चौंतड़ा ब्लॉक में गत वर्ष 81 बेटियों को मिले 29.71 लाख रुपये, इस वर्ष 29 मामलों 10.59 लाख रुपये
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥ (श्रीमद् भगवद्गीता)
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Tuesday, 10 October 2023
मुख्य मंत्री कन्या दान और शगुन योजनाओं के तहत बेटियों की शादी में मददगार बन रही प्रदेश सरकार
Tuesday, 5 September 2023
राष्ट्रीय शिक्षक दिवस: कुछ प्रश्न, कुछ विचार मंथन
दोस्तों आज मैं सुबह जैसे ही उठा तो मेरी नन्ही सी बिटिया अपने छोटे-छोटे हाथों से एक सुंदर सा कार्ड बनाने में जुटी हुई थी। मैंने उससे पूछा कि यह क्या बना रही हो? तो उसने कहा कि आज शिक्षक दिवस है और मैं अपनी प्रिय अध्यापिका को अपने हाथों से बनाया हुआ एक कार्ड गिफ्ट करना चाहती हूं। जब उसने हैप्पी टीचर डे का वह सुंदर सा कार्ड बना लिया तो बिटिया ने कहा कि यह अच्छा नहीं बना है मैं दूसरा बनाना चाहती हूं लेकिन मैंने कहा कि इसे ही सुंदर बनाने में मैं आपकी मदद करता हूं। लेकिन अब यहां पर बात कार्ड के सुंदर या अच्छा होने की नहीं है बल्कि विद्यार्थी की अध्यापक के प्रति वह भावना है जिसे हम शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकते हैं।
दोस्तों आज राष्ट्रीय शिक्षक दिवस है, नि:संदेह सर्वप्रथम आप सभी को शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। दोस्तों मुझे भी बतौर शिक्षक विभिन्न शिक्षण संस्थानों में स्कूल से लेकर कॉलेज स्तर तक कार्य करने का मौका मिला है। इस दौरान शिक्षा प्राप्त किए हुए विधार्थी आज हमारी सामाजिक व्यवस्था में डॉक्टर, इंजीनियर, प्रशासक, सैनिक, वकील, शिक्षक सहित विभिन्न व्यवसायों में अपनी प्रतिभा के झंडे भी गाड रहे हैं। लेकिन बतौर अध्यापक मुझे जो अनुभव मिला, जो बस इतना ही बता रहा है कि कहीं न कहीं हमारी शिक्षा प्रणाली जीवन के वास्तविक लक्ष्यों व उद्देश्यों से भटकती हुई महसूस की है। हमारी शिक्षा में गौण होते मूल्य, आदर्श, नैतिकता तथा गिरती गुणवत्ता। नई शिक्षा नीति में इस दिशा में प्रयास जरूर शुरू हुए हैं, लेकिन नतीजे आने से पहले कुछ कहना जल्दबाजी होगा। हकीकत हो यह हो गई है कि डिग्रीयों व अंकों के मकडज़ाल में फंसी हमारी शिक्षा अब व्यापारिक लोगों के लिये फायदे का सौदा भी साबित हो रही है।
मुझे लगता है कि आज सर्वप्रथम शिक्षकों के चयन प्रक्रिया पर गंभीर होना चाहिए। हमें याद रखना चाहिए की शिक्षण के माध्यम से केवल कुछेक लोगों को रोजगार देना मात्र नहीं है, बल्कि देश के करोड़ों बच्चों के साथ-साथ देश का भविष्य निर्माण भी जुड़ा हुआ है। आज हमें कागज़ी पहलवानों से अधिक दिन-रात अपने विद्यार्थियों व समाज के लिए समर्पण की भावना से कार्य करने वालों की ज्यादा जरूरत है। हमें तो वह चाहिए जो हम सबमें सर्वश्रेष्ठ हो। जो समर्पण, त्याग व उच्च मूल्यों व परंपराओं से भरा हो। ऐसा भी नहीं है कि हमारे पास ऐसे शिक्षक नहीं है। हमारे आसपास ऐसे बहुत से लोग हैं जो अभी भी अपने मिशन पर निस्वार्थ भाव से लगे हुए हैं। लेकिन ऐसे लोगों को या तो हमारी नजरें ढूंढ ही नहीं पाती या फिर हम इस चमक-धमक व जुगाड भरी दुनिया में उन्हे तलाशना ही नहीं चाहते। हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि निस्वार्थ भाव से देश सेवा में लगे ऐसे लोग स्वाभिमान व आत्म सम्मान से भरे होते हैं।
दूसरा विद्यार्थियों को जीवन में जीवन यापन के लिए तैयार तो करना ही है, लेकिन उससे कहीं अधिक उनके भीतर एक इंसानियत का पाठ भी पढ़ाना बेहद जरूरी हो जाता है। आज हम अक्सर देखते हैं कि व्यक्ति जीवन में धन दौलत, ऊंचा पद इत्यादि सब कुछ पा लेता है, लेकिन स्वार्थ भावना से पीडि़त ऐसे व्यक्ति देश व समाज के लिए गौण साबित होने पर हमारी शिक्षा पर ही प्रश्न चिन्ह खड़ा हो जाता है?
तीसरा व अहम पहेलु देश में चल रही विभिन्न प्रकार की स्कूली शिक्षा से है। एक ऐसी स्कूली शिक्षा प्रणाली पर आगे बढऩा होगा जिसमें व्यक्ति अमीरी और गरीबी, उच्च या नीच, धर्म, जाति या संप्रदाय के आधार पर विभक्त ना होकर केवल एक विद्यार्थी के नाते शिक्षा ग्रहण करे।
मुझे लगता है कि राष्ट्रीय शिक्षक दिवस के अवसर पर देश का एक आम नागरिक होने के नाते हमें शिक्षक और शिक्षा से जुड़े ऐसे कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर विचार मंथन करना चाहिए जो भविष्य में राष्ट्र निर्माण में अहम कड़ी साबित हो सकते हैं। लेकिन अंत में यही प्रश्न खड़ा हो जाता है कि क्या इन संवेदनशील बातों पर चर्चा व मंथन करने के लिए हमारा समाज तैयार है?
Friday, 25 August 2023
Shri Triloknath Dham Temple, Udaipur in Lahaul valley of Himachal Pradesh
Triloknath temple is situated in Udaipur sub division of District Lahaul and Spiti of Himachal Pradesh. It is nearly 45 KM from Keylong, Distt Head Quarter of Lahaul and Spiti nearly 100 KM from Manali via Atal Tunnel. Ancient name of Triloknath temple is Tunda vihar.This is holy shrine is revered equally by Hindus and the Buddhists. Hindus consider Triloknath deity as ‘Lard Shiva’ while the Buddhists consider the deity as ‘ Arya Avalokiteshwar ‘ Tibetan language speaking people called him as ‘Garja Fagspa‘.
This is a single temple of Lahaul valley in Shiker Style.Deity of Triloknath Ji is six hundred and lalitasan Lord Buddha is sitting on head of Triloknath.The deity is made up of marble.
There is also local story after the manifestation of this deity. It was said that there was a lake on the present Hinsa Nalla. Seven persons of milky cower use to come out of this lake & drink the milk of grazing cows. One day one of them was caught by Tundu Cowherd boy and was taken to village on his back.There the caught person converted into a marble deity.This deity was established in the temple.
This lake is called as ‘Ome –cho milky ocean ) in Tibetan stories.Other local story described that temple was completed in one night by ‘ Mah Danav’. The present Hinsa Nalla is unique as its water is still milky white and is never changes its color even in heaviest rainfall. Worship is performed in this temple according to Buddhist traditions.It is a practice since time immemorial.
(Source of Information-District Administration L & S Website)
The Mrikula (Markula) Devi Temple, Udaipur in Lahual valley of Himachal Pradesh
Tuesday, 22 August 2023
हडिम्बा देवी मंदिर, मनाली (कुल्लू) हिमाचल प्रदेश
देवी हडिम्बा को समर्पित पैगोड़ा शैली का यह प्राचीन मंदिर सन् 1553 ई. में कुल्लू के राजा बहादुर सिंह ने बनवाया था। पैगोड़ा शैली में निर्मित मंदिर की ऊंचाई आधार से लगभग 80 फीट है तथा यह तीन ओर से 12 फीट ऊंचाई वाले संकरे बरामदे से घिरा है। इसकी दलवां काष्ठ निर्मित छत चार भागों में विभक्त है। जिसका ऊपरी भाग गोलाकार है जो कि कांस्य कलश एवं त्रिशूल से सुशोभित है। वर्गाकार गर्भगृह में हडिम्बा देवी की कांस्य निर्मित सुंद प्रतिमा प्रतिष्ठित है तथा चतुष्पदिय प्रवेश द्वार विभिन्न देवी-देवताओं तथा वेलबूटे, घटपल्लव अभिप्राय, पशु जैसे हाथी, मकर इत्यादि के अंकन सुसज्जित हैं। प्रवेश द्वार के दायीं ओर महिषासुर मर्दिनी, हाथ जोड़े भक्त तथा नंदी पर आसीन उमामहेश्वर और बायीं ओर दुर्गा, हाथ जोड़े भक्त तथा गरूड़ पर आसीन लक्ष्मीनारायण को दर्शाया गया है। ललाटबिम्ब गणेश तथा उसके ऊपर शहतीर पर नवग्रहों का अंकन है। सबसे ऊपरी भाग में बौद्ध आकृतियां उकेरी गई हैं। इस स्थान को वर्ष 1967 में इसे प्राचीन संस्मारक तथा पुरातत्वीय स्थल और अवशेष अधिनियम-1958 के तहत राष्ट्रीय महत्व का संरक्षित स्मारक घोषित किया गया है।
प्राचीन कथानुसार हडिम्बा महाभारत काल में एक विशेष कार्य की पूर्ति के लिए राक्षस कुल में पैदा हुई थी। यह अपने भाई हडिम्ब के साथ रहती थी जो बहुत बलशाली था और सारे क्षेत्र में उसकी दहशत थी। जब पांडवों के अज्ञातवास के समय भीम व हडिम्बा का मिलन हुआ वो हडिम्ब को कतई पसंद न था जिसके विरोधस्वरूप उसने भीम को युद्ध के लिए ललकारा। कई दिनों तक दोनों में भीषण युद्ध हुआ अंत में भीम ने उसे मार गिराया। इसके पश्चात माता कुंती के आशीर्वाद से भीम व हडिम्बा का विवाह इस शर्त के साथ हुआ कि भीम केवल संतान होने तक हडिम्बा के साथ रहेंगे। उसके बाद अपने भाइयों व माता संग चले जाएंगे। माता कुंती अपने चार पुत्रों के साथ भीम को हडिम्बा संग छोडक़र आगे निकल जाते हैं। ठीक एक वर्ष के बाद हडिम्बा को पुत्र की प्राप्ति होती है जिसका नाम घटोत्कच रखा गया। यही घटोत्कच महाभारत में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है जब कर्ण के द्वारा छोड़े गए अचूक शस्त्र का अपना बलिदान देकर उसे अपने ऊपर लेकर अर्जुन के प्राण बचाता है तथा मरते-मरते कौरवों की सेना को भारी क्षति पहुंचाता है। इस महान बलिदान के बाद भगवान कृष्ण पुत्र घटोत्कच व माता हडिम्बा को वरदान देते हैं कि आने वाले युगों में तुम्हारे इस बलिदान को सदा याद रखा जाएगा।
इसके बाद माता हडिम्बा ने यहां अपना राक्षसी स्वरूप त्याग कर कई वर्षों तक तपस्या की। कुल्लू में क्रूर पीती ठाकुरों के शासन का सर्वनाश कर विहंगमणिपाल को कुल्लू के राज सिंहासन पर बिठाया। आज माता हडिम्बा को काली व दुर्गा के रूप में पूजा जाता है। मंदिर के भीतर विशाल शीला के नीचे माता हडिम्बा के चरणों व पीछे बड़ी शीला के साथ महिषासुर मर्दिनि के दर्शन कर सकते हैं। मई माह में माता हडिम्बा के जन्मदिन के अवसर पर मेला मनाया जाता है। कुल्लू का दशहरा भी माता हडिम्बा के द्वारा शुरू किया जाता है।
Tuesday, 1 August 2023
नागेश्वर महादेव कुड्ड जहां प्राकृतिक तौर पर निर्मित हुए हैं अनेकों शिवलिंग
Friday, 28 July 2023
बाबा बालक नाथ जी का मूल स्थान है बनाड़, ऊंची पहाड़ी पर स्थित है मंदिर
मंदिर परिसर में मिलता है अलौकिक शांति का अनुभव, आसपास का वातावरण है बेहद शांत व खूबसूरत
Sunday, 25 June 2023
ऊना के विपन धीमान ई-रिक्शा बनाकर बने उद्यमी, पंडोगा में स्थापित किया प्लांट
सीएम स्टार्टअप योजना के तहत आईआईटी मंडी में एक वर्ष तक प्रोजेक्ट पर किया शोध कार्य
कभी बचपन से भारतीय सेना ज्वाईन कर देश सेवा का सपना पाले ऊना के 38 वर्षीय विपन धीमान आज ई-रिक्शा बनाकर उद्यमी बन गए हैं। विपन धीमान ने प्रदेश सरकार की विभिन्न स्वावलंबी योजनाओं का लाभ उठाते हुए ऊना के औद्योगिक क्षेत्र पंडोगा में ई-रिक्शा प्लांट स्थापित किया है। मुख्य मंत्री स्टार्टअप योजना के तहत इंक्युबेशन केंद्र आईआईटी मंडी में ई-रिक्शा पर एक वर्ष तक शोध कार्य करते हुए वे न केवल ई-रिक्शा का सफलतापूर्वक उत्पादन कर रहे हैं बल्कि अब 6 अन्य युवाओं को रोजगार भी प्रदान किया है।
वर्तमान में विपन धीमान के ई-रिक्शा के हिमाचल, चंडीगढ तथा पंजाब में कुल 5 डीलर भी कार्य कर रहे हैं जिनके माध्यम से लोग ई-रिक्शा को खरीद सकते हैं। अब तक 15 ई-रिक्शा का निर्माण कर लगभग 35 लाख रूपये राशि जुटा चुके हैं। उनके द्वारा तैयार ये ई-रिक्शा न केवल पर्यावरण के अनुकूल हैं बल्कि ऊना सहित अन्य स्थानों पर धड़ल्ले से यात्रियों को लाने व ले जाने का कार्य भी सफलता पूर्वक कर रहे हैं।
बचपन में पाला सेना में शामिल होने का सपना, एक अच्छे खिलाडी भी हैं विपन धीमान
जब विपन धीमान से उनके द्वारा तैयार इलेक्ट्रिक वाहन (ई-रिक्शा) निर्माण की कहानी पर बातचीत की तो वे कहते हैं कि बचपन से ही भारतीय सेना में भर्ती होने का सपना पाला हुआ था तथा शारीरिक तौर पर स्वयं को तैयार भी करते रहे।
स्कूली शिक्षा के दौरान उन्होंने एनसीसी भी ज्वाईन कर ली थी। लेकिन इस बीच शारीरिक समस्या के चलते सेना में भर्ती होने से रह गए तथा कॉलेज में स्नातक की पढाई शुरू कर दी। साथ ही एनसीसी में प्रमुखता से भाग लेते हुए एनसीसी-सी सर्टिफिकेट भी हासिल किया। साथ ही बॉक्सिंग व शूटिंग खेल प्रतियोगिताओं में भाग लेते रहे तथा प्रदेश स्तर पर गोल्ड व सिल्वर मेडल भी जीते। स्नातक स्तर की परीक्षा में कम अंकों के चलते वे एनसीसी सी सर्टिफिकेट के बावजूद सेना में एक बार फिर भर्ती होने से वंचित रहना पड़ा।ग्रेजुएशन के बाद संभाला पिता का ऑटो स्पेयर पार्टस बिजनेस, ऑटो सेक्टर में काम करने का बढ़ा जज्बा
भावुक होते हुए विपन धीमान कहते हैं कि कॉलेज शिक्षा पूरी होते ही पिता नौकरी के लिए विदेश चले गए। उन्हें पारिवारिक स्पेयर पार्टस के बिजनेस को संभालना पड़ा। इस दौरान ऑटो सेक्टर में कुछ हटकर करने का जज्बा पैदा हुआ। वर्ष 2010 में रोपड़ स्थित रियात-बाहरा पॉलीटेक्निक संस्थान में ऑटो मोबाइल पाठयक्रम में प्रवेश ले लिया। वर्ष 2013 में डिप्लोमा पाठयक्रम के अंतिम समेस्टर में एक ऐसा प्रोजेक्ट तैयार किया जिसे राज्य स्तर पर सर्वश्रेष्ठ आंका गया। इसके बाद चंडीगढ से डिजाइन कैड में मास्टर डिप्लोमा भी हासिल किया। उन्होंने महिंद्रा ऑटो कंपनी में एक साल तक कार्य किया तथा वर्ष 2015 में वे दुबई चले गए। दुबई में भी ऑटो मोबाइल सेक्टर कंपनी में काम करते हुए इसकी बारीकियों को समझा। वर्ष 2017 में स्वदेश लौटे तथा पारिवारिक बिजनेस को पुन: संभालना शुरू किया।जब दिल्ली में किया ई-रिक्शा में सफर, कमियों को पहचान ई-रिक्शा निर्मित करने को बढ़ाए कदम
विपन धीमान कहते हैं कि वर्ष 2017 में बिजनेस के संबंध में दिल्ली गए तो उन्हें ई-रिक्शा में सफर करने का मौका मिला। इस दौरान ई-रिक्शा निर्माण की खामियों को पहचाना तथा एक अच्छा मॉडल तैयार करने की ठानी। इंटरनेट के माध्यम से ई-रिक्शा बनाने के सभी पैरामीटर को जाना व समझा तथा वर्ष 2018 में ई-रिक्शा का प्रोटोटाइप मॉडल तैयार किया। लगभग एक माह तक शोध करने के बाद अपने स्तर पर ही लगभग 15 लाख रूपये व्यय कर ई-रिक्शा निर्मित करने का निर्णय लिया। इस बीच प्रदेश सरकार की ओर से उद्योग विभाग के तहत आर्थिक सहायता की जानकारी मिली। उद्योग विभाग के माध्यम से डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट (डीपीआर) सरकार को प्रस्तुत करके उन्हें सीएम स्र्टाटअप स्कीम के तहत स्वीकृति मिली। स्कीम के तहत 10 लाख रूपये तथा इंक्युबेशन केन्द्र के माध्यम से 15 लाख रूपये स्वीकृत हुए। वर्ष 2019 में इंक्युबेशन केंद्र आईआईटी मंडी ने ई-रिक्शा प्रोजेक्ट पर कार्य करने की स्वीकृति प्रदान की और 1.50 लाख रूपये की राशि भी उपलब्ध करवाई।हिम स्टार्टअप के तहत स्वीकृत हुए 50 लाख रूपये, जनवरी 2023 से शुरू किया उत्पादन
आईआईटी मंडी ने ई-रिक्शा प्रोजेक्ट का प्रमाणीकरण कर उन्हें हिम स्र्टाटअप स्कीम के तहत 50 लाख रूपये, भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय की निधि ट्रिप्पल एस (एनआईडीएचआई सीड स्पोर्ट प्रोग्राम) स्कीम के तहत 20 लाख रूपये की आर्थिक सहायता राशि स्वीकृत हुई। अप्रैल, 2022 में ऊना के पंडोगा में ई-रिक्शा मैन्युफैक्चरिंग इकाई स्थापित की तथा जनवरी 2023 से ई-रिक्शा का उत्पादन शुरू कर दिया है। उन्होंने अब तक 15 ई-रिक्शा तैयार कर लगभग 35 लाख रूपये की राशि जुटा ली है।क्या कहते हैं अधिकारी:
संयुक्त निदेशक उद्योग विभाग अंशुल धीमान का कहना है कि सीएम स्टार्टअप स्कीम के तहत विपन धीमान के ई-व्हीकल प्रोजेक्ट को स्वीकार करते हुए आईआईटी मंडी के माध्यम से शोध कार्य किया गया। पंडोगा औद्योगिक क्षेत्र में 2 हजार वर्ग मीटर का प्लाट आवंटित कर एक करोड रूपये का निवेश कर प्रोडक्शन इकाई स्थापित की है। जनवरी 2023 से ई-व्हीकल (ई-रिक्शा) का व्यावसायिक उत्पादन भी शुरू कर दिया है। उन्होंने प्रदेश के ऐसे युवाओं से आगे आने का आहवान किया है जो इन्नोवेटिव आईडिया के तहत उद्यम स्थापित कर आगे बढना चाहते हैं, प्रदेश सरकार हैं उनकी पूरी मदद करेगी।
Tuesday, 20 June 2023
कांगड़ा घाटी रेलवे लाइन का अंतिम स्टेशन जोगिन्दर नगर
164 किलोमीटर लंबी कांगड़ा घाटी रेलवे लाइन (पठानकोट-जोगिन्दर नगर) का अंतिम रेलवे स्टेशन मंडी जिला का जोगिन्दर नगर कस्बा है। ब्रिटीश इंजीनियर कर्नल बी.सी. बैटी तथा उनकी टीम ने जोगिन्दर नगर स्थित शानन पॉवर हाउस निर्माण के लिए मशीनरी को यहां तक पहुंचाने की दृष्टि से इस रेलवे लाइन का निर्माण किया था। वर्ष 1925 में तत्कालीन पंजाब सरकार ने शानन पनविद्युत परियोजना निर्माण को देखते हुए पठानकोट से जोगिन्दर नगर तक 2 फीट 6 इंच नैरो गेज लाइन बनाने का प्रस्ताव रखा। 164 किलोमीटर लंबी यह रेलवे लाइन उत्तर पश्चिम रेलवे के लाहौर मंडल का हिस्सा थी। इस रेलवे लाइन पर एक अप्रैल, 1929 से यात्री यातायात आरंभ किया गया। इस रेलवे लाइन के निर्माण की वास्तविक लागत 296 लाख रूपये थी।
Tuesday, 13 June 2023
नागचला में सच्चे मन से मांगी मन्नत होती है पूरी, 20 भाद्रपद को आयोजित होता है मेला
मंदिर परिसर में मिलता है अलौकिक शांति का अनुभव, आसपास का वातावरण है बेहद खूबसूरत
मंडी जिला के जोगिंदर नगर उपमंडल के तहत गांव हराबाग में नाग देवता का प्रसिद्ध मंदिर नागचला स्थित है। कहते हैं कि यहां पर सच्चे मन से मांगी गई मन्नत को नाग देवता पूरी करते हैं। इस स्थान पर प्रति वर्ष 20 भाद्रपद को एक बड़े मेले का आयोजन किया जाता है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं।
नागचला में प्राकृतिक तौर पर दिव्य पानी बहता है। कहते हैं कि यह पानी छोटा भंगाल घाटी की प्रसिद्ध डहनसर झील से चलकर यहां निकला है। इस पवित्र पानी से स्नान आदि करने के बाद सच्चे मन से मांगी गई मन्नत को नागचला देवता पूरी करते हैं। श्रद्धालु मन्नत पूरी होने पर मंदिर में स्नान आदि कर देवता के दर्शन करते हैं। साथ ही श्रद्धालु नागचला के पानी को बोतल में भरकर घर भी ले जाते हैं। प्रतिवर्ष 20 भाद्रपद को लगने वाले विशेष मेले में श्रद्धालुओं की संख्या देखने योग्य होती है। इस दिन जहां श्रद्धालु मंदिर में नाग देवता के दर्शन करते हैं तो वहीं नागचला के इस दिव्य पानी से स्नान भी करते हैं। दिव्य स्नान के लिए मंदिर परिसर में पुरूषों व महिलाओं के लिए अलग-अलग स्नानागार की व्यवस्था रहती है।इसी तरह एक महिला की कहानी भी बताई जाती है। उस महिला ने भी मांगी गई मन्नत पूरी होने पर नागचला देवता को काजल लगाने का वायदा किया था। कहते हैं कि वह महिला वायदे अनुसार नागदेवता के असली रूप को देखकर घबरा गई तथा नाग देवता को काजल लगाने में असफल रहीं। ऐसे में नाग देवता महिला से नाराज हुए तथा उसके साथ भी अनिष्ट हुआ।
अर्जुन सिंह बताते हैं कि आज भी लोग सच्चे मन से नागचला देवता से मन्नतें मांगते हैं तथा नागचला देवता उन्हे पूरा भी करते हैं। नागचला देवता के प्रति श्रद्धालुओं की गहरी आस्था है तथा प्रतिवर्ष हजारों श्रद्धालु नागचला के दर्शनार्थ मंदिर परिसर में पहुंचते हैं।
मंदिर परिसर में होता है अलौकिक शांति का अनुभव, आसपास का वातावरण है बेहद खूबसूरत
नागचला मंदिर परिसर में पहुंचने पर अलौकिक शांति का अनुभव होता है। मंदिर परिसर के आसपास का दृश्य प्राकृतिक तौर पर बेहद खूबसूरत है। मंदिर परिसर के आसपास घने पेड़ों की मौजूदगी यहां की खूबसूरती ज्यादा आकर्षक एवं आंखों को सुकून प्रदान करने वाला दृश्य बनाती है।कैसे पहुंचे मंदिर:
जोगिन्दर नगर-मंडी राष्ट्रीय उच्च मार्ग पर जोगिन्दर नगर कस्बे से मंडी की ओर महज 3 किलोमीटर की दूरी पर ग्राम पंचायत हारगुणैन के गांव हराबाग में यह पवित्र स्थान मौजूद है। मुख्य सडक़ से मंदिर की दूरी लगभग आधा किलोमीटर है तथा मंदिर परिसर पक्की सडक़ से जुड़ा हुआ है। श्रद्धालु वाहन के माध्यम से भी आसानी से मंदिर परिसर में पहुंचकर नागचला देवता के दर्शन कर सकते हैं।




















































