ़ाने में सहायक सिद्ध हो रहा है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने की दिशा में भी एक मील का पत्थर साबित हो रहा है। जिला प्रशासन का भी यह प्रयास है कि ज्यादा से ज्यादा किसानों को रेशम कीट जैसे अतिरिक्त आय सृजन के साधनों से जोड़कर उनकी आर्थिकी मजबूत करना है।  
-000- DOP 14/06/2026






प्राकृतिक खेती को मिला नया बल, जिला बिलासपुर में शुरू हुई गेहूं की सरकारी खरीद

 गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य 80 रुपये निर्धारित होने पर किसान खुश, सरकार को कहा थैंक्स

जिला में 223 किसान प्राकृतिक उत्पादित गेहूं बेचने को तैयार,175 क्विंटल गेंहू खरीद का है लक्ष्य

जिला बिलासपुर में प्राकृतिक खेती से उत्पादित गेहूं की सरकारी खरीद कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन एजेंसी (आत्मा) परियोजना के माध्यम से शुरू हो गई है। प्रदेश सरकार द्वारा प्राकृतिक तौर पर उत्पादित गेहूं के न्यूनतम समर्थन मूल्य को 60 रुपये से बढ़ाकर 80 रुपये प्रति किलोग्राम किए जाने पर जिला के किसान बेहद खुश हैं। किसानों के हित में प्रदेश सरकार के इस ऐतिहासिक निर्णय से न केवल किसानों की आय में वृद्धि हो रही है, बल्कि प्रदेश में रसायनमुक्त कृषि को भी बढ़ावा मिल रहा है। इसके परिणामस्वरूप प्रदेश में किसानों का रुझान प्राकृतिक खेती की ओर लगातार बढ़ रहा है।

बिलासपुर में प्राकृतिक गेहूं बेचने पहुंचे ग्राम पंचायत कोटला के गांव बनवाड़ निवासी किसान सुमन कुमार ठाकुर ने बताया कि वे पिछले तीन वर्षों से प्राकृतिक खेती से जुड़े हुए हैं। इस वर्ष उन्होंने लगभग 10 क्विंटल गेहूं आत्मा परियोजना के माध्यम से विक्रय किया है, जिसे प्रदेश सरकार ने 80 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से खरीदा है। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक गेहूं के न्यूनतम समर्थन मूल्य में की गई वृद्धि से न केवल किसानों की आर्थिकी सुदृढ़ हो रही है बल्कि प्राकृतिक खेती के प्रति उनका उत्साह भी मजबूत हुआ है।

इसी प्रकार ग्राम पंचायत नम्होल के गांव दगशेच निवासी किसान देश राज ने बताया कि उन्हें आत्मा परियोजना के माध्यम से प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण प्राप्त हुआ। उन्होंने कहा कि रासायनिक खेती के कारण पहले मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित हो रही थी, लेकिन प्राकृतिक खेती अपनाने से भूमि की उर्वरता में सुधार हुआ है। साथ ही प्राकृतिक तरीके से उत्पादित गेहूं का स्वाद और गुणवत्ता भी बेहतर हुई है।

मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू का आभार व्यक्त करते हुए किसानों ने कहा कि प्राकृतिक गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य पहले 40 रुपये से बढ़ाकर 60 रुपये तथा अब 80 रुपये प्रति किलोग्राम किए जाने से न केवल किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, बल्कि किसानों का रूझान अब प्राकृतिक खेती को ओर तेजी से बढ़ने लगा है। प्रदेश सरकार की न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित करने की यह पहल न केवल किसानों की आर्थिक सुदृढ़ता के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का कार्य कर रही है बल्कि रसायन मुक्त कृषि को बढ़ावा देकर कृषि क्षेत्र में सकारात्मक परिवर्तन का आधार भी बन रही है।

क्या कहते हैं अधिकारी:

परियोजना निदेशक आत्मा रितेश गुप्ता का कहना है कि इस वर्ष जिला बिलासपुर में प्राकृतिक खेती से उत्पादित 175 क्विंटल गेहूं खरीदने के निर्धारित लक्ष्य के मुकाबले अब तक 120 किसानों से लगभग 160 क्विंटल गेंहू की खरीद की जा चुकी है। पिछले वर्ष जिला में 40 किसानों से लगभग 60 क्विंटल प्राकृतिक गेहूं की खरीद की गई थी, जिसे इस वर्ष बढ़ाकर लगभग तीन गुना किया गया है। उनका कहना है कि जिला में 223 किसानों ने प्राकृतिक तौर पर उत्पादित गेंहू को बेचने की हामी भरी है, ऐसे में शीघ्र ही निर्धारित लक्ष्य को भी हासिल कर लिया जाएगा।  
उन्होंने बताया कि जिला बिलासपुर में सदर और स्वारघाट विकास खंड के किसानों की सुविधा के लिए बिलासपुर शहर के निहाल स्थित सिविल सप्लाई गोदाम तथा झंडूता और घुमारवीं क्षेत्र के किसानों के लिए पट्टा में खरीद केंद्र स्थापित किए गए हैं। इन केंद्रों पर केवल वही किसान अपनी उपज बेच सकते हैं जो आत्मा परियोजना द्वारा प्रमाणित हों, हिम परिवार पोर्टल पर पंजीकृत हों तथा प्राकृतिक खेती के माध्यम से गेहूं का उत्पादन कर रहे हों।

उपायुक्त बिलासपुर राहुल कुमार का कहना है कि जिला में आत्मा परियोजना के माध्यम से लगभग 8 हजार किसान प्राकृतिक खेती से जुड़ चुके हैं तथा लगभग 1,094 हेक्टेयर क्षेत्र को प्राकृतिक खेती के अंतर्गत लाया जा चुका है। प्रदेश सरकार ने प्राकृतिक रूप से उत्पादित गेंहू के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित किया गया है। जिला प्रशासन भी संबंधित विभागों के माध्यम से अधिक से अधिक किसानों को प्राकृतिक खेती से जोड़ने के लिए निरंतर प्रयासरत है, ताकि किसानों की आय में वृद्धि के साथ-साथ जिला में प्राकृतिक खाद्यान्नों के उत्पादन को भी बढ़ावा मिल सके।
-000- DOP 08/06/2026