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Tuesday, 7 July 2026

प्राकृतिक खेती से बदली धमथल जुखाला के किसान रवि दत्त की जिंदगी

 रासायनिक खेती छोड़ अपनाया प्राकृतिक कृषि मॉडल, कम लागत में कर रहे हैं बेहतर उत्पादन

हिमाचल प्रदेश के जिला बिलासपुर के जुखाला क्षेत्र के गांव धमतल निवासी 47 वर्षीय किसान रवि दत्त आज प्राकृतिक खेती के माध्यम से न केवल अपनी आय में वृद्धि कर रहे हैं, बल्कि क्षेत्र के अन्य किसानों के लिए भी प्रेरणा स्रोत बने हैं। रासायनिक खेती में बढ़ती लागत और मिट्टी की उर्वरता में गिरावट को देखते हुए रविदत्त ने वर्ष 2018 में प्राकृतिक खेती को अपनाने का निर्णय लिया। आज उनके खेतों में उगाई जा रही फसलें जहां पर्यावरण के अनुकूल हैं तो वहीं तैयार उत्पाद स्वास्थ्य की दृष्टि से भी सुरक्षित एवं लाभकारी हैं।

रवि दत्त बताते हैं कि पहले वे भी अन्य किसानों की तरह रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का प्रयोग करते थे, जिससे खेती की लागत लगातार बढ़ती जा रही थी और मिट्टी की गुणवत्ता भी प्रभावित हो रही थी। इसी दौरान उन्होंने प्राकृतिक खेती के बारे में जानकारी प्राप्त की और वर्ष 2018 में इस पद्धति को अपनाने की शुरुआत की। 

उन्होंने बताया कि वह वर्तमान में प्राकृतिक खेती के माध्यम से मक्की, गेहूं, कोदरा, दालें, मटर, टमाटर सहित अन्य सब्जियों का उत्पादन कर रहे हैं। प्राकृतिक खेती से जुड़ने के लिए वर्ष 2018 में ही देसी नस्सल की गिर गाय भी पाली है। वर्तमान में उनके पास गिर नस्सल की दो बड़ी गायें तथा एक बच्छड़ी है। वह कहते हैं कि देशी गाय के गोबर और गौमूत्र से तैयार जीवामृत, घनजीवामृत तथा अन्य प्राकृतिक घोलों का उपयोग करते हैं, जिससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और फसलें स्वस्थ रहती हैं।

रवि दत्त का कहना है कि उन्होंने गत वर्ष प्राकृतिक तौर पर तैयार लगभग 4 क्विंटल मक्की को जिला आत्मा प्रोजेक्ट के माध्यम से विक्रय किया है। उन्हें 40 रूपये प्रति किलोग्राम की दर से 1600 रूपये की आय प्राप्त हुई है। इसके अतिरिक्त वह गेंहू सहित अन्य पारंपरिक फसलों तथा सब्जियों का भी नियमित तौर पर उत्पादन कर रहे हैं जिनका उन्हें अच्छे दाम प्राप्त हो रहे हैं। 

रवि दत्त का कहना है कि प्रदेश सरकार ने प्राकृतिक तौर पर तैयार होने वाली फसलों गेंहू, मक्की, हल्दी इत्यादि के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित कर एक बेहतरीन कदम उठाया है जिससे प्रदेश के हजारों किसानों को सीधा लाभ मिल रहा है। 

क्या कहते हैं अधिकारीः 

उपनिदेशक कृषि कुलभूषण धीमान का कहना है कि जिला बिलासपुर में वर्ष 2018 से प्राकृतिक खेती की शुरूआत की गई है। वर्तमान में लगभग 8 हजार किसान प्राकृतिक खेती से जुड़ चुके हैं तथा 1094 हैक्टेयर में विभिन्न तरह की फसलों का प्राकृतिक खेती के माध्यम से उत्पादन कर रहे हैं। 

उन्होंने बताया कि वर्ष 2025-26 के दौरान जिला में आत्मा प्रोजेक्ट के माध्यम से 85 किसानों से लगभग 116 क्विंटल हल्दी की खरीद की गई है। इसी अवधि के दौरान जिला में 32 किसानों से लगभग 49 क्विंटल मक्की तथा 42 किसानों से लगभग 62 क्विंटल गेंहू की भी खरीद की है। उन्होंने बताया कि यह खरीद प्रदेश सरकार द्वारा वर्ष 2025-26 के लिए निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य जिसमें हल्दी के लिए 90 रूपये, मक्की के लिए 40 रूपये तथा गेंहू के लिए 60 रूपये प्रति किलोग्राम की दर से यह खरीद की गई है। 

उपायुक्त बिलासपुर राहुल कुमार का कहना है कि सरकार द्वारा विभिन्न विभागों के माध्यम से संचालित की जा रही विभिन्न योजनाओं, कार्यक्रमों तथा निर्णयों को समयबद्ध क्रियान्वित करने के प्रयास किये जा रहे हैं ताकि ज्यादा से ज्यादा पात्र लोगों को समयबद्ध लाभान्वित किया जा सके। 

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Thursday, 26 February 2026

जसवाणी के रिखी राम बांस से निर्मित उत्पादों से कर रहे जीवन निर्वाह

 73 वर्ष की आयु में भी पारंपरिक बांस के उत्पादों को प्रतिदिन करते हैं तैयार

लेकिन बाजार में प्लास्टिक की दस्तक से पारंपरिक बांस उत्पादों की घटी है मांग


जिला बिलासपुर की तहसील घुमारवीं के गांव जसवाणी निवासी 73 वर्षीय रिखी राम आज भी हाथों की मेहनत और पारंपरिक हुनर के बल पर जीवन निर्वाह कर रहे हैं। लेकिन बदलते वक्त के साथ उनके चेहरे की झुर्रियों में एक चिंता साफ दिखाई दे रही है कि पीढ़ियों से चली आ रही बांस और लकड़ी के शिल्प की परंपरा अब धीरे-धीरे समाप्ति की कगार पर पहुंच चुकी है।

बेहद हंसमुख स्वभाव के धनी रिखी राम बताते हैं कि जीवन के शुरुआती लगभग 15 वर्ष पढ़ाई में लगाए, लेकिन आठवीं कक्षा में अंग्रेजी विषय में फेल होने के कारण स्कूल छोड़ दिया। पास के गांव भदरोग में लगभग 10-12 वर्षों तक लकड़ी की कारीगरी का काम सीखा। कठिन परिश्रम और लगन से काष्ठकला में महारत हासिल की। समय के साथ वह अकेले ही रोजगार की तलाश में हिमाचल के विभिन्न क्षेत्रों जिनमें जिला शिमला, सिरमौर आदि शामिल है में जाकर लकड़ी का कार्य किया। उनका कहना है कि प्रदेश के पहाड़ी इलाकों में लकड़ी के मकान, दरवाजे-खिड़कियां और अन्य पारंपरिक निर्माण कार्यों में उनकी कारीगरी की काफी मांग रहती थी।
लेकिन दुर्भाग्यवश लगभग 10 वर्ष पूर्व जसवाणी में मकान का काम करते समय हाथ में गंभीर चोट आई और हड्डियां टूट गईं। इस घटना के बाद भारी लकड़ी का कार्य छोड़ना पड़ा। ऐसे में जीवन यापन का संकट सामने था, लेकिन हार नहीं मानी। बांस से टोकरी, खारे और छडोलू (पारंपरिक बांस के बर्तन) बनाने का कार्य शुरू किया। लकड़ी के मुकाबले यह काम अपेक्षाकृत हल्का था और गांव में इसकी मांग भी थी।

रिखी राम कहते हैं कि कुछ वर्षों तक सब कुछ ठीक-ठाक चलता रहा, लेकिन फिर बाजार की बदलती तस्वीर ने उनकी मेहनत पर पानी फेर दिया। वर्तमान में लोग प्लास्टिक से निर्मित सामान की ओर अधिक आकर्षित हो रहे हैं। बाजार में सस्ता और टिकाऊ विकल्प मिलने से पारंपरिक बांस उत्पादों की मांग अब काफी कम हो गई है।
उनका कहना है कि कभी हर घर में बांस की टोकरी और खारे का उपयोग होता था, लेकिन आज सिर्फ खास मौकों तक ही सीमित हो गया है। रिखी राम कहते हैं कि पहले कच्चा माल (बांस) आसानी से आसपास के गांव में मिल जाता था, लेकिन अब बांस मिलना भी मुश्किल हो गया है। कच्चा माल (बांस) की तलाश में अब उनके जैसे कारीगरों को गांव-गांव भटकना पड़ता है तथा बहुत कम मात्रा में यह उपलब्ध हो पाता है। ऐसे में सिर्फ कच्चे माल की कमी ही नहीं, बल्कि तेजी से बदलती जीवनशैली भी इस परंपरा के लिए खतरा बन गई है।

रिखी राम की सबसे बड़ी चिंता यह है कि नई पीढ़ी इस काम से दूर भाग रही है। युवा इसे मेहनत वाला और कम आमदनी वाला पेशा मानते हैं। आधुनिक शिक्षा और नौकरी की दौड़ में पारंपरिक कारीगरी व शिल्पकारी को महत्व नहीं मिल पा रहा है। हालांकि, रिखी राम ने इस उम्मीद के साथ बेटे को यह हुनर सिखाया है कि वह इस परंपरा को आगे बढ़ाएगा। लेकिन वह मानते हैं कि केवल कुछेक लोगों के प्रयास मात्र से यह कला अब लंबे वक्त तक जीवित नहीं रह सकती है।
यह कहानी सिर्फ रिखी राम की नहीं, बल्कि उन सैकड़ों पारंपरिक कारीगरों और शिल्पकारों की भी है जिनकी कला अब बाजारवाद और आधुनिकता की आंधी में कहीं विलुप्त होती जा रही है। ऐसे में समाज ने मिलकर ऐसे कारीगरों को प्रोत्साहन, कच्चे माल की उपलब्धता और बाजार तक पहुंच सुनिश्चित नहीं की, तो बांस और लकड़ी की यह पारंपरिक कारीगरी कहीं इतिहास के पन्नों में दफन होकर न रह जाए।

क्या है कारीगरों और शिल्पकारों के लिए सरकारी सहायता एवं योजना :

सरकार ने पारंपरिक कारीगरों और शिल्पकारों की सहायता के लिए विश्वकर्मा योजना चलाई है। इस योजना के माध्यम से जहां टूल किट खरीदने के लिए 15 हजार रुपये का अनुदान दिया जाता है तो वहीं सस्ती दरों पर ऋण की सुविधा भी प्रदान की जा रही है। इसके अतिरिक्त पांच दिन का एडवांस प्रशिक्षण भी प्रदान किया जाता है। योजना के संबंध में अधिक जानकारी के लिए महाप्रबंधक जिला उद्योग केंद्र या अपने नजदीकी प्रसार अधिकारी (उद्योग) स्थित बीडीओ कार्यालय से संपर्क कर सकते हैं।
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Monday, 12 January 2026

अब सरकारी स्कूलों में भी पूरा हो रहा है अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा का सपना

 घुमारवीं के चुवाड़ी उच्च विद्यालय में बच्चों को अंग्रेजी माध्यम से मिल रही शिक्षा

स्मार्ट क्लासरूम, इंटरनेट, पुस्तकालय, कंप्यूटर लैब जैसी आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित है विद्यालय
हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा शिक्षा क्षेत्र में निरंतर किए जा रहे अभिनव प्रयासों का परिणाम है कि प्रदेश स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में गुणवत्ता की दृष्टि से देश के अग्रणी राज्यों की श्रेणी में शामिल हो चुका है। मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू के मार्गदर्शन में प्रदेश के स्कूली शिक्षा ढांचे में किए जा रहे नवीन प्रयासों के फलस्वरूप आज ग्रामीण एवं दूरदराज क्षेत्रों में न केवल बेहतर शिक्षा की लौ जगी है, बल्कि अब गरीब बच्चों का अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा प्राप्त करने का सपना भी साकार हो रहा है।
जिला बिलासपुर की बात करें तो घुमारवीं उपमंडल की ग्राम पंचायत दकड़ी स्थित राजकीय उच्च विद्यालय चुवाड़ी में ग्रामीण बच्चों को अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा उपलब्ध करवाई जा रही है। आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित इस विद्यालय में बच्चों को स्मार्ट क्लासरूम, आईटी लैब, आधुनिक पुस्तकालय, वाई-फाई सहित अनेक सुविधाएं उपलब्ध हैं। इसके साथ ही बच्चों को अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा ग्रहण करने का विकल्प भी प्रदान किया गया है। सरकार के इस महत्वपूर्ण कदम से न केवल बच्चों को अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाई का अवसर मिल रहा है, बल्कि उनके आत्मविश्वास में भी निरंतर वृद्धि हो रही है।
प्रदेश सरकार की इस पहल से अब अभिभावक अपने बच्चों को निजी विद्यालयों की महंगी फीस चुकाने के बजाय सरकारी विद्यालयों में पढ़ाना अधिक उपयुक्त समझ रहे हैं। इससे जहां एक ओर अभिभावकों का आर्थिक बोझ कम हुआ है, वहीं दूसरी ओर कम खर्च में बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के साथ-साथ आधुनिक सुविधाओं से युक्त गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त हो रही है।
इस संबंध में अभिभावक अनीता, अनु शर्मा एवं माला शर्मा का कहना है कि उनके बच्चे पिछले दो-तीन वर्षों से इसी विद्यालय में अध्ययनरत हैं। विद्यालय में स्मार्ट क्लासरूम, इंटरनेट, पुस्तकालय तथा खेलकूद की बेहतर अधोसंरचना उपलब्ध है और बच्चे अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। उनका कहना है कि निजी विद्यालयों की महंगी फीस से छुटकारा पाकर वे अपने बच्चों को इसी सरकारी विद्यालय में पढ़ा रहे हैं, जहां कम खर्च में निजी विद्यालयों जैसी सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं। सबसे अहम बात यह है कि बच्चे घर के समीप ही अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा प्राप्त कर पा रहे हैं।
अभिभावकों ने प्रदेश के सरकारी विद्यालयों में अंग्रेजी माध्यम की सुविधा उपलब्ध करवाने के लिए मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू का आभार व्यक्त करते हुए सरकार के इस निर्णय की सराहना की है। उनका कहना है कि इस पहल से गरीब, ग्रामीण एवं संसाधनों के अभाव में बेहतर शिक्षा से वंचित बच्चों के सपनों को नई दिशा मिली है।
विद्यालय में अध्ययनरत छात्र-छात्राएं तृषा, वैष्णवी, वूलनाथ, हर्षित, अलीशा, संध्या, नवीन एवं अंशुल का कहना है कि अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा प्राप्त करने की सुविधा से उनके आत्मविश्वास में वृद्धि हुई है।
विद्यालय की मुख्याध्यापिका भावना का कहना है कि बच्चों की वर्तमान आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए विद्यालय में हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा प्राप्त करने का विकल्प उपलब्ध है। विद्यालय पूरी तरह डिजिटल मोड पर कार्य कर रहा है, जहां स्मार्ट क्लासरूम, वाई-फाई, कंप्यूटर शिक्षा के साथ-साथ खेलकूद एवं अन्य गतिविधियों के लिए भी बेहतर आधारभूत ढांचा उपलब्ध है। इसके अतिरिक्त विद्यालय में अंग्रेजी संवाद कौशल (इंग्लिश स्पीकिंग) पाठ्यक्रम तथा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए भी विद्यार्थियों को प्रोत्साहित किया जाता है।
क्या कहते हैं मंत्री:
स्थानीय विधायक एवं प्रदेश सरकार में नगर एवं ग्राम नियोजन, आवास, तकनीकी शिक्षा, व्यावसायिक एवं औद्योगिक प्रशिक्षण मंत्री राजेश धर्माणी ने कहा कि प्रदेश सरकार ने सरकारी विद्यालयों में अंग्रेजी माध्यम का विकल्प उपलब्ध करवाकर अपनी एक महत्वपूर्ण गारंटी को पूरा किया है। इस निर्णय से अब ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों को भी घर के समीप ही सरकारी विद्यालयों में अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा प्राप्त करने की सुविधा मिल रही है।
उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार का उद्देश्य ग्रामीण एवं दूरदराज क्षेत्रों में रहने वाले बच्चों को घर के समीप गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध करवाना है। मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू के नेतृत्व में प्रदेश सरकार ने इस दिशा में कई अहम एवं ऐतिहासिक निर्णय लिए हैं, जिनमें अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा उपलब्ध करवाना भी शामिल है। DOP 12/01/2026
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Tuesday, 23 December 2025

रोहल झंडुता के अमन शर्मा का सुख आश्रय योजना से पूरा हुआ मकान का सपना

प्रदेश सरकार ने मुख्यमंत्री सुख आश्रय योजना में मकान निर्माण को दी है 3 लाख की आर्थिक मदद

जिला बिलासपुर के झंडुता उपमंडल के गांव रोहल निवासी 25 वर्षीय अमन शर्मा का मकान बनाने का सपना मुख्यमंत्री सुख आश्रय योजना के तहत पूरा हुआ है। प्रदेश सरकार ने मुख्यमंत्री सुख आश्रय योजना के अंतर्गत मकान निर्माण को 3 लाख रुपये की आर्थिक मदद की है। ‘चिल्ड्रन ऑफ दि स्टेट’ अमन शर्मा प्रदेश सरकार की आर्थिक मदद से न केवल स्वयं का मकान निर्मित करने में कामयाब हो पाए हैं बल्कि प्रतिमाह मिलने वाले 4 हजार रुपये जेब खर्च से वह अपना जीवन-यापन भी बेहतर तरीके से कर पा रहे हैं।
आत्मविश्वास से लबरेज 25 वर्षीय अमन शर्मा से बातचीत की तो उन्होंने कहा कि अढ़ाई वर्ष की आयु में पिता तथा साढ़े तीन वर्ष की आयु में माता का साथ छूट गया। दादा-दादी तथा चाचा ने पालन पोषण किया। दसवीं तक की शिक्षा हासिल करने के उपरांत छोटा-मोटा रोजगार की तलाश में वह लगातार प्रयासरत रहे। उन्होंने स्वयं के भरण-पोषण के लिए कई जगह कार्य किया तथा अंत में उन्होंने पारिवारिक सदस्यों के सहयोग से स्वयं की टैक्सी पा ली। वर्तमान में वह झंडुता में टैक्सी चलाकर भरण-पोषण कर रहे हैं।
अमन शर्मा कहते हैं कि वह 25 वर्ष के हो गए लेकिन आज तक मुख्यमंत्री सुख आश्रय योजना को छोड़कर उन्हें किसी भी अन्य सरकारी योजना में लाभ नहीं मिला है। उनके पिता द्वारा निर्मित मकान इतनी जर्जर हालत में है कि उसमें एक दिन भी रहना खतरे से खाली नहीं है। ऐसे में उसे चाचा या फिर नानी के घर ही निवास करना पड़ रहा है। अमन शर्मा कहते हैं कि जब भी सरकारी योजनाओं की मदद की मांग की तो उन्हें हमेशा अनाथालय छोड़ने का ही दबाव बनाया गया। लेकिन गरीबी के वाबजूद न केवल दादी व चाचा ने उनका पालन-पोषण किया बल्कि आज वह कड़ी मेहनत से स्वयं को अपने पांव में खड़ा कर पाए हैं।
उन्होंने मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू का कोटी-कोटी आभार व्यक्त करते हुए कहा कि वह न केवल उनके जैसे हजारों बच्चों और युवाओं के लिए फरिश्ता बनकर सामने आए हैं बल्कि ‘चिल्ड्रन ऑफ दि स्टेट’ का दर्जा प्रदान कर उन्हें समाज में पूरा मान-सम्मान भी प्रदान किया है। मुख्यमंत्री की बदौलत आज न केवल उनका अपना मकान बनकर तैयार हो गया है बल्कि प्रतिमाह दी जा रही आर्थिक मदद भी जीवन में आगे बढ़ने का हौंसला दे रही है। उन्होंने बताया कि तीन किस्तों में अब तक उन्हें अढ़ाई लाख रूपये प्राप्त हो चुके हैं तथा अंतिम किस्त के तौर पर शेष 50 हजार रूपये आने बाकी हैं।  
क्या कहते हैं अधिकारी:
जिला कार्यक्रम अधिकारी हरीश मिश्रा का कहना है कि जिला बिलासपुर में मुख्यमंत्री सुख आश्रय योजना के तहत कुल 166 पात्रों को लाभान्वित किया जा रहा है। जिनमें से 23   को मकान निर्माण के लिए 3-3 लाख रुपये की आर्थिक मदद दी जा रही है जिनमें झंडुता के रोहल गांव निवासी अमन शर्मा भी शामिल हंै। इसके अतिरिक्त उच्च शिक्षा के 19, शादी के 20, वोकेशनल कोर्स के 8, स्टार्टअप के 9 तथा कौशल विकास, कोचिंग एवं भू आवंटन के एक-एक मामले में पात्रों को लाभान्वित किया है।
उपायुक्त बिलासपुर राहुल कुमार का कहना है कि प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी मुख्यमंत्री सुख आश्रय योजना को संबंधित विभाग के माध्यम से धरातल पर क्रियान्वित कर जिला के ‘चिल्ड्रन ऑफ दि स्टेट’ को लाभान्वित किया जा रहा हैं। जिसमें मकान निर्माण को आर्थिक मदद, कारोबार शुरू करने को स्टार्टअप के तहत आर्थिक सहायता, शादी होने पर दी जाने वाली आर्थिक मदद, शिक्षा सहायता इत्यादि शामिल है। इसके अतिरिक्त जिला के विभिन्न बाल आश्रमों में रह रहे बच्चों को एक्सपोजर विजिट के साथ-साथ अन्य लाभ भी प्रदान किये जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि जिला में सभी सरकारी जनकल्याणकारी योजनाओं को पूरी गंभीरता के साथ लागू किया जा रहा है ताकि कोई भी पात्र व्यक्ति योजनाओं के लाभ से वंचित न रहे। DOP 22/12/2025
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शंकर सिंह व रमेश कुमार को सरकार की ई-टैक्सी योजना से मिला रोजगार

 प्रदेश सरकार की राजीव गांधी स्वरोजगार स्टार्टअप योजना बन रही युवाओं की मददगार

जिला बिलासपुर के घुमारवीं उपमंडल के गांव सवारा निवासी 45 वर्षीय शंकर सिंह तथा जिला हमीरपुर के भोरंज उपमंडल के लठवाण निवासी 50 वर्षीय रमेश कुमार के लिए प्रदेश सरकार की राजीव गांधी स्वरोजगार स्टार्टअप योजना (ई-टैक्सी) रोजगार उपलब्ध करवाने में मददगार साबित हुई है।
शंकर सिंह तथा रमेश कुमार ने इलेक्ट्रिक व्हीकल खरीदकर प्रदेश सरकार के माध्यम से सरकारी विभागों में तैनात किया है। शंकर सिंह का वाहन उपायुक्त के सहायक आयुक्त के साथ जबकि रमेश कुमार का वाहन बी.डी.ओ. सदर बिलासपुर के साथ तैनात किया गया है। इन दोनों वाहनों पर प्रदेश सरकार 18 प्रतिशत जीएसटी सहित कुल 59 हजार रुपये प्रतिमाह उपलब्ध करवा रही है। इससे न केवल दोनों लाभार्थियों की वाहन किस्त आसानी से निकल रही है, बल्कि 15 से 20 हजार रुपये प्रतिमाह की अतिरिक्त बचत भी हो रही है।
जब लाभार्थी शंकर सिंह से बातचीत की तो उनका कहना है कि वह पिछले लगभग 20 वर्षों से टैक्सी चलाने का कार्य कर अपने परिवार का भरण-पोषण करते रहे हैं। इस दौरान उन्होंने 102 एंबुलेंस सेवा में भी कुछ वर्षों तक कार्य किया। लेकिन जब वर्ष 2023 में उन्हें समाचार पत्रों के माध्यम से प्रदेश सरकार की ई-टैक्सी योजना का पता चला तो उन्होंने ऑनलाइन माध्यम से आवेदन प्रस्तुत किया। उन्होंने वर्ष 2025 में 15 लाख रुपये की लागत से इलेक्ट्रिक वाहन खरीदा तथा प्रदेश सरकार ने जुलाई, 2025 से इसे सरकारी विभाग के साथ अटैच कर दिया है।
इसी तरह लाभार्थी रमेश कुमार का भी कहना है कि उन्हें भी दिसम्बर, 2023 में प्रदेश सरकार की इस महत्वाकांक्षी राजीव गांधी स्वरोजगार स्टार्टअप योजना की जानकारी मिली तथा लोकमित्र केंद्र के माध्यम से ऑनलाइन आवेदन प्रस्तुत कर दिया। उन्होंने भी वर्ष 2025 में नया इलेक्ट्रिक वाहन खरीदा तथा प्रदेश सरकार ने जुलाई, 2025 से इसे सरकारी विभाग में लगा दिया है। उनका कहना है कि इससे पहले वह टैक्सी चलाते थे, लेकिन स्थाई आय का कोई साधन नहीं था। लेकिन अब उन्हें प्रतिमाह 15 से 20 हजार रूपये की आय हो रही है तथा वह गाड़ी की किस्त भी आसानी से निकाल पा रहे हैं।
दोनो लाभार्थियों ने 15-15 लाख रुपये का इलेक्ट्रिक वाहन खरीदा है जिस पर प्रदेश सरकार ने 50 प्रतिशत उपदान मुहैया करवाया है। उनका कहना है कि प्रदेश के बेरोजगार युवाओं के लिए सरकार की यह योजना न केवल लाभकारी सिद्ध हो रही है बल्कि उन्हें अगले पांच वर्षों तक स्थाई रोजगार भी सुनिश्चित हुआ है।
शंकर सिंह तथा रमेश कुमार ने मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि राज्य सरकार की यह योजना बेरोजगार युवाओं के लिए एक बेहतरीन अवसर है। प्रदेश में पहली बार कोई ऐसी योजना आई है जिसमें निजी इलेक्ट्रिक वाहन खरीदने पर 50 प्रतिशत उपदान और सरकारी विभागों में वाहन अटैच कर रोजगार की गारंटी भी उपलब्ध करवाई जा रही है।
दोनों लाभार्थियों ने प्रदेश के युवाओं से सरकार की इस महत्वाकांक्षी योजना का अधिक से अधिक लाभ उठाने का आह्वान किया है ताकि न केवल उन्हें सरकार आर्थिक मदद प्रदान करेगी बल्कि सरकारी विभागों के माध्यम से रोजगार की गारंटी भी मिलेगी।
क्या कहते हैं अधिकारी:
जिला रोजगार अधिकारी बिलासपुर राजेश मैहता का कहना है कि राजीव गांधी स्वरोजगार स्र्टाटअप योजना के अंतर्गत जिला बिलासपुर में अब तक 16 लोगों को लाभान्वित किया जा चुका है। प्रदेश सरकार ने 50 प्रतिशत सब्सिड़ी प्रदान कर लगभग एक करोड़ 16 लाख 44 हजार 900 रूपये की आर्थिक मदद दी है। साथ ही सभी 16 लाभार्थियों की ई-टैक्सी को प्रदेश सरकार के विभिन्न विभागों में अटैच कर उन्हें रोजगार भी मुहैया करवाया है।
उपायुक्त बिलासपुर, राहुल कुमार ने कहा कि प्रदेश सरकार की जनकल्याणकारी एवं रोजगारोन्मुखी योजनाओं को विभागों के माध्यम से पूरी गंभीरता के साथ लागू किया जा रहा है ताकि अधिकतम पात्र व्यक्तियों को लाभ मिल सके। उन्होंने कहा कि जिला प्रशासन का मुख्य उद्देश्य सरकारी योजनाओं को समयबद्ध धरातल पर उतारकर पात्र लोगों तक पहुंचाना और उन्हें आर्थिक व सामाजिक रूप से सशक्त बनाना है। DOP 08/12/2025
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Thursday, 27 November 2025

सोनिका बनीं आत्मनिर्भरता की मिसाल, डेयरी फार्मिंग से रच रहीं सफलता की नई कहानी

 टीजीटी साइंस से डेयरी उद्यमी तक का सफर, सोनिका का ‘स्मार्ट वर्क’ बना प्रेरणा स्रोत

घुमारवीं की सोनिका ने दिखाया रास्ता, डेयरी फार्मिंग से महिलाएं भी बन सकती हैं स्वावलंबी

मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू की दूरदर्शी सोच एवं सशक्त नेतृत्व के कारण प्रदेश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के लिए दूध उत्पादकों को न्यूनतम समर्थन मूल्य नीति लागू कर प्रदेश सरकार ने एक ऐतिहासिक पहल की है। सरकार के इस कदम से न केवल प्रदेश के दूध उत्पादक किसान सीधे तौर पर लाभान्वित हो रहे है, बल्कि प्रदेश के शिक्षित युवा भी दुग्ध उत्पादन क्षेत्र से जुड़कर अपनी आर्थिकी को न केवल सशक्त बना रहे हैं बल्कि सफलता की नई-नई कहानियां भी लिख रहे हैं।  
जिला बिलासपुर के घुमारवीं क्षेत्र की ग्राम पंचायत घुमारवीं के गांव चुवाड़ी की सोनिका ने डेयरी फार्मिंग के क्षेत्र में प्रगति और आत्मनिर्भरता की मिसाल कायम की है। निजी मिनर्वा सीनियर सेकेंडरी स्कूल, घुमारवीं में टीजीटी साइंस के रूप में कार्यरत सोनिका न केवल शिक्षा क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य कर रही हंै, बल्कि पशुपालन के माध्यम से आर्थिक स्वावलंबन की एक नई कहानी भी लिख रही है।
सोनिका ने वर्ष 2019 में डेयरी फार्मिंग की शुरुआत एक जर्सी गाय के साथ करते हुए आज उनके पास कुल छह गायें और एक हीफर है। सोनिका डेयरी फार्म को पूरी तरह वैज्ञानिक पद्धति से संचालित कर रही हैं तथा दुधारू गायों का दुहन आधुनिक मिल्किंग मशीन से करती हैं। हरे चारे की कटाई के लिए चाफ कटर मशीन का उपयोग कर रही हैं। जरूरत पड़ने पर वह समय-समय पर पशुपालन विभाग के अधिकारियों एवं चिकित्सकों का मार्गदर्शन भी प्राप्त करती हैं।
जब इस संबंध में सोनिका से बातचीत की उन्होंने बताया कि वह प्रतिदिन सुबह 5ः30 बजे से गाय से जुड़े कार्यों को प्रारंभ करती है तथा प्रातः 7 बजे तक पूर्ण कर लेती हैं। इस दौरान पति भी उनका सहयोग करते हैं, जबकि दिन के समय परिवार के अन्य सदस्यों का पूरा सहयोग मिलता है। इसी तरह प्रतिदिन शाम को 5 बजे से गायों से जुड़े कार्यों को शुरू करते हुए इन्हे 6ः30 बजे तक पूरा कर लिया जाता है।
प्रतिदिन 57 लीटर दूध का उत्पादन, एक माह में लगभग 74 हजार की शुद्ध आय
सोनिका कहती है कि उनका डेयरी फार्म प्रतिदिन लगभग 57 लीटर दूध का उत्पादन कर रहा है, जिसे 65 रुपये प्रति लीटर की दर से बेचने पर प्रतिमाह लगभग एक लाख 10 हजार रूपये की आय होती है। उनका कहना है कि सभी खर्चों को निकालकर प्रतिमाह लगभग 74 हजार रुपये का शुद्ध लाभ हो रहा है। ऐसे में सोनिका के लिए डेयरी फार्मिंग का कार्य एक लाभदायक व्यवसाय साबित हो रहा है।
डेयरी फार्मिंग से महिलाएं एवं युवा आर्थिक तौर पर बन सकते हैं सशक्त
सोनिका का कहना है कि महिलाएं और युवा 1 या 2 गायों से भी डेयरी फार्मिंग की शुरुआत करते हैं तो भी वह आर्थिक रूप से सशक्त बन सकते हैं। यह कार्य सुबह और शाम सिर्फ एक-एक घंटे का है, जिसे नौकरी पेशा महिलाएं भी आसानी से कर सकती हैं।
उनका कहना है कि प्रदेश सरकार ने गाय व भैंस का न्यूनतम समर्थन मूल्य क्रमशः 51 तथा 61 रुपये निर्धारित किया है जिससे न केवल उनका दूध उच्च दामों पर बाजार में आसानी से बिक रहा है बल्कि अन्य पशुपालकों की आय में भी आशातीत वृद्धि हो रही है।
सोनिका का प्रदेश व क्षेत्र के शिक्षित युवाओं एवं महिलाओं से कहना है कि “स्मार्ट वर्क करें, आत्मनिर्भर बनें और डेयरी फार्मिंग से परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत करें।”
क्या कहते हैं अधिकारीः
सहायक निदेशक पशुपालन विभाग डाॅ. किशोरी लाल शर्मा का कहना है कि प्रदेश सरकार डेयरी फार्मिंग के माध्यम से पशु पालकों को बढ़ावा दे रही है। पंजीकृत दुग्ध उत्पादक समितियों को दूध बेचने पर किसानों को सरकार प्रति लीटर की दर से से 3 रुपये प्रोत्साहन राशि प्रदान कर रही है। इसके अतिरिक्त दो किलोमीटर से अधिक दूरी तक दूध खरीद केंद्र तक स्वयं दूध ले जाने वाले पशुपालकों और समितियों को 2 रुपये प्रति लीटर उपदान देने का भी प्रावधान किया है। जिला बिलासपुर में 15 नई दुग्ध उत्पादक समितियों का गठन किया गया है तथा जिला में 40 अन्य दुग्ध उत्पादक समितियां पहले से ही कार्यरत हैं।
उन्होंने बताया कि जो किसान डेयरी फाॅर्मिंग से जुड़ना चाहते हैं, उन्हें प्रदेश सरकार उद्योग विभाग के माध्यम से उपदान की सुविधा प्रदान कर रही है। उन्होंने बताया कि कांगड़ा जिला में स्थापित हो रहे ढगवार दूध प्रसंस्करण संयंत्र का लाभ जिला बिलासपुर के दूध उत्पादक किसानों को भी प्राप्त होगा।
उपायुक्त बिलासपुर राहुल कुमार का कहना है कि प्रदेश सरकार किसानों व बागवानों के उत्थान व कल्याण को अनेकों कल्याणकारी योजनाएं चला रही हैं। दुग्ध उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए दुग्ध उत्पादन समितियों का गठन कर किसानों एवं पशुपालकों को आर्थिक मदद भी प्रदान कर रही है। उन्होंने ज्यादा से ज्यादा किसानों से डेयरी फाॅर्मिंग गतिविधियों से जुड़कर आर्थिकी को सुदृढ़ करने तथा सरकारी योजनाओं का लाभ प्राप्त करने का आह्वान किया है।
-000- DOP 04/11/2025