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Monday, 14 September 2026

प्राकृतिक खेती से समृद्ध हो रहे बिलासपुर के किसान, एमएसपी निर्धारण से फसलों को मिल रहे हैं बेहतर दाम

 बिलासपुर के करोट निवासी किसान प्रेम ठाकुर और उनके भाई प्राकृतिक खेती से मजबूत कर रहे आर्थिकी

प्राकृतिक फसलों का एमएसपी निर्धारित करने के लिए किसानों ने प्रदेश सरकार का जताया आभार

बिलासपुर, 13 सितंबर: जिला बिलासपुर के करोट गांव निवासी प्रेम ठाकुर और उनके अन्य तीन भाई श्याम लाल ठाकुर, मस्तराम ठाकुर तथा छोटा राम प्राकृतिक खेती के माध्यम से विभिन्न फसलों का उत्पादन कर, आर्थिकी को सुदृढ़ कर रहे हैं। यह परिवार न केवल पारंपरिक फसलों गेहूं, मक्की और धान का उत्पादन प्राकृतिक खेती के माध्यम से कर रहा है, बल्कि हल्दी, जिमीकंद जैसी नकदी फसलों का भी बड़े पैमाने पर उत्पादन कर रहे हैं। इस परिवार द्वारा तैयार प्राकृतिक फसलों की चमक केवल प्रदेश तक ही सीमित नहीं रही है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी एक अलग पहचान स्थापित की है।

इसी परिवार के श्याम लाल ठाकुर को जहां प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर द्वारा वर्ष 2003 में कृषि दूत सम्मान से पुरस्कृत किया जा चुका है, तो वहीं वर्ष 2009 में जिमीकंद की खेती के लिए राष्ट्रीय अवार्ड से भी नवाजा जा चुका है। यह परिवार वर्ष 1998 से जिमीकंद की खेती कर रहा है तथा प्रतिवर्ष लाखों रुपये का जिमीकंद प्रदेश तथा प्रदेश के बाहर भेजते हैं। यही नहीं, जिला बिलासपुर के प्रसिद्ध नलवाड़ी मेला में इस परिवार की बैलों की जोड़ी को कई वर्षों तक सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार से भी सम्मानित किया जाता रहा है।

जब 65 वर्षीय किसान प्रेम ठाकुर से बातचीत की तो उनका कहना है कि पिछले लगभग तीन-चार वर्षों से वह प्राकृतिक तौर पर हल्दी की खेती पर फोकस कर रहे हैं। इस वर्ष लगभग 20 क्विंटल प्राकृतिक हल्दी तैयार की है, जिनमें से 6 क्विंटल हल्दी जिला आत्मा प्रोजेक्ट के माध्यम से 90 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बेचा है। शेष हल्दी भी आसपास के लोगों द्वारा इसी दाम पर खरीदी है तथा हल्दी से ही लगभग 2 लाख रुपये तक का कारोबार किया है। वह प्रतिवर्ष औसतन 20 से 25 क्विंटल हल्दी की पैदावार कर रहे हैं।

उन्होंने बताया कि वह काली हल्दी का भी उत्पादन कर रहे हैं तथा इस वर्ष लगभग डेढ़ क्विंटल काली हल्दी तैयार की है, जिसका उन्हें प्रति किलोग्राम 300 रुपये तक का दाम मिला है। उनका कहना है कि औषधीय गुणों के कारण काली हल्दी की अच्छी मांग है। वह अब मेघालय की प्रसिद्ध लकाडोंग हल्दी की ओर भी बढ़ रहें, जिसमें अन्य हल्दी के मुकाबले करक्यूमिन की मात्रा काफी अधिक है।

प्रेम ठाकुर कहते हैं कि उनका परिवार 3 बीघा भूमि में जिमीकंद की खेती भी कर रहा है। प्रतिवर्ष औसतन 50-60 क्विंटल जिमीकंद उत्पादित कर रहे हैं तथा प्रदेश के बाहर 60 से 80 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से अच्छे दाम प्राप्त हो रहे हैं। इसके अतिरिक्त धान, मक्की, सोयाबीन, दालें इत्यादि भी प्राकृतिक तौर पर उत्पादित कर रहे हैं तथा विभिन्न फसलों का बीज भी तैयार करते हैं। उन्होंने प्राकृतिक खेती पर आत्मा प्रोजेक्ट के माध्यम से प्रशिक्षण भी प्राप्त हुआ है। इसके अतिरिक्त उन्हें महाराष्ट्र में सात दिवसीय एक्सपोजर विजिट का भी अवसर मिला है।

उनका कहना है कि प्रदेश सरकार ने प्राकृतिक हल्दी का न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित करने से न केवल हल्दी के अच्छे दाम प्राप्त हो रहे हैं, बल्कि आर्थिकी को भी बल मिला है। हल्दी का न्यूनतम समर्थन मूल्य प्रति किलोग्राम 90 रुपये से बढ़ाकर 150 रुपये करने के लिए मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंदर सिंह सुक्खू का भी आभार व्यक्त करते हैं। कहते हैं कि प्रदेश के इतिहास में पहली बार किसी सरकार ने किसानों के हित में कदम उठाते हुए फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) निर्धारित किया है, जिससे प्रदेश के हजारों किसान परिवार
लाभान्वित हो रहे हैं।

प्रदेश सरकार ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सर्वांगीण विकास और कृषकों के आर्थिक स्वावलंबन को दिशा देते हुए वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए प्राकृतिक तौर पर उत्पादित गेहूं के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को 60 रूपये से बढ़ाकर 80 रूपये, मक्का के एमएसपी को 40 रूपये से बढ़ाकर 50 रूपये तथा कच्ची हल्दी के मूल्य को 90 रूपये से बढ़ाकर 150 रूपये प्रति किलोग्राम किया है। इसकेे अतिरिक्त प्रदेश में पहली बार अदरक के लिए भी न्यूनतम समर्थन मूल्य 30 रूपये प्रति किलोग्राम तय किया है।

प्रदेश सरकार के इस दूरदर्शी निर्णय से न केवल प्रदेश के हजारों अन्नदाताओं को आजीविका सुरक्षा और लाभकारी मूल्य मिल रहा है, बल्कि आम जनमानस के लिए रसायन रहित, गुणवत्तापूर्ण एवं पोषण युक्त खाद्यान्न की उपलब्धता भी सुनिश्चित हो रही है।

क्या कहते हैं अधिकारी:

उपनिदेशक कृषि कुलभूषण धीमान का कहना है कि जिला में आत्मा परियोजना के माध्यम से इस वर्ष प्राकृतिक खेती कर रहे किसानों से 80 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से 136 किसानों से लगभग 183 क्विंटल गेहूं की खरीद की है। इसी प्रकार मक्की की खरीद 60 रुपये तथा हल्दी की खरीद 150 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से की जाएगी।

उपायुक्त बिलासपुर राहुल कुमार का कहना है कि जिला प्रशासन का प्रयास है कि प्राकृतिक तौर पर उत्पादित फसलों का दाम सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य के अंतर्गत किसानों को प्राप्त हो। जिससे न केवल किसानों को फसलों का उचित मूल्य प्राप्त होगा, बल्कि आर्थिकी को भी सुदृढ़ किया जा सके और लोगों को रसायनरहित व पोषणयुक्त खाद्यान्न उपलब्ध हो।
-000- DOP 14/09/2026










जिला बिलासपुर के बरठीं स्थित टिहरी क्लस्टर में लहलहा रही है अनार की फसल

 शिवा परियोजना ने बदली 45 किसानों की तकदीर, इस वर्ष 70 मीट्रिक टन अनार उत्पादन का लक्ष्य

9 हेक्टेयर में रोपित किए हैं 8555 भगवा किस्म के पौधे, गत वर्ष हुआ था 32 मीट्रिक टन उत्पादन

प्रदेश सरकार शिवा परियोजना के माध्यम से चालू वित्त वर्ष में व्यय कर रही है 325 करोड़ रुपये

बिलासपुर, 06 सितम्बर: हिमाचल प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी एचपी शिवा परियोजना का परिणाम है कि आजकल जिला बिलासपुर के झंडूता ब्लॉक के बरठीं स्थित टिहरी क्लस्टर में अनार की फसल लहलहा रही है। इस परियोजना के तहत लगभग 100 बीघा में स्थापित बगीचे में अनार की फसल पक कर तैयार हो रही है। लाभार्थी किसान इसे बाजार भेजने की तैयारी में जुटे हुए हैं तथा अब तक लगभग 5 मीट्रिक टन अनार बाजार में अच्छे दामों पर बेचा जा चुका है।

वर्ष 2021 में फ्रंट लाइन डेमोंस्ट्रेशन (एफएलडी) के तौर पर टिहरी-एक व टिहरी-दो में लगभग 2 हेक्टेयर क्षेत्र में अनार के पौधों का रोपण किया गया, जिसे वर्ष 2022 में बढ़ाकर 9 हेक्टेयर (लगभग 100 बीघा) भूमि में 45 किसानों को जोड़ते हुए क्लस्टर के तौर पर विकसित किया गया है। क्लस्टर में भगवा प्रजाति के 8555 अनार के पौधे रोपित किए हैं तथा इस वर्ष लगभग 70 मीट्रिक टन अनार उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। गत वर्ष लगभग 32 मीट्रिक टन अनार का उत्पादन हुआ था, जिससे लाभार्थी किसानों को लगभग 16 लाख रुपये की शुद्ध आय प्राप्त हुई है।

जब इस संबंध में लाभार्थी किसान प्रेम लाल नड्डा से बातचीत की तो उन्होंने बताया कि वर्ष 2021 में बतौर एफएलडी बागवानी विभाग के माध्यम से अनार के पौधे रोपित किए गए हैं तथा वर्ष 2022 में लगभग 100 बीघा क्षेत्र में 45 किसानों को जोड़ते हुए क्लस्टर के तौर पर विकसित किया गया है। गत वर्ष भारी बरसात के कारण बागवानों को हुए नुकसान के बावजूद लगभग 32 लाख रुपये का अनार किसानों ने रिलायंस, स्थानीय मंडी तथा सीधे लोगों को बेचा है तथा लाभार्थी किसानों को लगभग 15-16 लाख रुपये की शुद्ध आय प्राप्त हुई है।

प्रेम लाल नड्डा ने कहा कि शिवा परियोजना के अंतर्गत स्थापित अनार क्लस्टर में बागवानी एवं जल शक्ति विभाग के माध्यम से विभिन्न विकास कार्य किए गए हैं, जिनमें भूमि का विकास, बेड व पिट तैयार करना, सोलर बाड़बंदी, ड्रिप सिंचाई सुविधा तथा उठाऊ सिंचाई परियोजना के माध्यम से जल उपलब्धता शामिल है।

इसी बीच लाभार्थी किसान राजेन्द्र पाल का कहना है कि इस क्लस्टर में उनके लगभग 2 हजार अनार के पौधे लगे हैं। पिछले वर्ष अच्छी फसल प्राप्त हुई है तथा इस वर्ष भी फसल बेहतर है। शिवा परियोजना के अंतर्गत सरकार की ओर से बागवानी विभाग द्वारा हरसंभव मदद प्रदान की जा रही है। पानी की व्यवस्था पर सरकार ने लगभग 3 से 4 करोड़ रुपये व्यय कर ड्रिप इरिगेशन की सुविधा मुहैया करवाई है, जिसके माध्यम से अब पौधों को खाद, स्प्रे इत्यादि दिया जा रहा है।

उनका कहना है कि नौजवान पीढ़ी रोजगार के लिए घरों से दूर जा रही है, ऐसे में यदि वे बागवानी के साथ जुड़ते हैं तो न केवल जमीन का बेहतर उपयोग सुनिश्चित होगा बल्कि घर बैठे अच्छा रोजगार भी प्राप्त कर सकते हैं।

हिमाचल प्रदेश में बागवानी न केवल किसानों व बागवानों के लिए आजीविका का अहम स्रोत है बल्कि यह ग्रामीण विकास, रोजगार सृजन और आर्थिक स्थिरता का भी प्रमुख स्तंभ है। प्रदेश में ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू सरकार ने बागवानी को बढ़ावा देते हुए वित्तीय वर्ष 2026-27 के दौरान प्रदेश में एचपी शिवा परियोजना के माध्यम से 325 करोड़ रुपये व्यय करने का प्रावधान किया है। सरकार के इस महत्वपूर्ण कदम से प्रदेश के सात जिलों के 52 विकास खंडों में न केवल शिवा परियोजना के माध्यम से बागवानी को बल मिल रहा है बल्कि प्रदेश सरकार के ये प्रयास धरातल पर फलीभूत भी हो रहे हैं।

क्या कहते हैं अधिकारी:

उपनिदेशक बागवानी डॉ. जगदीश चंद वर्मा ने बताया कि एचपी शिवा परियोजना के प्रथम चरण के माध्यम से जिला बिलासपुर में 357 हेक्टेयर क्षेत्र में स्वीट ऑरेंज, अमरूद, लीची तथा जापानी फल के क्लस्टर या तो स्थापित कर लिए गए हैं या फिर कार्य अंतिम चरण में है। उन्होंने बताया कि टिहरी क्लस्टर जिला का एकमात्र अनार क्लस्टर है और गत वर्ष लगभग 32 मीट्रिक टन अनार को बाजार में बेचा गया है, जबकि इस वर्ष भी फसल अच्छी है तथा लगभग 70 मीट्रिक टन अनार उत्पादन की उम्मीद है। उन्होंने कहा कि विभाग बागवानों को बाजार के संभावित खरीदारों से जोड़ने में समन्वयक की भूमिका भी निभा रहा है ताकि उत्पादकों को अनार के अच्छे दाम प्राप्त हो सकें।

उन्होंने बताया कि शिवा परियोजना चरण दो में जिला में ब्लूबेरी, एवोकाडो, मैकाडामिया नट, ड्रैगन फ्रूट के क्लस्टर भी विकसित किए जाएंगे, जिन्हें पहले की शर्त 10 हेक्टेयर के बजाय अब 3 हेक्टेयर में स्थापित किया जा सकेगा। उन्होंने ज्यादा से ज्यादा किसानों से लाभ उठाने का आह्वान किया है।

उपायुक्त बिलासपुर राहुल कुमार ने कहा कि सरकार ने किसानों व बागवानों के उत्थान को अनेक योजनाएं आरंभ की हैं ताकि ग्रामीण अर्थव्यवस्था अधिक सशक्त हो सके। शिवा परियोजना के माध्यम से जिला के किसान आर्थिक रूप से मजबूत हो रहे हैं और संबंधित विभागों के माध्यम से अधिक से अधिक किसानों को लाभान्वित करने की दिशा में कार्य किया जा रहा है। उन्होंने लोगों से सरकार की विभिन्न योजनाओं का अधिक से अधिक लाभ उठाने का आह्वान किया है।
-000- DOP 07/09/2026

मछुआरा सम्मान निधि योजना, ऑफ सीजन में भी अब नहीं सताएगी रोज़ी-रोटी की चिंता

प्रदेश सरकार की पहल से राज्य के हजारों मछुआरा परिवारों को मिला आर्थिक संबल

बिलासपुर जिला के 1,500 मछुआरा परिवारों को मिली लगभग 53 लाख की आर्थिक मदद

प्रदेश में पहली बार यह योजना लागू करने पर लाभार्थी मछुआरों ने जताया सीएम का आभार

बिलासपुर 28 अगस्त: हिमाचल प्रदेश में जलाशयों पर आश्रित हजारों मछुआरा परिवारों के लिए प्रतिवर्ष 15 जून से 15 अगस्त तक मत्स्य आखेट प्रतिबंधित (ऑफ सीजन) समय लंबे समय से आर्थिक संकट का दौर माना जाता रहा है। इस अवधि में मछलियों के संरक्षण और प्रजनन को ध्यान में रखते हुए मछली पकड़ने पर पूर्ण प्रतिबंध रहता है। ऐसे में जिन परिवारों की आजीविका पूरी तरह मत्स्य पालन पर निर्भर होती है, उनके सामने दो माह तक आय का कोई स्थायी स्रोत नहीं बचता है। प्रदेश के हजारों मछुआरा परिवारों की इसी पीड़ा को समझते हुए मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू के नेतृत्व में प्रदेश सरकार ने मछुआरा सम्मान निधि योजना की शुरुआत कर आर्थिक सहारा प्रदान किया है।

इस योजना के अंतर्गत ऑफ सीजन के दौरान प्रत्येक पात्र मछुआरा परिवार को 3,500 रुपये की सम्मान राहत राशि प्रदान की जा रही है। यह सहायता राशि ऐसे समय में परिवारों की बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करने में सहायक बन रही है, जब मछली पकड़ने पर प्रतिबंध होने के कारण उनकी आय पूरी तरह प्रभावित रहती है।

प्रदेश सरकार की इस पहल का लाभ पूरे हिमाचल प्रदेश में हजारों मछुआरा परिवारों को मिला है। अकेले जिला बिलासपुर के 1,500 मछुआरा परिवारों को योजना के तहत 52 लाख रुपये से अधिक की धनराशि उपलब्ध करवाई गई है। जिला में गोविंद सागर झील सहित अन्य जलाशयों पर निर्भर मछुआरा समुदाय के लिए यह योजना आर्थिक सुरक्षा का मजबूत आधार बनकर उभरी है।

मछुआरा सम्मान निधि योजना केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मछुआरों के श्रम और योगदान के सम्मान का भी प्रतीक बन रही है। पहली बार ऑफ सीजन के दौरान प्रदेश सरकार से सीधे आर्थिक सहायता मिलने से मछुआरा समुदाय स्वयं को सामाजिक और आर्थिक रूप से अधिक सुरक्षित महसूस कर पा रहा है।

झंडूता विकास खंड के दाड़ी-भाड़ी मत्स्य सोसायटी के विक्रेता गुरदास का कहना है कि वह पिछले 40 से 45 वर्षों से मछली पकड़ने का कार्य कर रहे हैं। मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने मछुआरों के हित में पहली बार एक ऐसी योजना लागू की है, जिसने ऑफ सीजन के दौरान परिवार की रोजी रोटी की चिंता काफी हद तक कम कर दी है। साथ ही रॉयल्टी की दर को 15 प्रतिशत से घटाकर 1 प्रतिशत किया है। वह मछुआरों के हित में ऐतिहासिक कदम मानते हुए प्रदेश सरकार का आभार व्यक्त करते हैं।

इसी प्रकार स्वारघाट विकास खंड के अंतर्गत ज्योर मत्स्य सोसायटी से जुड़े चेत राम कहते हैं कि वह वर्ष 1978 से गोविंद सागर झील से मछली पकड़ने का कार्य कर रहे हैं तथा इसी से ही उन्होंने परिवार का भरण-पोषण किया है। उन्होंने रॉयल्टी दर को घटाकर एक प्रतिशत करने तथा 35 सौ रूपये की मछुआरा सम्मान निधि प्रदान करने के लिए प्रदेश सरकार का आभार व्यक्त किया। उनका कहना है कि यह मांग पिछले कई वर्षों से लंबित थी, लेकिन वर्तमान सरकार ने इसे लागू कर मछुआरा परिवारों के हित में एक ऐतिहासिक निर्णय लिया है।  

यही नहीं बलघाड़ मछुआरा सोसायटी के सदस्य देश राज तथा बाबू राम राणा का भी कहना है कि यह निर्णय गरीब मछुआरा परिवारों के लिए राहत लेकर आया है। दो माह के प्रतिबंधित सीजन में आय पूरी तरह बंद हो जाती है, ऐसे समय में 3,500 रुपये की सहायता राशि परिवार के भरण-पोषण के लिए महत्वपूर्ण है। उनका मानना है कि यह सहायता केवल आर्थिक मदद नहीं, बल्कि कठिन समय में सरकार की संवेदनशील सोच का परिचायक है।

सदर विकास खंड बिलासपुर के गांव क्यारियां निवासी कृष्ण लाल भी इस योजना को हिमाचल प्रदेश के इतिहास में मछुआरों के हित में उठाया गया एक सराहनीय कदम बताते हैं। उनका कहना है कि पहली बार सरकार ने प्रतिबंधित सीजन में मछुआरा परिवारों की आय के नुकसान की भरपाई के लिए सम्मान निधि का प्रावधान किया है, जिससे हजारों परिवारों को प्रत्यक्ष लाभ मिला है।

प्रदेश में मत्स्य पालन केवल रोजगार का माध्यम नहीं है, बल्कि जलाशय क्षेत्रों की स्थानीय अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार भी है। ऑफ सीजन में आर्थिक सहायता मिलने से मछुआरे परिवार कर्ज लेने या वैकल्पिक अस्थायी रोजगार की मजबूरी से काफी हद तक बच सकेंगे। इससे उनके जीवन स्तर में सुधार के साथ-साथ सामाजिक सुरक्षा की भावना भी मजबूत होगी।

प्रदेश सरकार लगातार किसानों, बागवानों, पशुपालकों और मछुआरों सहित ग्रामीण समुदायों की आजीविका मजबूत करने की दिशा में अनेक कल्याणकारी योजनाएं संचालित कर रही है। मछुआरा सम्मान निधि योजना तथा रॉयल्टी दर में भारी कटौती भी इसी व्यापक दृष्टिकोण का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य ग्रामीण अर्थव्यवस्था को अधिक सशक्त और आत्मनिर्भर बनाना है।

क्या कहते हैं मंत्री:

नगर व ग्राम नियोजन, आवास तथा तकनीकी शिक्षा मंत्री राजेश धर्माणी का कहना है कि मछली पकड़ने पर प्रतिबंध पर्यावरण संरक्षण और मत्स्य संसाधनों के संवर्धन के लिए आवश्यक है, लेकिन इस दौरान प्रभावित परिवारों की आजीविका सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। राज्य सरकार की मछुआरा सम्मान निधि योजना इसी संतुलन का सफल उदाहरण बनकर सामने आई है। इससे एक ओर मत्स्य संसाधनों के संरक्षण को बढ़ावा मिला है, तो वहीं दूसरी ओर मछुआरा परिवारों की आर्थिक सुरक्षा भी सुनिश्चित हुई है। प्रदेश सरकार की मछुआरा सम्मान निधि योजना तथा रॉयल्टी दर में कटौती प्रदेश के मत्स्य समुदाय के लिए आर्थिक सहायता के साथ-साथ सम्मान और विश्वास की नई पहचान बनी है। DOP 29/08/2026
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Sunday, 6 September 2026

मजदूरों के उत्थान में मददगार बन रहा भवन एवं अन्य निर्माण कामगार कल्याण बोर्ड

  विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से हो रहा कामगार परिवारों का सशक्तिकरण

जिला बिलासपुर में शिक्षा सहायता योजना के माध्यम से पूरे हो रहे हैं बच्चों की शिक्षा के सपने

मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू के नेतृत्व में हिमाचल प्रदेश भवन एवं अन्य सन्निर्माण कामगार कल्याण बोर्ड श्रमिकों और उनके परिवारों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। प्रदेश सरकार द्वारा कामगार कल्याण बोर्ड के माध्यम से संचालित विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं से न केवल श्रमिक परिवारों को आर्थिक एवं सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित हो रही है बल्कि परिवारों का सशक्तिकरण भी हो रहा है। सरकार के प्रयासों से न केवल अब श्रमिक परिवार आर्थिक, सामाजिक दृष्टि से मजबूत हो रहे हैं बल्कि शिक्षा सहायता योजना के माध्यम से इन परिवारों के बच्चे एमबीबीएस, एमएससी, एमकॉम, बीएससी, बीबीए जैसी जैसी व्यावसायिक एवं उच्च शिक्षा प्राप्त कर अपने उज्ज्वल भविष्य का निर्माण कर रहे हैं।

जिला बिलासपुर में ऐसे कई परिवार हैं जिनके लिए कामगार कल्याण बोर्ड की शिक्षा सहायता योजना सहित अन्य योजनाएं लाभकारी साबित हो रही हैं। जब जिला के घुमारवीं तहसील की ग्राम पंचायत फटोह के गांव रोपा निवासी 56 वर्षीय रवि दत्त से बातचीत की तो उनका कहना है कि वह लगभग 25 वर्षों से पेंटर एवं मजदूरी का काम कर रहे हैं। उन्हें लगभग 10-12 वर्ष पूर्व हिमाचल प्रदेश भवन एवं अन्य सन्निर्माण कामगार कल्याण बोर्ड की योजनाओं की जानकारी प्राप्त हुई तथा स्वयं को पंजीकृत कराया तथा बोर्ड के माध्यम से समय-समय पर अनेक योजनाओं का लाभ प्राप्त हुआ।

रविदत्त बताते हैं कि उनके बच्चों को स्कूली शिक्षा के दौरान छात्रवृत्ति का लाभ मिला। उनकी एक बेटी ने एमएससी तक की शिक्षा पूरी की, जिसके उपरांत इस वर्ष उसकी शादी के लिए सरकार की ओर से 60 हजार रुपये की आर्थिक सहायता प्राप्त हुई। उनकी दूसरी बेटी वर्तमान में डॉ. राधाकृष्णन राजकीय मेडिकल कॉलेज, हमीरपुर में एमबीबीएस की पढ़ाई कर रही है, जिसके लिए उन्हें इस वर्ष 1.20 लाख रुपये की शिक्षा सहायता प्रदान की गई। वहीं उनका बेटा बीएससी की शिक्षा पूरी करने के बाद आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

वह कहते हैं कि कामगार कल्याण बोर्ड से प्राप्त आर्थिक सहयोग के कारण बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दिलाने के साथ-साथ आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद बेटी का विवाह भी सम्मान पूर्वक संपन्न करा सके। कामगर बोर्ड की यह सहायता श्रमिक परिवारों के लिए किसी संबल से कम नहीं है।
इसी प्रकार घुमारवीं के वार्ड नंबर-3 निवासी 56 वर्षीय कृष्ण चंद के लिए भी कामगार कल्याण बोर्ड की योजनाएं अत्यंत लाभकारी सिद्ध हुई हैं। तीन बेटियों और एक बेटे के पिता कृष्ण चंद पिछले लगभग 35 से 40 वर्षों से पेंट का कार्य कर अपने परिवार का पालन-पोषण कर रहे हैं। वह बताते हैं कि वर्ष 2013 में उन्हें बोर्ड की योजनाओं की जानकारी मिली, जिसके बाद स्वयं को पंजीकृत कराया। इसके पश्चात बच्चों को स्कूली शिक्षा के दौरान छात्रवृत्ति का लाभ मिलता रहा। उनके बच्चों ने बी.कॉम., पॉलिटेक्निक तथा बीबीए जैसी उच्च शिक्षा प्राप्त की और आज अपने करियर की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

कृष्ण चंद बताते हैं कि बेटी के विवाह के लिए 51 हजार रुपये तथा बेटे को छात्रवृत्ति के रूप में 11 हजार रुपये की सहायता प्राप्त हुई। इसके अतिरिक्त उन्हें चिकित्सा सहायता योजना का लाभ भी मिल रहा है, जिससे उपचार संबंधी खर्च का बोझ काफी कम हुआ है।

दोनों लाभार्थियों ने प्रदेश सरकार का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि कामगार कल्याण बोर्ड की योजनाएं श्रमिकों के जीवन में वास्तविक परिवर्तन ला रही हैं। इन योजनाओं ने न केवल आर्थिक संबल प्रदान किया है, बल्कि उनके बच्चों को बेहतर शिक्षा एवं उज्ज्वल भविष्य सुनिश्चित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

क्या कहते हैं अधिकारी:

उपायुक्त बिलासपुर राहुल कुमार का कहना है कि जिला बिलासपुर में कामगार कल्याण बोर्ड के माध्यम से संचालित विवाह सहायता योजना के अंतर्गत 968 लाभार्थियों को लगभग 5 करोड़ रुपये की सहायता राशि वितरित की गई है। जिससे श्रमिक परिवारों को बेटियों और बच्चों के विवाह जैसे महत्वपूर्ण सामाजिक दायित्वों को पूरा करने में बड़ी राहत मिली है। इसी तरह शिक्षा सहायता योजना के अंतर्गत 503 लाभार्थियों को लगभग 1.48 करोड़ रुपये की सहायता प्रदान की गई है। शिक्षा के क्षेत्र में दी जा रही यह सहायता श्रमिकों के बच्चों को बेहतर भविष्य निर्माण में न केवल सहायक सिद्ध हो रही है बल्कि आर्थिक तंगी के कारण पढ़ाई बीच में छोड़ने की स्थिति को रोकने में भी यह योजना महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

क्या कहते हैं मंत्री:

नगर व ग्राम नियोजन, आवास, तकनीकी शिक्षा, व्यावसायिक एवं औद्योगिक प्रशिक्षण मंत्री राजेश धर्माणी ने कहा कि मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू के नेतृत्व में प्रदेश सरकार निर्माण श्रमिकों के कल्याण एवं उत्थान के लिए पूरी प्रतिबद्धता के साथ कार्य कर रही है। इसी उद्देश्य से हिमाचल प्रदेश भवन एवं अन्य सन्निर्माण कामगार कल्याण बोर्ड के माध्यम से अनेक जनकल्याणकारी योजनाएं प्रभावी ढंग से संचालित की जा रही हैं।
उन्होंने कहा कि जिला बिलासपुर में बोर्ड के अंतर्गत लगभग 50 हजार निर्माण श्रमिक पंजीकृत हैं। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि श्रमिक वर्ग का प्रदेश सरकार की कल्याणकारी नीतियों एवं योजनाओं पर विश्वास लगातार बढ़ रहा है। सरकार भविष्य में भी श्रमिकों और उनके परिवारों के सामाजिक एवं आर्थिक सशक्तीकरण के लिए इसी प्रकार कार्य करती रहेगी।
-000- DOP 28/07/2026

जिला बिलासपुर में जापानी फल देगा बागवानों की आर्थिकी को मजबूती

  घुमारवीं उपमंडल की ग्राम पंचायत लंझता में जापानी फल का कलस्टर रोपित

3.5 हेक्टेयर क्षेत्र में 37 किसानों की जमीन पर रोपित किये हैं 2019 पौधे

जिला बिलासपुर के उपमंडल घुमारवीं की ग्राम पंचायत लंझता में एचपी शिवा परियोजना के माध्यम से जापानी फल का कलस्टर तैयार किया जा रहा है। लगभग 3.5 हेक्टेयर क्षेत्र में स्थापित इस क्लस्टर में कुल 37 किसानों की जमीन पर 2019 पौधों को इस वर्ष फरवरी माह में रोपित किया गया है। इस क्लस्टर के पूरी तरह क्रियाशील हो जाने पर जहां किसानों एवं बागवानों की आर्थिकी सुधार में एक अहम कदम साबित होगा तो वहीं जिला बिलासपुर जापानी फल तैयार कर प्रदेश के बागवानी क्षेत्र में एक अलग पहचान स्थापित होगी।

प्रदेश बागवानी विभाग द्वारा एचपी शिवा परियोजना के माध्यम से लंझता क्लस्टर में फूयू प्रजाति के जापानी फल के पौधों को 4 गुणा 4 क्षेत्रफल की दृष्टि से सफलतापूर्वक रोपित किया जा चुका है तथा प्रत्येक पौधे की जियो टैगिंग की गई है। जिससे जहां भविष्य में प्रत्येक पौधे की उपज से लेकर मार्केट तक की पहुंच की निगरानी की जा सकेगी तो वहीं बागवानों को भी बेहतर दाम प्राप्त करने में मदद मिलेगी। जिला बिलासपुर में जहां जापानी फल का यह दूसरा जबकि घुमारवीं उपमंडल का पहला क्लस्टर है।
इस बीच किसान बहुफसली खेती (मल्टी क्रॉप) के तहत लहसुन, प्याज, मिर्च, गेहूं इत्यादि की फसलें भी तैयार कर रहे हैं जिससे उन्हें न केवल अतिरिक्त आमदन होगी बल्कि क्लस्टर में स्थापित जापानी फल के पौधों का बेहतर पोषण भी हो सकेगा।
क्या कहते हैं किसान:
इस संबंध में लाभान्वित किसान अंजलि ठाकुर का कहना है कि बागवानी विभाग के अंतर्गत एचपी शिवा परियोजना के माध्यम से उन्हें जापानी फल का बागीचा तैयार करने का अवसर मिला है। पहले यह जमीन बेकार पड़ी थी, लेकिन अब जापानी फल के पौधे रोपित हो जाने से जहां भविष्य में बेहतर आमदनी होने की उम्मीद है तो वहीं सिंचाई के लिए पानी की सुविधा प्राप्त हो जाने से इस समस्या का भी समाधान हुआ है। उन्होंने अपनी जमीन में 235 जापानी फल के पौधे रोपित किये हैं।
इसी तरह लाभान्वित किसान राजकुमारी का कहना है कि पहले जमीन में आवारा पशुओं एवं जंगली जानवरों के आंतक के कारण न केवल फसलों को भारी नुक्सान होता था बल्कि जमीन को बंजर छोड़ दिया था। लेकिन अब एचपी शिवा परियोजना के माध्यम से जापानी फल के पौधे रोपित होने तथा बाड़बंदी के कारण अब उन्हें पारंपरिक फसलों का भी लाभ मिलने लगा है तथा भविष्य में जापानी फल उनकी आर्थिकी को मजबूती प्रदान करेगा।
इसी तरह लाभान्वित किसान पवन कुमार का कहना है कि पौधों की देखरेख, दवाई इत्यादि की तकनीकी जानकारी बागवानी विभाग के अधिकारियों के माध्यम से उन्हें नियमित प्राप्त हो रही है। उनका कहना है कि आगामी 5-6 वर्षों के उपरांत इस बागीचे से सेब की तरह जापानी फल से भी अच्छी आमदनी प्राप्त होगी, जिससे आर्थिक स्थिति बेहतर होने की उम्मीद जताई।
सभी लाभान्वित किसानों ने एचपी शिवा परियोजना के माध्यम से जापानी फल का बागीचा रोपित करने तथा पौधों की सुरक्षा के लिए बाड़बंदी के साथ-साथ सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध करवाने के लिए प्रदेश सरकार का आभार जताया।
क्या कहते हैं अधिकारी:
विभागीय अधिकारियों का कहना है कि घुमारवीं उपमंडल के लंझता में एचपी शिवा परियोजना के माध्यम से पहली बार जापानी फल का बगीचा रोपित किया है। इस बगीचे से अगले तीन वर्षों के उपरांत बेहतर उत्पादन होने की उम्मीद है जिससे इस क्षेत्र के लगभग तीन दर्जन किसान लाभान्वित होंगे।
उनका कहना है कि तैयार उत्पादों को बाजार तक पहुंचाने के लिए लाभान्वित किसानों की एक समिति कम्युनिटी हॉर्टिकल्चर प्रोड्यूस मार्केटिंग एजेंसी गठित की गई है। इस समिति के माध्यम से विपणन की सभी संभावनाओं पर कार्य करते हुए किसानों को उत्पाद के अच्छे दाम प्राप्त हों कार्य किया जाएगा।
उपायुक्त बिलासपुर राहुल कुमार का कहना है जिला बिलासपुर में जापानी फल का कलस्टर आने वाले समय में ग्रामीणों की आर्थिकी को मजबूती प्रदान करने में अहम साबित होगा। उन्होंने किसानों एवं बागवानों से सरकार की विभिन्न योजनाओं एवं कार्यक्रमों का लाभ उठाने का आह्वान किया है ताकि उनकी आर्थिकी को अतिरिक्त बल प्रदान किया जा सके।
प्रदेश के 7 जिलों के 52 विकास खंडों में लागू हो रही है एचपी शिवा परियोजना
6 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में 400 कलस्टर किये जा रहे हैं विकसित, 15 हजार किसान परिवार होंगे लाभान्वित
हिमाचल प्रदेश में एचपी शिवा परियोजना लगभग 1 हजार 292 करोड़ रूपये की लागत से प्रदेश के बिलासपुर, हमीरपुर, कांगड़ा, मंडी, सोलन, सिरमौर और ऊना जिलों के 52 विकास खंडों में चरणबद्ध तरीके से लागू की जा रही है।
इस परियोजना के माध्यम से लगभग 6 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में 400 कलस्टर विकसित किये जा रहे हैं, जिससे लगभग 15 हजार किसान परिवार सीधे लाभान्वित होंगे और किसानों को सब ट्रापिकल फलों जैसे मीठा संतरा, अमरूद, अनार, लीची, आम, पलम, जापानी फल इत्यादि की आधुनिक, व्यावसायिक तथा मार्केट आधारित खेती के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। प्रदेश भर में अबतक लगभग एक हजार 140 हेक्टेयर क्षेत्र में फलदार पौधों का रोपण सफलतापूर्वक किया गया है।
इस परियोजना के माध्यम से अब तक लगभग 330 करोड़ रूपये व्यय किये जा चुके हैं तथा वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए लगभग 325 करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया है।
-000-  DOP 13/07/2026








लीची के बागों से महकने लगी बिलासपुर के लंझता गांव की धरती

  13.5 हेक्टेयर क्षेत्र में 54 किसानों ने रोपित किये हैं दस हजार से अधिक लीची के पौधे

एचपी शिवा परियोजना ने किसानों को दी समृद्धि की नई राह, अब फल देने लगे हैं वर्षों की मेहनत के पौधे

जिला बिलासपुर के घुमारवीं उपमंडल की ग्राम पंचायत लंझता आज अपनी पहचान बदल रही है। यहां खेतों में अब केवल मौसमी फसलें ही नहीं, बल्कि लीची के हरे-भरे बाग भी भविष्य की समृद्धि का संदेश दे रहे हैं। प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी एचपी शिवा परियोजना ने इस बदलाव की मजबूत नींव रखी है। कुछ वर्ष पहले तक जिन किसानों के लिए व्यावसायिक फलोत्पादन केवल एक कल्पना मात्र था, आज वही किसान अपने बागों में लगने वाले फलों को देखकर न केवल उत्साहित हैं बल्कि भविष्य में आर्थिक समृद्धि के लिए भी आशान्वित हैं।

गांव में इस परिवर्तन की शुरुआत वर्ष 2019-20 में हुई, जब ग्राम पंचायत लंझता को एचपी शिवा परियोजना के अंतर्गत फ्रंट लाइन डेमोस्ट्रेशन (एफएलडी) के लिए चयनित किया गया। प्रारंभिक चरण में 500 लीची के पौधों का रोपण किया गया। किसानों की सकारात्मक प्रतिक्रिया और परियोजना के सफल क्रियान्वयन ने इस पहल को गति दी। परिणामस्वरूप वर्ष 2020-21 तथा 2021-22 में 9,505 अतिरिक्त पौधों का रोपण किया गया। आज यह प्रयास एक संगठित लीची क्लस्टर का रूप ले चुका है, जहां लगभग 13.5 हेक्टेयर क्षेत्र में 54 किसान आधुनिक लीची फलोत्पादन से जुड़े हैं।
किसी भी बागवानी परियोजना की सफलता केवल पौधे लगाने तक सीमित नहीं होती है, बल्कि पौधों के संरक्षण, सिंचाई और वैज्ञानिक देखभाल के लिए मजबूत आधारभूत सुविधाओं की आवश्यकता भी रहती है। इसी परियोजना के अंतर्गत पौधों की सिंचाई के लिए एक लाख लीटर क्षमता का विशाल जल भंडारण टैंक तथा 20-20 हजार लीटर क्षमता के सात अन्य टैंक निर्मित किए गए हैं। साथ ही बागवानी विभाग के अधिकारी समय-समय पर किसानों का तकनीकी एवं वैज्ञानिक तौर पर मार्गदर्शन भी प्रदान कर रहे हैं। इन तमाम प्रयासों एवं सुविधाओं ने जहां किसानों को सिंचाई संबंधी चिंताओं से काफी हद तक राहत प्रदान की है तो वहीं पौधों की नियमित देखभाल एवं निगरानी से पौधों का बेहतर विकास भी सुनिश्चित हुआ है।

इस संबंध में जब लाभार्थी किसान प्रकाश चंद से बातचीत की तो उनके चेहरे की मुस्कान ने इस परियोजना की सफलता की सबसे बड़ी गवाही दी। उन्होंने अपनी जमीन में लगभग 850 लीची के पौधे लगाए हैं। वे कहते हैं कि जब पौधे लगाए गए थे, तब भरोसा नहीं था कि कुछ वर्षों बाद यही पौधे उनकी आय का महत्वपूर्ण स्रोत बनेंगे। लेकिन आज उन्हीं पौधों पर फल आना शुरू हो गया है। वे कहते हैं, यह केवल लीची का फल नहीं, बल्कि हमारी वर्षों की मेहनत और उम्मीदों का परिणाम है। आने वाले वर्षों में उत्पादन बढ़ेगा तो निश्चित रूप से हमारे परिवार की आर्थिक स्थिति पहले से कहीं अधिक मजबूत होगी।
इसी तरह एक अन्य लाभार्थी किसान लता देवी ने भी अपनी भूमि में 834 लीची के पौधे लगाए हैं तथा पिछले वर्ष से पौधों पर अच्छी गुणवत्ता के फल आने लग गए हैं। वह विश्वास के साथ कहती हैं कि जैसे-जैसे पौधे अधिक परिपक्व होंगे, उन्हें अच्छी फसल प्राप्त होने पर आय में भी वृद्धि होगी। लता देवी कहती हैं कि लीची जैसे व्यावसायिक फलोत्पादन ने उन जैसी अनेक ग्रामीण महिलाओं के लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता की नई संभावनाएं के द्वार खोले हैं।

किसानों का कहना है कि गत वर्ष इस क्लस्टर से लगभग 12 से 15 क्विंटल लीची का उत्पादन प्राप्त हुआ था, लेकिन इस वर्ष मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण उत्पादन लगभग 4 से 5 क्विंटल ही हुआ है। उनका कहना है कि पौधों की बढ़ती आयु के साथ-साथ उत्पादन में स्वाभाविक रूप से वृद्धि होगी और आने वाले वर्षों में यह क्लस्टर कहीं अधिक बेहतर परिणाम देगा।
उद्यान विभाग के अधिकारियों के अनुसार एचपी शिवा परियोजना के अंतर्गत लंझता में प्रथम चरण में एफएलडी तथा दूसरे चरण में पीआरएफ क्लस्टर विकसित किया गया है। इसमें उच्च घनत्व (हाई डेंसिटी) पद्धति से पौधरोपण किया गया है, ताकि सीमित भूमि पर अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सके। विभाग किसानों को नियमित तकनीकी मार्गदर्शन, प्रशिक्षण तथा आवश्यक परामर्श उपलब्ध करा रहा है, जिससे वैज्ञानिक बागवानी को बढ़ावा मिल रहा है। क्लस्टर में पौधों एवं फलों को जंगली जानवरों तथा बेसहारा पशुओं से बचाने के लिए बाड़बंदी भी की गई है। उनका कहना है कि आने वाले वर्षों में लीची का यह क्लस्टर जुड़े परिवारों की आर्थिक समृद्धि का मजबूत आधार बनेगा।

उपायुक्त बिलासपुर राहुल कुमार का कहना है कि एचपी शिवा परियोजना ने यह सिद्ध किया है कि यदि योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन, आधुनिक तकनीक और किसानों की मेहनत एक साथ जुड़ जाए तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा और नई गति दी जा सकती है। जिला के लंझता गांव के हरे-भरे लीची के बाग आज इसी सकारात्मक परिवर्तन के साक्षी बने हैं। जिला प्रशासन का भी यह प्रयास रहता है कि संबंधित विभागों के माध्यम से सरकारी योजनाओं का समयबद्ध एवं बेहतर क्रियान्वयन सुनिश्चित हो ताकि योजनाओं का समयबद्ध लाभ पात्रों तक पहुंच सके तथा उनके जीवन में सकारात्मक एवं आर्थिक बदलाव लाया जा सके।  
-000- DOP 07/07/2026