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Wednesday, 20 May 2020

शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है औषधीय गुणों से भरपूर 'काफलÓ

हिमालय के एक विशेष क्षेत्र में जंगली तौर पर पाया जाता है यह फल, कई रोगों में है रामबाण
हिमाचल प्रदेश सहित हिमालय के अन्य क्षेत्रों में जंगली तौर पर पाया जाने वाला फल 'काफलÓ कई औषधीय गुणों से भरपूर होने के कारण शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने का काम करता है। प्रति वर्ष अप्रैल से जून माह के बीच काफल पक कर तैयार हो जाता है। काफल आर्थिक तौर पर भी स्थानीय लोगों के लिए लाभकारी सिद्ध होता है। काफल के कारण प्रतिवर्ष स्थानीय लोग बड़ी मात्रा में इसकी खेप को आसपास के स्थानीय बाजारों में पहुंचाकर काफी लाभ अर्जित करते हैं।


काफल जंगली तौर पर पाया जाने वाला एक फल ही नहीं है बल्कि हमारे शरीर में एक औषधी का काम भी करता है। काफल में विटामिन्स, आयरन और एंटी ऑक्सीडेंन्टस प्रचूर मात्रा में पाये जाते हैं। इसके साथ ही यह कई तरह के प्राकृतिक तत्वों जैसे माइरिकेटिन, मैरिकिट्रिन और ग्लाइकोसाइड्स से भी परिपूर्ण है। इसकी पत्तियों में लावेन -4-हाइड्रोक्सी-3 पाया जाता है। काफल के पेड़ की छाल, फल तथा पत्तियां भी औषधीय गुणों के लिये जानी जाती है। काफल की छाल में एंटी इन्फलैमेटरी, एंटी-हेल्मिंथिक, एंटी-माइक्रोबियल, एंटी-ऑक्सीडेंट और एंटी-माइक्रोबियल क्वालिटी पाई जाती है। इतने गुणों से परिपूर्ण काफल न केवल रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है बल्कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारी की रोकथाम का भी काम करता है। काफल का अत्यधिक रस-युक्त फल पाचक होता है। काफल के फल के ऊपर लगा भूरे व काले धब्बों से युक्त मोर्टिल मोम अल्सर की बीमारी में प्रभावी माना गया है। काफल का फल खाने से पेट के कई प्रकार के विकार दूर होते हैं। साथ ही इसका सेवन मानसिक बीमारियों समेत कई प्रकार के रोगों के लिए भी फायदेमन्द माना गया है। इसके पेड़ की छाल का सार, अदरक तथा दालचीनी का मिश्रण अस्थमा, डायरिया, बुखार, टाइफाइड, पेचिश तथा फेफड़े से ग्रस्त बीमारियों के लिए अत्यधिक उपयोगी माना गया है। साथ ही काफल के पेड़ की छाल का पाउडर जुकाम, आँख की बीमारी तथा सरदर्द में सूँधनी के रूप में प्रयोग में लाया जाता है। 


काफलड़ी चूर्ण को अदरक के जूस तथा शहद के साथ मिलाकर उपयोग करने से गले की बीमारी, खाँसी तथा अस्थमा जैसे रोगों से मुक्ति दिलाने में मददगार होता है। इसके अलावा काफल की छाल दांत दर्द तथा छाल का तेल कान दर्द के लिये भी अत्यधिक उपयोगी माना गया है। यही नहीं काफल के फूल का तेल भी कान दर्द, डायरिया तथा लकवे की बीमारी में उपयोग के साथ-साथ हृदय रोग, मधुमेय रोग उच्च एंव निम्न रक्त चाप को नियान्त्रित करने में भी सहायक होता है।
कहां पाया जाता है काफल
काफल उत्तरी भारत और नेपाल के पर्वतीय क्षेत्र, मुख्यत हिमालय की तलहटी क्षेत्रों में पाया जाने वाला सदा हरा भरा रहने वाला एक काष्ठीय वृक्ष प्रजाति है। काफल का पेड़ 1300 मीटर से 2100 मीटर (4000 फीट से 6000 फीट) तक की ऊँचाई पर प्राकृतिक रूप से पैदा होने वाला बृक्ष है। काफल अधिकतर हिमाचल प्रदेश, उतराखंड, उत्तर-पूर्वी राज्य मेघालय और नेपाल में बहुतायत मात्रा में पाया जाता है। काफल को बॉक्स मर्टल और बेबेरी के नाम से भी जाना जाता है।
कैसा होता है काफल का फल
काफल खाने में स्वादिष्ठ, रंग में हरा, लाल और काले रंग का फल है। इस फल को वैज्ञानिक तौर पर माइरिका एस्कुलेंटा के नाम से भी जाना जाता है। काफल का फल गर्मी में शरीर को ठंडक प्रदान करता है। साथ ही इसके फल को खाने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है।
क्या कहते हैं अधिकारी
नेशनल मेडिसिनल प्लांट्स बोर्ड के क्षेत्रीय निदेशक, क्षेत्रीय एवं सुगमता केंद्र उत्तर भारत स्थित जोगिन्दर नगर डॉ. अरूण चंदन का कहना है कि काफल जंगली तौर पर पाया जाना वाला एक विशेष मौसमी फल है। औषधीय गुणों से भरपूर यह फल शरीर में प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने का काम करता है। इस फल के सेवन से कई तरह की बीमारियों से बचाव होता है तथा इसके कारण स्थानीय लोगों की आर्थिकी को भी बल मिलता है।

Monday, 11 May 2020

वैश्विक महामारी कोविड-19 की जंग में भारतीय मानवीय दृष्टिकोण

संपूर्ण विश्व की मानवता आज कोविड-19 महामारी के बीच मानो अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। भारत वर्ष के संदर्भ में भी कहें तो प्रत्येक भारतवासी पिछले डेढ़ माह से पूरे समर्पण भाव से अपने-अपने घर में बंद होकर इस जंग से लड़ रहा है। इसी बीच इस कोरोना युद्ध में आने वाला वक्त न केवल कठिन होगा बल्कि हमें मानवता व आर्थिक पक्ष के बीच भी एक भयंकर द्वन्द्व देखने को मिल सकता है। जिसमें या तो मानवीय पक्ष या फिर आर्थिक पक्ष में कौन विजयी पताका लहराएगा ये तो भविष्य के गर्भ में छिपा है। परन्तु भारतीय संस्कृति ने मानवीय कल्याण व उत्थान को हमेशा ऊपर रखा है। लेकिन तथाकथित आधुनिकता से भरी इस दुनिया में मानवीय कल्याण व उत्थान में आर्थिक पक्ष को भी कम नहीं आंक सकते हैं। ऐसे में अब हमें यह तय करना होगा कि मानवीय मूल्यों व भौतिकतावाद (आर्थिक पक्ष) के बीच समन्वय बिठाकर कोरोना की इस जंग से विजयी होना है या फिर मैं व मेरा की पश्चिमी संस्कृति का पोषण कर हम व हमारा वाली मानवता को हराना है।लेकिन कोरोना की इस जंग में अगर पश्चिमी मॉडल व संस्कृति की ओर नजर दौडाएं तो कोरोना महामारी से जुड़े अब तक के आंकड़े व वहां की वर्तमान स्थिति में मानवता व मानवीय मूल्य हारते हुए नजर आ रहे हैं। जिस विकास मॉडल का उदाहरण दे-दे कर हम अपनी नस्सलों को शिक्षित करते हुए गौरवान्वित अनुभव करते रहे हैं, उसी मॉडल के कारण आज भौतिकतावाद के आगे मानवीय पक्ष हारता हुआ नजर आ रहा है। दुनिया के विकसित देशों में कोरोना संक्रमण के बढ़ते आंकड़े व हो रही मौतें तो बस यही कह रही है कि हमें दूसरों के अनुसरण को त्याग कर अपना विकास मॉडल स्वयं विकसित करना होगा। हमारी समृद्ध प्राचीन संस्कृति भी इसी का पोषण करती रही है जिसे अब हमें न केवल आगे बढ़ाना होगा बल्कि अपनी नस्लों को विकसित देशों के उदाहरण देने के बजाए हमें अपनी वैदिक संस्कृति व प्राचीन भारत की ओर मुडऩा होगा। हमें इस बात पर भी गौर करना होगा कि प्राचीन भारत का विकास मॉडल न केवल कोरोना जैसी महा विनाशकारी बीमारी में हमें मजबूत बनाता है बल्कि संकट की इस घड़ी में इसे पुर्नजीवित करने की आवश्यकता भी महसूस हो रही है। 
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी हमेशा ग्रामीण विकास के उत्थान की बात करते रहे हैं। यदि आज हमारे ग्रामीण क्षेत्र आर्थिक पक्ष की दृष्टि से मजबूत होते तो हम कोरोना महामारी को बड़ी कुशलता के साथ न केवल हराने में सक्षम होते बल्कि मानवीय पक्ष भी हमेशा सर्वोपरि रहता। इस बीच न तो लोगों को बड़ी संख्या में एक जगह से दूसरी जगह पलायन को मजबूर होना पड़ता न ही यह संक्रमण बड़े पैमाने पर हमारे गांव व घरों में दस्तक दे पाता। कहने को तो आज हम स्वास्थ्य के क्षेत्र में दुनिया के तथाकथित विकसित देशों के तय मापदंडों के मुकाबले कमतर है, हमारे पास तथाकथित विश्व रैंकिंग वाले शैक्षणिक संस्थान भी नहीं है। लेकिन यहां पर हमें समझना होगा कि जहां हमारे आयुर्वेद व योग में बड़ी से बड़ी महामारी से लडऩे में क्षमता है बल्कि हमारी गुरूकूल शिक्षा पद्धति पश्चिमी देशों की पांच सितारा शिक्षा के मुकाबले कहीं आगे रही है। जिस विज्ञान का दंभ भर कर पश्चिमी देश विकास मॉडल की बात करते हैं ये सब तो हमारे प्राचीन वेद ग्रंथों में पहले से ही मौजूद है लेकिन दुर्भाग्य वश हमने न तो इसे समझने का प्रयास ही नहीं किया बल्कि पश्चिमी देशों के एजेंडे के आगे हम नतमस्तक होते चले गए। जिसका खामियाजा आज पूरी दुनिया के साथ-साथ देश की 135 करोड़ आबादी भी भुगतने को मजबूर हुई है।
लेकिन कोरोना वायरस की इस लड़ाई के बीच भारत के मानवीय दृष्टिकोण के आगे आज इस वैश्विक महामारी की चमक न केवल फिकी पड़ती नजर आ रही है बल्कि कोरोना संक्रमण को भी बड़े पैमाने पर फैलने से रोकने में कुछ हद तक हम कामयाब भी हुए हैं। इस संकट की घड़ी में समाज के छोटे से छोटे तबके से जुड़ा व्यक्ति भले ही आर्थिक तौर पर कमजोर जरूर है लेकिन मानवीय दृष्टिकोण के आगे उसकी जेब कम नहीं पड़ रही है। हमारे समाज में आज कितने ही ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे कि लोग प्रतिदिन इस संकट की घड़ी में न केवल मास्क तैयार करने में जुटे हैं बल्कि आर्थिक अंशदान व जरूरतमंदों को भोजन व राशन उपलब्ध्ध करवाने में भी कतई पीछे नहीं हैं। इस तरह का जज्बा न केवल हमारी समृद्ध संस्कृति का प्रतीक है बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक मानवता का संदेश भी दे रहा है। यहां गौर करने वाली बात तो यह है कि आज कोरोना वायरस (कोविड-19) महामारी के खात्मे को लेकर पूरी दुनिया भारत की ओर देख रही है। ऐसे में यह वक्त न केवल समृद्ध संस्कृति को पूरी दुनिया में ले जाने का है बल्कि आयुर्वेद व योग के माध्यम से हम इस बीमारी को रोकने का प्रयास भी कर सकते हैं।
ऐसी विकट परिस्थति में अब यह आपको ही तय करना है कि क्या हमें पश्चिमी मॉडल की मैं व मेरा केन्द्रित आगे बढऩे वाली संस्कृति का पोषण करना है या फिर हम व हमारा जैसे मानवीय मूल्यों व मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण समृद्ध भारतीय संस्कृति का संरक्षण व संवर्धन कर आने वाली पीढ़ी को शिक्षित करना है। कोरोना महामारी के चलते इस जिंदगी व मौत की लड़ाई में अब यह आपको ही खुलेमन से तय करना है कि हमें पश्चिमी मॉडल अपनाना है या फिर समृद्ध प्राचीन भारतीय संस्कृति को आगे बढ़ाना है।

Thursday, 7 May 2020

कोरोना महामारी के बीच आयुर्वेद विभाग का मधुयष्टियादि काढ़ा बढ़ाएगा रोग प्रतिरोधक क्षमता

जोगिन्दर नगर आयुर्वेदिक फॉर्मेसेी में तैयार हो रहा 36 क्विंटल काढ़ा, कोरोना वारियर्स को जल्द होगा वितरित
वैश्विक महामारी कोरोना वायरस (कोविड-19) के बीच सरकार ने रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के लिए हमारी प्राचीन चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद को प्रमुखता से शामिल किया है। इस जानलेवा महामारी के बीच फ्रंट लाइन पर लड़ रहे कोरोना वारियर्स के साथ-साथ आम लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के लिए सरकार ने प्रदेश आयुर्वेद विभाग के माध्यम से मधुयष्टियादि कषाय (काढ़ा)को लॉच किया है। बनफशा, मीठी सौंफ, मुनक्का, दालचीनी, गुलाब और मधुयष्टि जैसी कई जड़ी-बूटियां से तैयार होना वाला यह काढ़ा इम्युनोबूस्टर के तौर पर काम करता है। यह काढ़ा खांसी, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, बुखार, गले के संक्रमण एवं श्वसन संबंधी विभिन्न बीमारियों के इलाज में भी सहायक होता है। मुख्य मंत्री जय राम ठाकुर ने 1 मई को शिमला से मधुयष्टियादि कषाय (काढ़ा) को लांच किया है तथा अब जल्द ही यह लोगों तक पहुंच जाएगा।
मंडी जिला के जोगिन्दर नगर स्थित राजकीय आयुर्वेदिक फॉर्मेसी में मधुयष्टियादि काढ़े को तैयार किया जा रहा है। पहले चरण में सरकार ने विभाग को 36 क्विंटल काढ़ा तैयार करने को कहा है। इस काढ़े को तैयार करने से लेकर इसकी पैकेजिंग तक आयुर्वेदिक फॉर्मेसी जोगिन्दर नगर में गत 22 अप्रैल से लगभग 45 कर्मचारी प्रतिदिन 12 घंटे काम कर इसे तैयार करने में जुटे हुए हैं। 36 क्विंटल काढ़े के निर्मित लगभग 75 ग्राम भार वाले 45 हजार पैकेट तैयार किये जा रहे हैं। पहले चरण में प्रदेश भर में कोरोना महामारी से फ्रंट लाइन पर लड़ रहे स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग, आयुर्वेद विभाग, पुलिस, मीडिया, जन सम्पर्क व सफाई कर्मियों सहित अन्य लोगों को इसे उपलब्ध करवाया जाएगा ताकि उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाया जा सके।
कैसे करें काढ़े का उपयोग
75 ग्राम पैक में से 1-2 चम्मच काढ़ा एक बर्तन में डाल लें तथा उसमें 200 मिलीमीटर पानी को शामिल करें। अब इस काढ़े को हल्की आंच पर एक चौथाई शेष रहने तक उबालें। उबालने के बाद तरल को एक गिलास में छान लें तथा स्वादानुसार इसमें गुड़, शहद या नींबू रस को मिलाया जा सकता है। इसको पीने से पहले अच्छी तरह से हिला लें ताकि काढ़ा अच्छी तरह से घुल जाए। काढ़े को प्रतिदिन सुबह व शाम खाली पेट सेवन करने से स्वास्थ्य अच्छा रहता है तथा हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। इसके नियमित सेवन करने से व्यक्ति का खांसी, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, बुखार, गले के संक्रमण एवं श्वसन संबंधी विभिन्न बीमारियों से बचाव होता है।
किन-किन घटक द्रव्यों से बना है मधुयष्टियादि कषाय (काढ़ा)
मधुयष्टियादि कषाय (काढ़ा) 10 आयुर्वेदिक औषधीय घटक द्रव्यों से बना है। जिनमें दालचीनी, मधुयष्टि, बनफशा, सौंफ, मुनक्का, गोजिहा, श्लेष्मातक, गुलाब पुष्प, रेशा खात्मी व बदर का एक-एक भाग शामिल होता है।
क्या कहते हैं अधिकारी
उप निदेशक आयुर्वेद विभाग मंडी जोन डॉ. तेजस्वी विजय आजाद से बातचीत की तो उनका कहना है कि जोगिन्दर नगर आयुर्वेदिक फॉर्मेसी में सरकारी आदेशों के तहत 36 क्विंटल मधुयष्टियादि कषाय (काढ़ा) के 75 ग्राम भार वाले 45 हजार पैकेट तैयार किये जा रहे हैं। इन तैयार पैकेट को जल्द ही जिलों को भेज दिया जाएगा ताकि कोरोना वारियर्स को इन्हे वितरित किया जा सके। इन पैकेट को तैयार करने में लगभग 45 कर्मचारी 22 अप्रैल से प्रतिदिन 12 घंटे कार्य करते हुए जुटे हैं। उन्होने बताया कि लोग स्वयं भी घर में तुलसी, दालचीनी, काली मिर्च तथा सौंफ को मिलाकर काढ़ा तैयार कर सकते हैं। इसके अलावा प्रतिदिन प्राणायाम व योग को भी अपनी दिनचर्या में शामिल करने का आहवान किया है जिससे भी व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है।

Wednesday, 18 March 2020

आयुर्वेद में स्टार्ट अप को आयुर्वेद अुनसंधान संस्थान जोगिन्दर नगर में इन्क्युबेशन सैंटर स्थापित

आयुर्वेद क्षेत्र में नवोन्मेषी विचार को बतौर उद्यम विकसित करने में पांच युवा कार्यरत (मुख्य मंत्री स्टार्ट अप योजना)

मुख्य मंत्री स्टार्ट अप योजना के अंतर्गत हिमाचल प्रदेश आयुर्वेद विभाग के जोगिन्दर नगर स्थित आयुर्वेद अनुसंधान संस्थान ने जड़ी बूटियों व आयुर्वेद क्षेत्र में बतौर इन्क्युबेशन सैंटर कार्य करना प्रारंभ कर दिया है। आयुर्वेद एवं जड़ी बूटियों के क्षेत्र में स्टार्ट अप को मदद करने की दिशा में यह संस्थान देश का पहला इन्क्यूबेशन केंद्र बन गया है। वर्तमान में सीएम स्टार्ट अप योजना के तहत नवोन्मेषी विचार को बतौर उद्यम विकसित करने की दिशा में प्रदेश भर के पांच युवा कार्य कर रहे हैं। इस शोध केंद्र के सहयोग से प्रदेश में आयुर्वेद क्षेत्र में स्टार्ट अप के माध्यम से उद्यम स्थापना को लेकर जल्द ही बेहतर परिणाम सामने आने वाले हैं।
प्रदेश के युवाओं, किसानों और उद्यमियों को जड़ी-बूटियों तथा आयुर्वेद क्षेत्र में उद्योग स्थापना की दिशा में स्टार्ट अप प्रदान करने को प्रदेश उद्योग विभाग के साथ मुख्य मंत्री स्टार्टअप योजना के तहत यह इन्क्यूबेशन सैंटर स्थापित किया गया है। इस संस्थान की अनुसंधान संबंधी सुविधाओं का लाभ उठाकर प्रदेश भर से आयुर्वेद क्षेत्र में स्टार्ट अप को चयनित युवा अपने नवीन व नवोन्मेषी विचारों पर गहन अध्ययन व शोध करअपना उद्यम स्थापित कर सकेगें। अब तक प्रदेश भर से जड़ी बूटियों एवं आयुर्वेद में नवोन्मेषी विचार वाले पांच युवाओं को प्रदेश उद्योग विभाग द्वारा चयनित कर यहां भेजा है। जिन्होने अपने नवोन्मेषी विचार को स्टार्ट अप देने की दिशा में शोध कार्य भी प्रारंभ कर दिया है।
मुख्य मंत्री स्टार्ट अप योजना के तहत इस संस्थान में सोलन के कमलेश अर्श रोग पर अपने खानदानी ईलाज से उत्पाद बनाने, हमीरपुर के राजेश हर्बल वाशिंग पाऊडर बनाने, अमित जड़ी-बूटियों से पोषक पदार्थ बनाने, चंबा के रियाज हर्बल वाइन तथा ताबो गोम्पा से सोवा रिग्पा हर्बल आहार बनाने संबंधी अपने नवीन विचारों पर शोध कार्य कर रहे हैं। आयुर्वेद व जड़ी बूटियों के क्षेत्र में नवीन विचार के साथ कार्यरत इन पांचों युवाओं द्वारा तैयार उत्पाद जल्द ही उद्यम के तौर पर स्थापित होंगे। इससे न केवल प्रदेश व देश के लोगों को आयुर्वेद व जड़ी बूटियों से तैयार प्राकृतिक व स्वास्थ्यवर्धक उत्पाद उपलब्ध होंगे बल्कि इस क्षेत्र में प्रयासरत इन युवाओं को स्वावलंबी व आत्मनिर्भर बनने के साथ-साथ बतौर उद्यमी स्थापित होने का भी अवसर मिलेगा। हिमाचल प्रदेश में आयुर्वेद व जड़ी बूटियों के क्षेत्र में स्टार्ट अप के माध्यम से उद्यमशीलता विकसित करने की अपार संभावनाएं मौजूद हैं जो प्रदेश के युवाओं के लिए स्वरोजगार प्रदान करने में अहम कड़ी साबित हो सकता है।
क्या कहते हैं अधिकारी:
इस संबंध में क्षेत्रीय निदेशक, क्षेत्रीय एवं सुगमता केंद्र उत्तर भारत स्थित जोगिन्दर नगर डॉ. अरूण चंदन का कहना है कि आयुर्वेद क्षेत्र में स्टार्ट अप को मदद करने की दिशा में आयुर्वेद अनुसंधान संस्थान जोगिन्दर नगर देश का पहला इन्क्यूबेशन केंद्र बन गया है। मुख्य मंत्री स्टार्ट अप योजना के माध्यम से यहां पर पांच युवा अपने नवोन्मेषी विचार को लेकर शोध कार्य कर रहे हैं जिन्हे संस्थान हर संभव मदद प्रदान कर रहा है।
उनका कहना है कि संस्थान ने 2500 वर्ग फीट का क्षेत्र नवोन्मेषी विचार को लेकर शोध कार्य करने व बैठने के लिए उपलब्ध करवाया है। इसके अलावा संस्थान शोध को लेकर प्रयोगशाला, संकाय इत्यादि के तौर पर भी मदद कर रहा है। अपने नवीन विचार को लेकर यहां कार्यरत कमलेश को उत्तराखंड के ऋषिकेश में गत 1 से 7 मार्च तक आयोजित अंतर्राष्ट्रीय शोध उत्सव में भी भेजा गया जहां पर प्राकृतिक भोजन एवं औषधीय पौधों को लेकर प्रदर्शनी लगाई गई थी। इसी तरह अन्य नवीन विचार को लेकर स्टार्ट अप से जुड़े युवाओं की भी यह संस्थान मदद कर रहा है।
क्या है मुख्य मंत्री स्टार्ट अप योजना:
मुख्य मंत्री स्टार्ट अप योजना के अंतर्गत चयनित युवा व किसान के नमोन्वेषी विचार को बतौर उद्यम विकसित करने तथा शोध कार्य के लिए सरकार प्रतिमाह 25 हजार रूपये की एक वर्ष तक छात्रवृति प्रदान करती है। साथ ही नवीन विचार को लेकर इन्क्यूबेशन सैंटर में उपलब्ध आधारभूत ढांचे की सुविधा को भी नि:शुल्क मुहैया करवाया जाता है। इसके अलावा तैयार उत्पाद के पंजीकरण से लेकर पेटेंट करवाने तक की भी मदद की जाती है।
सीएम स्टार्ट अप योजना के तहत प्रदेश सरकार ने आयुर्वेद अनुसंधान संस्थान जोगिन्दर नगर के अलावा आईआईटी मंडी, एनआईटी हमीरपुर, हिमाचल प्रदेश विश्व विद्यालय शिमला, चितकारा विश्वविद्यालय सोलन, कृषि विश्व विद्यालय पालमपुर, उद्यानिकी एवं बागवानी विश्वविद्यालय नौणी सोलन, जेपी विश्वविद्यालय वाकनाघाट सोलन, हिमालय जैवसंपदा प्रौद्योगिकी संस्थान, पालमपुर तथा हिमाचल प्रदेश विज्ञान, प्रौद्योगिकी और पर्यावरण परिषद् शिमला को भी इन्क्यूबेशन सैंटर के तौर पर स्थापित किया है ताकि युवा अपने नवीन विचारों को इन इन्क्यूवेशन सैंटर के सहयोग से उद्यम में बदल सकें।
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Friday, 6 March 2020

अटल टिंकरिंग लैब से स्कूली बच्चों व युवाओं के नवोन्मेषी विचारों को मिल रही नई दिशा

एटीएल के कारण चौंतड़ा स्कूल के बच्चों द्वारा तैयार मॉडल प्रदेश व राष्ट्रीय स्तर पर सराहे
देश में स्कूली बच्चों के साथ-साथ युवाओं के नवोन्मेषी विचारों को मंजिल तक पहुंचाने तथा रचनात्मक विचार को विकसित करने में सरकार द्वारा स्थापित अटल टिंकरिंग लैब अहम भूमिका निभा रही है।

इसी अटल टिंकरिंग लैब का कमाल है कि आज मंडी जिला के चौंतड़ा स्थित राजकीय आदर्श वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला के बच्चों द्वारा तैयार चार मॉडल जिनमें स्मार्ट मेडिसन बॉक्स, स्मार्ट ई-डस्टबिन, स्मार्ट इरिगेशन तथा स्मार्ट पंपिंग सिस्टम शामिल है न केवल प्रदेश बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी खासे सराहे गए हैं। इसी लैब के माध्यम से तैयार किए गए स्मार्ट मेडिसन बॉक्स को जिला में दूसरा स्थान प्राप्त हो चुका है तो वहीं राज्य स्तर पर बेहतरीन भागीदारी दर्ज करवाई है। इसी तरह स्मार्ट ई-डस्टबिन को भी प्रदेश व राष्ट्रीय स्तर पर खूब सराहा गया है। स्कूल के टीजीटी नॉन मेडिकल अध्यापक एवं अटल टिंकरिंग लैब प्रभारी संदीप वर्मा ने बताया कि स्कूल की छात्राओं रीतिका, रश्मि तथा अंचला ठाकुर के माध्यम से स्मार्ट मेडिसन बॉक्स बनाने का आइडिया मिला।

स्कूल की एटीएल लैब के सहयोग से इस आइडिया को मूर्त रूप देने का प्रयास करते हुए स्मार्ट मेडिसन बॉक्स विकसित किया गया। इस मेडिसन बॉक्स में तीन अलग-अलग खाने बने हुए हैं जिनमें दवाई रखी जाती है। जैसे ही दवाई लेने का समय आता है तो अलार्म बज उठता है। इस मेडिसन बॉक्स का लाभ यह है कि जिन्हे दवाई लेने में भूल हो जाती है उनके लिए यह काफी लाभप्रद है। यह मेडिसन बॉक्स आकार में काफी छोटा है तथा इसे आसानी से कहीं भी ले जाया जा सकता है। इसे तैयार करने में औसतन 500-700 रूपये खर्चा आया है।
इसी तरह स्कूल की छात्रा अंचला ठाकुर के माध्यम से ही स्मार्ट ई-डस्टबिन विकसित करने का आइडिया मिला जिसे भी एटीएल के सहयोग से मूर्त रूप प्रदान किया गया। शहरी निकायों अब तो ग्राम पंचायतों में भी डस्टबिन स्थापित हो रहे हैं, लेकिन इनके खुला रहने के कारण न केवल सडऩ पैदा होती है बल्कि आवारा जानवर भी कचरे में घुसे रहते हैं। इस स्मार्ट ई-डस्टबिन में अल्ट्रासोनिक सेंसर लगा हुआ है। जैसे की कोई व्यक्ति इसके नजदीक जाता है तो यह स्वयं ही खुल जाता है। इसमें तीन बटन जिनमें लाल, हरा व नीला शामिल हैं लगे हुए हैं। लाल बटन जलने का मतलब डस्टबिन भरा, हरे का मतलब खाली तथा नीले का मतलब आधा भरा हुआ होता है। इस डस्टबिन की इंटरनेट के माध्यम से कहीं से भी निगरानी की जा सकती है।
 इसे बनाने में औसतन एक हजार रूपये तक का खर्चा आया है। यही नहीं बच्चों के माध्यम से समाज से आए अन्य रचनात्मक विचारों पर काम करते हुए एटीएल के सहयोग से स्मार्ट इरिगेशन व स्मार्ट पंपिंग सिस्टम को भी विकसित किया गया है, जिन्हे भी प्रदेश व राष्ट्रीय स्तर पर खूब सराहा गया है।वास्तव में अटल टिंकरिंग लैब का प्रमुख उद्देश्य स्कूली बच्चों के साथ-साथ समाज के अन्य लोगों को किताबी ज्ञान के बजाए प्रेक्टिकल ज्ञान के साथ-साथ नई तकनीकों से अवगत करवाकर समाज की विभिन्न समस्याओं को हल करते हुए जीवन को सुगम बनाना है। साथ ही समाज की समुचित भागीदारी नवोन्मेषी विचारों व रचनात्मकता को एटीएल के माध्यम से मूर्तरूप प्रदान करना है।
स्कूल के प्रधानाचार्य कल्याण सिंह ठाकुर का कहना है कि वर्ष 2018-19 के दौरान हिमाचल प्रदेश को 13 हजार स्कूलों की कड़ी राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के माध्यम से दो एटीएल लैब मिली जिनमें चौंतड़ा का सरकारी स्कूल प्रदेश का पहला स्कूल था। अटल टिंकरिंग लैब के संचालन को सरकार 20 लाख रूपये की मदद करती है जिसमें 10 लाख रूपये के विभिन्न इक्यूपमेंट तथा दो लाख रूपये वार्षिक अनुदान दिया जाता है।
उन्होने कहा कि अटल टिंकरिंग लैब का प्रमुख लक्ष्य बच्चों व युवाओं में वैज्ञानिक सोच को विकसित करना है। नीति आयोग ने अटल इनोवेशन मिशन के तहत पूरे देश भर में अटल टिंकरिंग लैब स्थापित करने का प्रयोग किया है। अटल टिंकरिंग लैब में थ्री-डी प्रिंटिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रोबोटिक्स के नए तकनीकों से रूबरू होने का मौका मिलता है। लैब में 6वीं कक्षा के ऊपर के विद्यार्थी, समाज के लोग शामिल होकर अपने नवोन्मेषी विचारों को मूर्तरूप प्रदान कर सकते हैं। यह लैब स्कूल समय के बाद सांय तीन बजे से कार्यरत रहती है।

Wednesday, 4 March 2020

मशरूम खेती से जुडक़र छत्र गांव के कशमीर सिंह आगे बढ़ा रहे हैं आजीविका

हिमाचल खुम्ब विकास योजना के तहत प्रदेश सरकार आर्थिक तौर पर कर रही है किसानों की मदद
जोगिन्दर नगर उप-मंडल के अंतर्गत ग्राम पंचायत मसौली के तहत गांव छत्र के 65 वर्षीय किसान कशमीर सिंह मशरूम की खेती से जुडक़र अपनी आजीविका को आगे बढ़ाने में कार्यरत हैं। बीपीएल परिवार में शामिल कशमीर सिंह दिहाड़ी मजदूरी करने के साथ-साथ पारंपरिक खेती-बाड़ी के माध्यम से अपने परिवार का भरण पोषण कर रहे हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से मशरूम की खेती से जुडक़र वे अपनी आजीविका को आगे बढ़ावा देने में प्रयासरत हैं।
जब इस संबंध में किसान कशमीर सिंह से बातचीत की तो उनका कहना है कि पारंपरिक खेती-बाड़ी के साथ-साथ वे मेलों इत्यादि में घर में ही तैयार की जाने वाली आइसक्रीम को बेचकर अपनी आजीविका को चलाने का प्रयास करते हैं। लेकिन वर्ष 1990-91 के दौरान उन्होने मशरूम उत्पादन से जुडक़र आजीविका को बढ़ावा देने का प्रयास किया तथा इस दिशा में कुछ हद तक वे कामयाब भी हुए हैं। उनका कहना है कि घर के ही एक कमरे में वे मौसमी तौर पर मशरूम का उत्पादन करते हैं। मौसमी मशरूम का उत्पादन तीन से चार माह तक ही चलता है इस दौरान वे लगभग 18 से 20 हजार रूपये तक की अतिरिक्त आमदनी कमा लेते हैं।
बुढ़ापे की दहलीज पर खड़े कशमीर सिंह का कहना है कि मंहगाई भरे इस दौर में 6 सदस्यों वाले परिवार का भरण पोषण करना किसी चुनौती से कम नहीं है, बावजूद इसके उन्होने सोलन से एक सप्ताह का मशरूम खेती को लेकर प्रशिक्षण प्राप्त किया तथा घर के एक कमरे में ही इसका उत्पादन शुरू कर दिया। उन्होने बताया कि वर्तमान में उन्होने 75 बैग मशरूम के लाए हैं जिनमें से प्रत्येक बैग से औसतन तीन से पांच किलोग्राम तक का उत्पादन हो जाता है। मार्केटिंग पर जानना चाहा तो वे कहते हैं कि वे स्वयं ही थैला भरकर मशरूम के पैकेट को जोगिन्दर नगर शहर व आसपास के गांवों में बेचते हैं तथा 100 से 125 रूपये प्रति किलोग्राम की दर से दाम प्राप्त हो जाते हैं। उनका कहना है कि वे इस इकाई को बड़ी इकाई में परिवर्तित करना चाहते हैं लेकिन जमीन के साथ-साथ आर्थिक संसाधनों की कमी आड़े आ रही है।
जब सरकार की अन्य योजनाओं बारे जानना चाहा तो उनका कहना है कि उन्हे सरकार की ओर से प्रतिमाह सामाजिक सुरक्षा पेंशन भी प्राप्त हो रही है। इसके अलावा मकान बनाने के लिए मामला संबंधित विभाग को भी प्रस्तुत किया है ताकि बढ़ते परिवार की जरूरतों को भी पूरा किया जा सके।
क्या कहते हैं अधिकारी
उद्यान विकास अधिकारी चौंतड़ा नवीन कुमार का कहना है कि हिमाचल खुम्ब विकास योजना के तहत सरकार जहां बड़ा मशरूम घर बनाने को 50 हजार रूपये तो वहीं छोटा मशरूम शैड बनाने को 25 हजार रूपये तक की आर्थिक मदद प्रदान कर रही है। साथ ही मशरूम प्रोडक्शन युनिट स्थापना को कुल लागत का 40 प्रतिशत यानि की आठ लाख रूपये तक की भी आर्थिक सहायता दी जा रही है। इसके अलावा पांच दिन तक के प्रशिक्षण हेतु एक हजार रूपये प्रतिदिन प्रति किसान तथा देश के अंदर एक्सपोजर विजिट पर जाने वाले किसानों का सारा खर्चा भी सरकार वहन करती है। साथ ही खाद तथा स्पॉन बनाने की इकाई स्थापना को लेकर भी सरकार कुल लागत का 40 प्रतिशत प्रदान कर रही है। उन्होने किसानों विशेषकर शिक्षित बेरोजगार युवाओं से सरकार की हिमाचल खुम्ब विकास योजना का लाभ उठाकर स्वरोजगार के माध्यम से स्वावलंबी बनने का आहवान किया है।




Thursday, 20 February 2020

मुख्य मंत्री रोशनी योजना के तहत चौंतड़ा के रवि कुमार,विशन दास व लाल सिंह के घर हुए रोशन

मुख्य मंत्री रोशनी योजना के अंतर्गत सरकार पात्र परिवारों को दे रही है  बिजली कनेक्शन सुविधा
मंडी जिला के जोगिन्दर नगर विधानसभा क्षेत्र के चौंतड़ा विकास खंड के अंतर्गत ग्राम पंचायत बदेहड़ के बदेहड़ निवासी प्रीतम चंद, ग्राम पंचायत तलकेहड़ निवासी राज कुमार, ग्राम पंचायत सगनेहड़ निवासी रवि कुमार, ढेलु पंचायत निवासी विशन दास, लाल सिंह, सैंथल निवासी राम लाल इत्यादि के घरों में प्रदेश सरकार की मुख्य मंत्री रोशनी योजना उजाला लेकर आई है। इस योजना के माध्यम से न केवल इन परिवारों के घरों में बिजली का उजाला हुआ है बल्कि मुफत में बिजली का कनेक्शन पाकर ये परिवार बेहद खुश भी हैं।
जब इस बारे चौंतड़ा विकास खंड की ग्राम पंचायत ढेलु निवासी लाल सिंह से बातचीत की तो उनका कहना है कि प्रदेश सरकार ने उनके जैसे बीपीएल परिवारों के लिए मुफत में बिजली का कनेक्शन प्रदान कर मंहगाई के इस दौर में बड़ी राहत प्रदान की है। बीमारी के कारण 75 प्रतिशत तक अक्षम हो चुके 60 वर्षीय लाल सिंह का कहना है कि मुख्य मंत्री रोशनी योजना के तहत आज उनके घर में ही नहीं बल्कि जिंदगी में भी उजाला हुआ है जिसके लिए वे मुख्य मंत्री जय राम ठाकुर व प्रदेश सरकार का आभार व्यक्त करते हैं। उन्होने बताया कि दिव्यांगता के चलते वे बिस्तर पर पड़े-पड़े टीवी देखते रहते हैं। जब टीवी के माध्यम से सरकार की इस योजना का पता चला तो उन्होने अपने नजदीकी बिजली बोर्ड कार्यालय में आवश्यक दस्तावेजों के साथ आवेदन जमा कर दिया तथा दिसम्बर, 2019 में उनके घर बिना एक रूपया चुकाये बिजली का कनेक्शन लग गया है। जब इसी बारे इसी गांव के विशन दास के परिजनों से बातचीत की तो उनका भी कहना है कि सरकार की इस तरह की ये योजनाएं उनके जैसे गरीब परिवारों के लिए फायदेमंद साबित होती है। सरकार का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इस योजना के माध्यम से आज प्रदेश में उनके जैसे लाखों गरीब परिवारों के घरों में बिना एक रूपया खर्च किये बिजली का मीटर लगने से उजाला होने जा रहा है।
बिजली का नया कनेक्शन प्राप्त करने के लिए उपभोक्ता को औसतन तीन से चार हजार रूपये तक का खर्च वहन करना पड़ता है। ऐसे में हिमाचल सरकार मुख्य मंत्री रोशनी योजना के माध्यम से प्रदेश के हजारों बीपीएल परिवारों को मुफत में बिजली कनेक्शन प्रदान कर लाभान्वित कर रही है।
क्या है मुख्य मंत्री रोशनी योजना:
हिमाचल सरकार ने वित्तीय बजट 2019-20 में प्रदेश के गरीब परिवारों को मुफत में बिजली कनेक्शन उपलब्ध करवाने के लिए इस योजना की घोषणा की थी। जिसके तहत पूरे प्रदेश भर में 17 हजार 550 गरीब पात्र परिवारों को मुफत में बिजली कनेक्शन प्रदान करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए चालू वित्त वर्ष के लिए बजट में 13 करोड़ 16 लाख रूपये का भी प्रावधान किया है। मंडी जिला की बात करें तो इस योजना के माध्यम से 1.20 करोड़ रूपये व्यय कर 1600 पात्र परिवारों को मुफत में बिजली कनेक्शन की सुविधा दी जानी है। 
क्या हैं पात्रता की शर्तें:
इस योजना का लाभ प्राप्त करने के लिए सरकार ने कुछ शर्तें निर्धारित की हैं जिन में से किसी एक का होना अनिवार्य है। जिनमें सभी स्त्रोतों से परिवार की वार्षिक आय 35 हजार रूपये से अधिक नहीं होनी चाहिए। घर का बिजली लोड दो किलोवाट से कम होना चाहिए। परिवार का चयन बीपीएल परिवारों की सूची में होना चाहिए। परिवार अंत्योदय अन्न योजना के तहत आना चाहिए तथा परिवार का चयन प्राथमिकता वाले परिवार की सूची में शामिल हो।
क्या कहते हैं अधिकारी:
वरिष्ठ अधिशाषी अभियन्ता विद्युत मंडल जोगिन्दर नगर अनिल शर्मा का कहना है कि मुख्य मंत्री रोशनी योजना के तहत जोगिन्दर नगर मंडल के सभी सातों विद्युत उप-मंडलों में भी पात्र परिवारों को फ्री में बिजली कनेक्शन लगाए जा रहे हैं। उन्होने बताया कि चालू वित्तीय वर्ष में अकेले जोगिन्दर नगर विद्युत मंडल में ही 26.25 लाख रूपये व्यय कर कुल 350 पात्र परिवारों को फ्री में विद्युत कनेक्शन प्रदान करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। उन्होने अधिक से अधिक पात्र परिवारों से इस योजना का लाभ उठाने का आग्रह किया है। 


Thursday, 6 February 2020

पीएमजीएसवाई के तहत जोगिन्दर विस क्षेत्र को 98 करोड़ की परियोजनाएं स्वीकृत


गत पांच वर्षों में सडक़ सुविधाओं से जुड़े कई गांवो, बेहतर व आसान हुआ आवागमन
जोगिन्दर नगर विधान सभा क्षेत्र में गत पांच वर्षों के दौरान प्रधान मंत्री ग्राम सडक़ योजना (पीएमजीएसवाई) के माध्यम से लगभग 98 करोड़ रूपये की विभिन्न सडक़ परियोजनाओं को स्वीकृति प्राप्त हुई है। जोगिन्दर नगर क्षेत्र में इन विभिन्न सडक़ परियोजनाओं के कारण जहां कई गांवों सडक़ सुविधाओं से जुड़े हैं तो वहीं लोगों का आवागमन पहले से बेहतर व आसान भी हुआ है। सडक़ें किसी भी क्षेत्र के विकास का मूल आधार होती हैं। गांवों में सडक़ उपलब्ध होने से लोगों को आवागमन की सुविधा तो होती ही है बल्कि इससे क्षेत्र की आर्थिकी को भी बल मिलता है। सडक़ सुविधा का सबसे बड़ा लाभ किसान को होता है। किसान द्वारा तैयार नकदी फसलों, दूध इत्यादि को बाजार तक ले जाने में सुगमता होती है तथा इससे समय की भी बचत होती है।
जोगिन्दर नगर विस क्षेत्र की बात करें तो गत पांच वर्षों के दौरान पीएमजीएसवाई के तहत लगभग 98 करोड़ रूपये की कुल 23 सडक़ परियोजनाओं को स्वीकृति प्राप्त हुई है जिनमें से कई परियोजनाओं का कार्य भी पूर्ण कर लिया गया है। वर्ष 2016-17 के दौरान कुल 9 सडक़ परियोजनाएं जिनमें अढ़ाई करोड़ रूपये की ढ़ेलु हार-टिकरू सडक़, सवा दो करोड़ रूपये की घट्टा-बाग सडक़ चरण-दो, अढ़ाई करोड़ की नौहली ऊपरली से अंदरालू ऊपरला चरण-दो, पौने दो करोड़ रूपये की बलोटू-गवैला सडक़, दो करोड़ रूपये की सांडा-माकनवाल सडक़, अढ़ाई करोड़ की गियुणी-परैण सडक़, साढ़े तीन करोड़ रूपये की भरड़ौण-गंगोटी सडक़, साढ़े पंाच करोड़ रूपये की मच्छयाल-बटाड़ी ब्यूंह सडक़ का सुधारीकरण तथा लगभग पौने दो करोड़ रूपये की कुंडुनी-भलयांदरा सडक़ शामिल है। इनमें कुंडुनी-भलयांदरा सडक़ को छोडक़र बाकी का निर्माण कार्य पूर्ण कर लिया गया है।
इसी तरह वर्ष 2017-18 के दौरान कुल 11 सडक़ परियोजनाओं को स्वीकृति प्राप्त हुई है जिनमें अढ़ाई करोड़ रूपये की खद्दर-बडान सडक़, डेढ़ करोड़ रूपये की गदयाड़ा-ठारा सडक़ का सुधारीकरण, पौने सात करोड़ रूपये की गलू-भटवाड़ सडक़, सवा 12 करोड़ रूपये की भराडू-बनाडू डोम सडक़, लगभग अढ़ाई करोड़ रूपये की कस-पथोलू सडक़ का सुधारीकरण, लगभग सवा चार करोड़ रूपये की गुम्मा-खारसा सडक़, सवा एक करोड़ रूपये की शानन-आरठी सडक़, एक करोड़ रूपये की पेटू नाला से गडूही सडक़, अढ़ाई करोड़ रूपये की बालकरूपी-दारट बगला सडक़, 57 लाख रूपये की चौंतड़ा से टिकरी मुशैहरा सडक़ का सुधारीकरण तथा पौने पांच करोड़ रूपये की द्रुबल-बनवाड़ सडक़ का कार्य शामिल है।
वर्ष 2018-19 की बात करें तो इस क्षेत्र को कुल 8 सडक़ परियोजनाओं को मंजूरी प्राप्त हुई जिनमें एक करोड़ रूपये की चल्हाणू-सौं सडक़, लगभग सात करोड़ रूपयेे की बडौन-पीपली सडक़, लगभग अढ़ाई करोड़ रूपये की चक्का-झमेहड़ सडक़, पौने दो करोड़ रूपये की भडयाड़ा-धनयातर सडक़, डेढ़ करोड़ रूपये की भटेड़-त्रामट सडक़, 88 लाख रूपये की चौंतड़ा-पस्सल सडक़ का सुधारीकरण तथा एक करोड़ रूपये की मकरीड़ी-खिल्ल-छतरी व सवा दो करोड़ रूपये की सुजा-भजराला सडक़ का निर्माण कार्य शामिल है।
क्या कहते हैं सांसद:
मंडी लोकसभा क्षेत्र से सांसद राम स्वरूप शर्मा का कहना है कि प्रधान मंत्री ग्राम सडक़ योजना के तहत अकेले जोगिन्दर नगर विस क्षेत्र को गत पांच वर्षों के दौरान लगभग 98 करोड़ रूपये की सडक़ परियोजनाओं को मंजूर करवाया है। उन्होने बताया कि चालू वित्तीय वर्ष में लगभग 16 करोड़ रूपये की दो नई सडक़ परियोजनाओं को स्वीकृति प्राप्त हुई है जिनमें लगभग 13 करोड़ रूपये की ढेलू-भटेहड़ तथा तीन करोड़ रूपये की आहजू-सूजा सडक़ शामिल है। उन्होने कहा कि सभी औपचारिकताएं पूर्ण होते ही इनका भी निर्माण कार्य जल्द प्रारंभ होगा। इसके अतिरिक्त जोगिन्दर नगर-सरकाघाट-घुमारवीं मुख्य सडक़ पर मच्छयाल में लगभग साढ़े पांच करोड़ रूपये की लागत से 40 मीटर स्पैन पुल का निर्माण कार्य भी जारी है।
क्या कहते हैं विधायक:
जोगिन्दर नगर के विधायक प्रकाश राणा का कहना है कि मुख्य मंत्री जय राम ठाकुर के आशीर्वाद तथा सांसद राम स्वरूप शर्मा के सहयोग से इस क्षेत्र के विकास में कोई कमी नहीं रखी जा रही है। उनका कहना है कि चालू वित्तीय वर्ष के दौरान सरकार ने जोगिन्दर नगर विस क्षेत्र की लगभग 35 कि.मी. सडक़ों के रखरखाव को लगभग पांच करोड़ रूपये स्वीकृत किये हैं। इसके अलावा लगभग साढ़े 15 कि.मी. अतिरिक्त सडक़ों के रखरखाव को लगभग पौने दो करोड़ रूपये से अधिक की धनराशि भी जारी की है। साथ ही कहा कि नाबार्ड के माध्यम से जोगिन्दर नगर विस क्षेत्र को 22 करोड़ रूपये की लागत वाली पांच सडक़ परियोजनाओं को भी स्वीकृति प्राप्त हुई है।


Thursday, 30 January 2020

अपने खेतों में सर्पगंधा की खेती अपनाएं, 18 माह में ही करें चोखी कमाई


तीन वर्ष में प्रति एकड़ अढ़ाई लाख रूपये तक की हो सकती है आय, सरकार दे रही है वित्तीय मदद
हिमाचल प्रदेश के भौगोलिक दृष्टि से निचले क्षेत्रों में रहने वाले किसान अपने खेतों में बेशकीमती सर्पगंधा की खेती अपनाकर महज 18 माह में ही प्रति एकड़ अढ़ाई लाख रूपये तक की आय अर्जित कर सकते हैं। जलवायु की दृष्टि से हिमाचल प्रदेश के समुद्रतल से 1800 मीटर से कम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सर्पगंधा की औषधीय खेती को किसानों द्वारा आसानी से किया जा सकता है। खास बात यह है कि सर्पगंधा के पौधों की नर्सरी प्रदेश में ही तैयार की गई है तथा किसान सर्पगंधा की खेती से जुडऩे के लिए प्रदेश में ही सर्पगंधा के पौधे भी प्राप्त कर सकते हैं।
जड़ के रूप में प्रदेश की जलवायु के आधार पर यह पौधा निचले हिमाचल प्रदेश में आसानी से उगाया जा सकता है। एक से सवा एक किलोग्राम बीज प्रति एकड़ भूमि के लिए पर्याप्त होता है। इसकी रोपाई छायादार क्षेत्रों में मार्च-अप्रैल व खुली धूप वाले क्षेत्रों के लिए जुलाई-अक्तूबर माह के दौरान की जा सकती है। इस पौधे को 40-40 सेंटीमीटर की दूरी पर प्रत्यारोपित किया जा सकता है। सर्पगंधा की फसल बीज के माध्यम से 3 से 4 वर्ष और कलम के माध्यम से 2 से 3 वर्ष में तैयार हो जाती है। प्रति एकड़ इसकी उपज 300 किलोग्राम तक रहती है तथा नौ सौ रूपये प्रति किलोग्राम की दर से 2 लाख 70 हजार रूपये तक की आय अर्जित की जा सकती है।
क्या है सर्पगंधा औषधि
सर्पगंधा एक अत्यंत उपयोगी पौधा है जो 75 सेंटीमीटर से लेकर एक मीटर तक की ऊंचाई तक बढ़ता है। इसकी जड़ें 0.5 सेंटीमीटर से 2.5 सेंटीमीटर व्यास तक जबकि इसकी गहराई 40 से 60 सेंटीमीटर तक जमीन में जाती है। सर्पगंधा पर अप्रैल से नवम्बर माह तक लाल सफेद फूल गुच्छों में लगते हैं। इसके अलावा इसकी जड़ों में भी अनेक एल्कलाइड्स पाए जाते हैं जिनका उपयोग विभिन्न बीमारियों के उपचार में किया जाता है।
सर्पगंधा की खेती व फसल प्रबंधन
सर्पगंधा की खेती के लिए मई माह के दौरान खेत की गहरी जुताई कर लें तथा खेत को कुछ समय के लिए खाली छोड़ दें। इसके बाद पहली वर्षा होने पर खेत की जुताई करें तथा नाप की क्यारियां व पानी देने के लिए नालियां बना लें। सर्पगंधा को बीज, जड़ या कटिंग के माध्यम से उगाया जा सकता है। साथ ही करीब 25 टन कम्पोस्ट खाद प्रति हेक्टेयर से अच्छी उपज प्राप्त की जा सकती है तथा वर्षा के दौरान कम पानी एवं गर्मियों में 30 दिन के अंतर से पानी लगाना चाहिए।
सर्पगंधा की फसल 18 माह में तैयार हो जाती है। इसकी जड़ों को सावधानी पूर्वक खोदकर निकालें तथा बड़ी व मोटी जड़ों को अलग और पतली जड़ों को अलग-अलग कर लें। इसके उपरान्त 12 से 15 सेंटीमीटर के टुकड़े काटकर सुखा लें और इन्हे पॉलिथीन की थैलियों में सुरक्षित रख लें। सर्पगंधा की बढ़ती मांग को देखते हुए नेशनल मेडिसनल प्लांट बोर्ड की ओर से इसके कृषिकरण पर बल दिया जा रहा है।
क्या कहते हैं अधिकारी
क्षेत्रीय निदेशक, क्षेत्रीय एवं सुगमता केंद्र उत्तर भारत स्थित जोगिन्दर नगर डॉ. अरूण चंदन का कहना है कि सरकार राष्ट्रीय आयुष मिशन (एनएएम) के अंतर्गत राज्य औषधीय पादप बोर्ड के माध्यम से सर्पगंधा की खेती को प्रति हैक्टेयर 49 हजार 724 रूपये की वित्तीय सहायता प्रदान की जा रही है जो अधिकत्तम 20 हैक्टेयर के हिसाब से लगभग 9.94 लाख रूपये तक हो सकती है। उन्होने जलवायु की दृष्टि से हिमाचल प्रदेश के निचले क्षेत्रों के किसानों से व्यक्तिगत या सामूहिक तौर पर सर्पगंधा की औषधीय खेती अपनाने का आह्वान किया है ताकि उनकी आय का एक अतिरिक्त साधन सृजित किया जा सके। उन्होने कहा कि सर्पगंधा के पौधों की नर्सरी प्रदेश में ही तैयार की गई है तथा किसान सर्पगंधा की खेती से जुडऩे के लिए प्रदेश में ही सर्पगंधा के पौधे प्राप्त कर सकते हैं।
इस संबंध में अधिक जानकारी के लिए किसान अपने जिला के जिला आयुर्वेदिक अधिकारी या राज्य औषधीय पादप बोर्ड शिमला के कार्यालय से संपर्क कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त क्षेत्रीय एवं सुगमता केंद्र जोगिन्दर नगर या आयुर्वेद अनुसंधान संस्थान (आईएसएम) जोगिन्दर नगर जिला मंडी के कार्यालयों से भी संपर्क किया जा सकता है।
इसके अलावा वैबसाइट www.ayurveda.hp.gov.in से भी जानकारी प्राप्त की जा सकती है।