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Tuesday, 30 June 2020

फांउडेशन बीज तैयार कर किसानों को उपलब्ध करवाता है जोगिन्दर नगर बीज गुूणन फार्म

वर्ष 2019 मेें तैयार हुआ है 72 क्विंटल धान का बीज, लगभग 8 हैक्टेयर क्षेत्र में फैला है यह फार्म
मंडी जिला के जोगिन्दर नगर में कृषि विभाग के बीज गुणन फार्म में वर्ष 2019 में 72 क्विंटल धान का बीज तैयार हुआ है। इसके अलावा जहां लगभग साढ़े चार क्विंटल सोयाबीन बीज की भी पैदावार हुई है तो वहीं वर्तमान रबी फसल के दौरान लगभग 40-50 क्विंटल गेंहू का बीज भी तैयार हुआ है।
जोगिन्दर नगर स्थित कृषि विभाग का बीज गुणन फार्म न केवल किसानों को अच्छी किस्म का धान व गेहूं का बीज उपलब्ध करवा रहा है बल्कि देश में खाद्यान्न क्रांति लाने के साथ-साथ किसानों की आय को बढ़ाने में इसकी बहुत बड़ी भूमिका है। साथ ही कोरोना महामारी के दौर में जिस तरह लोगों का रूझान कृषि की ओर बढ़ा है निश्चित तौर पर इसकी अहमियत ओर भी बढ़ जाती है। ऐसे में यदि इसे कृषि शोध केंद्र के तौर पर विकसित करने की दिशा में प्रयास किये जाएं तो यह प्रदेश के साथ-साथ देश के किसानों के लिए एक बूस्टर का काम कर सकता है।
वर्ष 1962 में कृषि विभाग द्वारा स्थापित यह बीज गुणन फार्म 7.76 हैक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ है। जिसमें से 4.76 हैक्टेयर क्षेत्र में धान व गेंहूं बीज तैयार किया जाता है जबकि 3 हैक्टेयर क्षेत्र में सडक़ एवं अन्य भवन निर्माण कार्य हुआ है। वर्तमान में इस बीज गुणन फार्म में बीज की पैदावार से लेकर उसकी कटाई इत्यादि तक के विभिन्न कार्यों का मशीनीकरण किया गया है तथा विभिन्न तरह की आधुनिक मशीनों को यहां लाया गया है।
खरीफ 2019 की बात करें तो इस फार्म के 4.118 हैक्टेयर क्षेत्र में 160 किलोग्राम धान लगाया गया जिसमें से 72 क्विंटल बीज की पैदावार हुई है। इसके साथ ही 0.642 हैक्टेयर क्षेत्र में 80 किलोग्राम सोयाबीन का बीज लगाकर लगभग साढ़े चार क्विंटल बीज तैयार किया गया है। वर्तमान रबी फसल के दौरान गेहूं की बात करे तो फार्म की 4.76 हैक्टेयर भूमि पर 477 किलोग्राम बीज लगाकर इसके उत्पादन का आंकलन किया जा रहा है तथा इससे लगभग 40-50 क्विंटल बीज तैयार होने की संभावना है।
क्या है इस फार्म का मुख्य उद्देश्य:
इस फार्म का प्रमुख उद्देश्य प्रजनक (ब्रीडर सीड) बीज या अन्य अच्छा बीज को उगाकर आगे आधारबीज यानि कि फांउडेशन बीज को पैदा करना है। इस तैयार बीज को आगे किसानों का पंजीकरण करवाकर पंजीकृत किसानों को गुणन (मल्टीप्लिकेशन) के लिए दिया जाता है ताकि यह बीज ज्यादा से ज्यादा किसानों को उपलब्ध हो सके।
बीज गुणन प्रक्षेत्र (फार्म) एवं मशीनीकरण:
वर्तमान में आधुनिक कृषि तकनीकों का उपयोग इस फार्म में कृषि कार्यों के लिए किया जा रहा है। जिसमें ट्रैक्टर, कल्टीवेटर, रिपर, बाइन्डर, धान व गेहूं थ्रैसर प्रमुख हैं। इसके अलावा खेतों की मेढ़ों पर उन्नत किस्म की घास को भी लगाया जाता है, जिससे फार्म को एक अच्छी आय प्राप्त हो जाती है। साथ ही आवारा पशुओं से फसलों को बचाने के लिए सोलर फेंसिंग भी गई है।
इसके अतिरिक्त फार्म में एक पॉली टनल तथा 105 वर्गमीटर क्षेत्र में पॉलीहाउस भी लगाया गया है। इस पॉलीहाउस में शिमला मिर्च, टमाटर तथा बेंगन की खेती की जाती है। जबकि पॉली टनल में सब्जी की नर्सरी भी लगाई जाती है। इनसे फार्म को अतिरिक्त आय प्राप्त हो जाती है। कृषि फार्म में सिंचाई के लिए कूहलों का भी निर्माण किया गया है।
क्या कहते हैं अधिकारी:
विषयवाद विशेषज्ञ (एसएमएस) कृषि पधर पूर्ण चंद का कहना है कि जोगिन्दर नगर स्थित बीज गुणन फार्म में मुख्यत: धान व गेंहू के बीज की पैदावार की जाती है। तैयार बीज को कृषि विभाग के भंडारण केंद्र भंगरोटू भेजा जाता है, जहां पर बीज की ग्रेडिंग व पैकेजिंग कर इसे गुणन (मल्टीप्लिकेशन) के लिए पंजीकृत किसानों को आवंटित किया जाता है। तदोपरान्त किसानों द्वारा तैयार बीज को अन्य किसानों को भेजा जाता है ताकि बीज की मांग को पूरा किया जा सके।
फार्म को चलाने के लिए यहां पर एक कृषि विकास अधिकारी, एक कृषि प्रसार अधिकारी तथा एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी को तैनात किया गया है। वर्तमान में एडीओ का पद रिक्त चल रहा है। इसके अलावा फार्म में समय-समय पर फसलों की जरूरत अनुसार कैजुअल श्रमिकों की सेवाएं भी ली जाती है।

Wednesday, 24 June 2020

तुलसी उगाकर किसान प्रति एकड़ अर्जित करें 25 हजार रूपये तक की शुद्ध आए

आयुर्वेद, यूनानी, होम्योपैथी व एलोपैथी दवा निर्माण में तुलसी का होता है इस्तेेमाल
तुलसी की चर्चा शुरू होते ही हमारे सामने प्रत्येक घर के आंगन में उगने वाली तुलसी की तस्वीर सामने आ जाती है। तुलसी भारतीय संस्कृति का एक अहम हिस्सा भी है। धार्मिक आस्था की दृष्टि से घर में तुलसी का पौधा लगाने को न केवल शुभ माना जाता है बल्कि तुलसी की पूजा भी की जाती है। आखिर हो भी क्यों न? तुलसी महज एक पौधा ही नहीं है बल्कि कई औषधीय गुणों का खजाना भी है। घर आंगन में लगा तुलसी का पौधा न केवल विभिन्न कीड़ों व वैक्टीरिया को समाप्त करता है बल्कि हवा को भी शुद्ध बनाता है। ऐसे में यदि किसान तुलसी की खेती को बड़े पैमाने पर शुरू करते हैं तो इससे उन्हे आमदनी बढ़ाने का एक बेहतरीन विकल्प भी मिलेगा। 
हिमाचल प्रदेश की बात करें तो इसकी खेती को समुद्रतल से 900 मीटर ऊंचाई वाले उष्ण कटिबंधीय और उप-उष्ण कटिबंधीय जलवायु वाले क्षेत्र अनुकूल हैं। प्रदेश के मंडी, ऊना, बिलासपुर, सिरमौर, कांगड़ा और सोलन जिलों के निचले क्षेत्रों में इसे आसानी से उगाया जा सकता है। इसकी रोपाई के लिए प्रति एकड़ 80 से 120 ग्राम बीज पर्याप्त होता है। इसका बीज 8-12 दिनों में अंकुरित हो जाता है जबकि नर्सरी पौध 6 सप्ताह में रोपाई के लिए तैयार हो जाती है। पौधों को 40-40 या 40-50 सेंटीमीटर की दूरी पर प्रत्यारोपित करें। तुलसी की पहली फसल को 90-95 जबकि इसके बाद 65-75 दिनों के अंतराल में फसल को काटा जा सकता है। एक एकड़ भूमि से लगभग पांच क्विंटल सूखा पंचांग प्राप्त किया जा सकता है तथा औसतन 80 रूपये प्रति किलोग्राम की दर से 40 हजार रूपये तक की सकल जबकि 25 हजार रूपये तक की शुद्ध आय अर्जित की जा सकती है।
तुलसी एक खास औषधीय महत्व वाला पौधा है। इसके जड़, तना, पत्तियों समेत सभी भाग उपयोगी हैं। तुलसी का इस्तेमाल आयुर्वेदिक, यूनानी, होम्योपैथी व एलोपैथी दवा निर्माण में किया जाता है। इसकी पत्तियों में चमकीला वाष्पशील तेल पाया जाता है जो कीड़ों व वैक्टीरिया के खिलाफ काफी कारगर साबित होता है। तुलसी मुख्यत: तीन प्रकार जिसमें हरी, काली व नीली बैंगनी रंग शामिल है की पत्तियों वाली होती है। तुलसी एक झाड़ी के रूप मेें उगती है तथा इसका पौधा एक से तीन फुट तक ऊंचा होता है। पत्तियां एक से दो इंच लंबी सुगंधित और अंडाकार या आयताकार होती है। बीज चपटे पीतवर्ण के छोटे काले चिन्हों से युक्त अंडाकार होते हैं तथा इसका पौधा सामान्यता दो से तीन वर्ष तक हरा बना रहता है।
तुलसी की खेती सामान्य मिटटी में आसानी से की जा सकती है। इसके लिए गरम जलवायु बेहतर है। तुलसी की नर्सरी फरवरी माह में तैयार, अप्रैल माह में इसकी रोपाई शुरू कर सकते हैं। वास्तव में तुलसी मूलरूप से बरसात की फसल है जिसे गेहूं काटने के बाद लगाया जाता है। यह फसल लगभग 90 दिनों में तैयार हो जाती है तथा इसमें रोग और कीट बहुत ही कम लगते हैं।
क्या कहते हैं अधिकारी:
नेशनल मेडिसिनल प्लांट्स बोर्ड के क्षेत्रीय निदेशक उत्तर भारत स्थित जोगिन्दर नगर डॉ. अरूण चंदन का कहना है कि कोरोना संकट के बीच औषधीय पौधों एवं जड़ी बूटियों की मांग में एकाएक बढ़ौतरी दर्ज हुई है। इस क्षेत्र में स्वरोजगार की अपार संभावनाओं को देखते हुए युवा किसान इस ओर आगे बढ़ सकते हैं। सरकार राष्ट्रीय आयुष मिशन (एनएएम) योजना के तहत औषधीय पौधों की खेती को समुचित वित्तीय सहायता प्रदान कर रही है। उनका कहना है कि सरकार तुलसी की खेती के लिए प्रति हैक्टेयर लगभग 13 हजार रूपये तक की वित्तीय मदद प्रदान करती है। वित्तीय मदद एवं तुलसी की खेती से जुड़ी अन्य जरूरी शर्तों से संबंधित अधिक जानकारी के लिए कृषक निदेशक आयुर्वेद विभाग हिमाचल प्रदेश से संपर्क कर सकते हैं।

Sunday, 7 June 2020

वैश्विक महामारी कोविड-19 एवं भारतीय स्वदेशी विकास मॉडल

वैश्विक महामारी कोरोना वायरस (कोविड-19) से जर्जर परिस्थिति में देश की अर्थ व्यवस्था को दोबारा पटरी पर लाने के लिए प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने देश वासियों को संबोधित करते हुए 20 लाख करोड़ रूपये के एक बड़े आर्थिक पैकेज का ऐलान किया है। निश्चित तौर पर यह आर्थिक पैकेज न केवल हमारी अर्थ व्यवस्था के लिए एक बूस्टर का काम करेगा बल्कि कोरोना महामारी के कारण देश के विभिन्न क्षेत्रों की टूट चुकी कमर को भी सीधा करने में भी बड़ा सहायक सिद्ध होगा।
लेकिन इस आर्थिक पैकेज के बीच फिलवक्त कोरोना वायरस की बात करें तो महामारी से उपचार को लेकर अभी तक दवा व उपचार पद्धति दुनिया में किसी के पास उपलब्ध नहीं है। लेकिन इस दौरान भारत की हाइड्रॉक्सिक्लोरोक्विन जैसी दवा मांगने के लिए दुनिया भर के देश हमारे सामने हाथ जोड़े खड़े हैं। साथ ही आयुर्वेदिक काढ़े व जड़ी बूटियों आदि जिस से शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, की मांग भी लगातार बढ़ रही है। वैश्विक सामाजिक-आर्थिक संरचनाएं भी इस समय निर्रथक सिद्ध हो रही है, और भारत जैसे देश की ओर मुंह ताक रही हैं। ऐसी परिस्थिति में भारतीय प्रतिभा ने अपनी जिस लंबी सोच के आधार पर स्वदेशी प्रतिमान को कभी इस देश में खड़ा किया, कोरोना महामारी से लडख़ड़ाती दुनियां अब इस ओर बड़ी आशा से देख रही है। ऐसे में देश का आर्थिक पुनर्निर्माण कैसे हो यह एक विस्तृत चर्चा का न केवल विषय बन गया है बल्कि प्रत्येक भारतवासी को भी इस मुद्दे पर गंभीरता से मंथन करना होगा।
कोविड-19 की इस वैश्विक महामारी के कारण जहां देश में बड़े पैमाने पर विदेशों के साथ-साथ शहरों से ग्रामीण क्षेत्रों की ओर पलायन हुआ है। ऐसे में ग्रामीण क्षेत्रों में ही रोजगार के नए-नए अवसर सृजित करने की बड़े पैमाने पर जरूरत होगी। ऐसी परिस्थिति में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का ग्राम स्वराज, पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम आजाद का पूरा (PURA Provision of Urban Amenities in Rural Areas) तथा नानाजी देशमुख के समग्र विकास के मॉडल पर गंभीरता से मंथन करने की न केवल आवश्कता है बल्कि इन दृष्टिकोण को केन्द्रित रखकर लाखों कामगारों व कारीगरों को गांव में ही रोजगार उपलब्ध करवाने की दिशा में प्रयास करना होगा। साथ ही जो लोग काम की तलाश में पुन: शहरों की ओर रूख करेंगे उनके लिए किस प्रकार से नए काम धंधे पैदा कर सकते हैं इस दिशा में भी गंभीरता से आत्म मंथन करना होगा।
कोविड-19 महामारी के कारण भारत सहित पूरी दुनिया के उद्योगों को न केवल बड़ा झटका लगा है बल्कि वैश्विक स्तर पर मांग में भी कमी आ रही है। ऐसे परिस्थिति में देश के लाखों कामगारों को कार्य कौशलता के आधार पर रोजगार के नए अवसर सृजित करना एक बड़ी चुनौती रहेगी। जहां तक उद्योगों की बात है तो लंबे लॉकडाउन तथा बड़ी संख्या में श्रम शक्ति के पलायन के कारण उनकी वर्तमान स्थिति पर भी विपरीत प्रभाव पड़ा है। मुमकीन है कि अधिकतर उद्योग भारी घाटे के कारण श्रमिकों व कामगारों को उनकी क्षमता के आधार पर पुन: रोजगार उपलब्ध करवाने में सक्षम न हो। ऐसे में आपसी सदभाव व समन्वय पैदा कर उद्योगों व श्रमिकों को कहीं न कहीं अपने हितों से समझौता करते हुए कार्य करने की जरूरत होगी। इससे न केवल पुर्ननिर्माण को बल मिलेगा बल्कि दोनो पक्षों के हित आने वाले वक्त के लिए कारगर सिद्ध हो सकेगें।
लेकिन इन सबसे आगे बढक़र हमें विकास के स्वदेशी यानि की भारतीय मॉडल पर गंभीरता से काम करना होगा। पिछले दिनों प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने देश भर के सरपंचों से बातचीत में स्वावलंबन शब्द पर फोकस करते हुए इस दिशा में आगे बढऩे के संकेत भी दिए हैं। साथ ही स्व शब्द पर जोर देते हुए स्वदेशी मॉडल को विकसित करने की भी बात कही है। देश वासियों को संबोधित करते हुए प्रधान मंत्री ने देश को आत्म निर्भर बनाने की दिशा में कोरोना महामारी की चुनौती को अवसर में बदलने के लिए मिलकर काम करने का भी आहवान किया है। साथ ही अर्थ व्यवस्था को गति प्रदान करने के लिए विशेष आर्थिक पैकेज का ऐलान भी निश्चित तौर पर भारतीय विकास मॉडल में एक अहम कदम साबित हो सकता है।
स्वदेशी विकास मॉडल की दिशा में अब शासन, प्रशासन तथा समाज को मिलकर बड़ी भूमिका निभानी होगी। सरपंचों के साथ वार्तालाप के दौरान नरेंद्र मोदी ने आत्मनिर्भर स्वदेशी मॉडल के चार पायदान गिनाए हैं जिनमें गांव, जिला, प्रांत व देश शामिल है। मॉडल को धरातल पर उतारने के लिए समाज के साथ-साथ शासन व प्रशासन को बड़ी गंभीरता से कार्य करने की आवश्यकता होगी। हमें इस बात पर गौर करना होगा कि हमें जो जीवन के लिए आवश्यक होगा उसे यहां गुणवत्ता पर समझौता किये बिना तैयार करना होगा। विदेशी आयात पर निर्भरता कम करनी होगी, जिसमें विशेषकर चीन एक बड़ी चुनौती रहेगा। कोरोना महामारी के बीच चीन न केवल भारत बल्कि दुनिया की तमाम आर्थिक ताकतों के लिए भी खतरे की घंटी बजा रहा है। साथ ही चीन सहित दुनिया भर की कई कंपनियां भारत में आने को व्याकुल है, ऐसे में आने वाला वक्त बड़ा महत्वपूर्ण होगा। बशर्ते कि हम इसके लिए तैयार हो जाएं।
ऐसा भी नहीं है कि आज भारत का स्वदेशी मॉडल किसी स्तर पर कम है। कम्प्यूटर, परमाणु विज्ञान, स्पेस टेक्रोलॉजी के क्षेत्र में हमने बड़ी उड़ान भरी है। पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छता, जैविक कृषि, गौ उत्पादन, योग व आयुर्वेद के प्रति भी हमें तेजी से कदम बढ़ाने होंगे। इस दिशा में अमूल व पतंजलि जैसे स्वदेशी मॉडल के सफल प्रयोग प्रोत्साहन का कार्य कर सकते हैं।
लेकिन स्वदेशी मॉडल पर आगे बढऩे से पहले हमें अपनी कार्यप्रणाली को भी स्वदेशी मॉडल के आधार पर तैयार करना होगा। हमें यह नहीं भूलना है कि कहीं न कहीं अभी भी हमारी वर्तमान कार्यप्रणाली अंग्रेजों द्वारा पैदा की हुई मानसिकता पर ही केन्द्रित है जिसे अब भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप विकसित करना होगा। कुल मिलाकर आने वाला वक्त भारतवासियों के लिए न केवल एक स्वर्णिम समय सिद्ध हो सकता है बल्कि विकास की राह पर देश को नई दिशा प्रदान कर सकता है।

Wednesday, 20 May 2020

शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है औषधीय गुणों से भरपूर 'काफलÓ

हिमालय के एक विशेष क्षेत्र में जंगली तौर पर पाया जाता है यह फल, कई रोगों में है रामबाण
हिमाचल प्रदेश सहित हिमालय के अन्य क्षेत्रों में जंगली तौर पर पाया जाने वाला फल 'काफलÓ कई औषधीय गुणों से भरपूर होने के कारण शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने का काम करता है। प्रति वर्ष अप्रैल से जून माह के बीच काफल पक कर तैयार हो जाता है। काफल आर्थिक तौर पर भी स्थानीय लोगों के लिए लाभकारी सिद्ध होता है। काफल के कारण प्रतिवर्ष स्थानीय लोग बड़ी मात्रा में इसकी खेप को आसपास के स्थानीय बाजारों में पहुंचाकर काफी लाभ अर्जित करते हैं।


काफल जंगली तौर पर पाया जाने वाला एक फल ही नहीं है बल्कि हमारे शरीर में एक औषधी का काम भी करता है। काफल में विटामिन्स, आयरन और एंटी ऑक्सीडेंन्टस प्रचूर मात्रा में पाये जाते हैं। इसके साथ ही यह कई तरह के प्राकृतिक तत्वों जैसे माइरिकेटिन, मैरिकिट्रिन और ग्लाइकोसाइड्स से भी परिपूर्ण है। इसकी पत्तियों में लावेन -4-हाइड्रोक्सी-3 पाया जाता है। काफल के पेड़ की छाल, फल तथा पत्तियां भी औषधीय गुणों के लिये जानी जाती है। काफल की छाल में एंटी इन्फलैमेटरी, एंटी-हेल्मिंथिक, एंटी-माइक्रोबियल, एंटी-ऑक्सीडेंट और एंटी-माइक्रोबियल क्वालिटी पाई जाती है। इतने गुणों से परिपूर्ण काफल न केवल रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है बल्कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारी की रोकथाम का भी काम करता है। काफल का अत्यधिक रस-युक्त फल पाचक होता है। काफल के फल के ऊपर लगा भूरे व काले धब्बों से युक्त मोर्टिल मोम अल्सर की बीमारी में प्रभावी माना गया है। काफल का फल खाने से पेट के कई प्रकार के विकार दूर होते हैं। साथ ही इसका सेवन मानसिक बीमारियों समेत कई प्रकार के रोगों के लिए भी फायदेमन्द माना गया है। इसके पेड़ की छाल का सार, अदरक तथा दालचीनी का मिश्रण अस्थमा, डायरिया, बुखार, टाइफाइड, पेचिश तथा फेफड़े से ग्रस्त बीमारियों के लिए अत्यधिक उपयोगी माना गया है। साथ ही काफल के पेड़ की छाल का पाउडर जुकाम, आँख की बीमारी तथा सरदर्द में सूँधनी के रूप में प्रयोग में लाया जाता है। 


काफलड़ी चूर्ण को अदरक के जूस तथा शहद के साथ मिलाकर उपयोग करने से गले की बीमारी, खाँसी तथा अस्थमा जैसे रोगों से मुक्ति दिलाने में मददगार होता है। इसके अलावा काफल की छाल दांत दर्द तथा छाल का तेल कान दर्द के लिये भी अत्यधिक उपयोगी माना गया है। यही नहीं काफल के फूल का तेल भी कान दर्द, डायरिया तथा लकवे की बीमारी में उपयोग के साथ-साथ हृदय रोग, मधुमेय रोग उच्च एंव निम्न रक्त चाप को नियान्त्रित करने में भी सहायक होता है।
कहां पाया जाता है काफल
काफल उत्तरी भारत और नेपाल के पर्वतीय क्षेत्र, मुख्यत हिमालय की तलहटी क्षेत्रों में पाया जाने वाला सदा हरा भरा रहने वाला एक काष्ठीय वृक्ष प्रजाति है। काफल का पेड़ 1300 मीटर से 2100 मीटर (4000 फीट से 6000 फीट) तक की ऊँचाई पर प्राकृतिक रूप से पैदा होने वाला बृक्ष है। काफल अधिकतर हिमाचल प्रदेश, उतराखंड, उत्तर-पूर्वी राज्य मेघालय और नेपाल में बहुतायत मात्रा में पाया जाता है। काफल को बॉक्स मर्टल और बेबेरी के नाम से भी जाना जाता है।
कैसा होता है काफल का फल
काफल खाने में स्वादिष्ठ, रंग में हरा, लाल और काले रंग का फल है। इस फल को वैज्ञानिक तौर पर माइरिका एस्कुलेंटा के नाम से भी जाना जाता है। काफल का फल गर्मी में शरीर को ठंडक प्रदान करता है। साथ ही इसके फल को खाने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है।
क्या कहते हैं अधिकारी
नेशनल मेडिसिनल प्लांट्स बोर्ड के क्षेत्रीय निदेशक, क्षेत्रीय एवं सुगमता केंद्र उत्तर भारत स्थित जोगिन्दर नगर डॉ. अरूण चंदन का कहना है कि काफल जंगली तौर पर पाया जाना वाला एक विशेष मौसमी फल है। औषधीय गुणों से भरपूर यह फल शरीर में प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने का काम करता है। इस फल के सेवन से कई तरह की बीमारियों से बचाव होता है तथा इसके कारण स्थानीय लोगों की आर्थिकी को भी बल मिलता है।

Monday, 11 May 2020

वैश्विक महामारी कोविड-19 की जंग में भारतीय मानवीय दृष्टिकोण

संपूर्ण विश्व की मानवता आज कोविड-19 महामारी के बीच मानो अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। भारत वर्ष के संदर्भ में भी कहें तो प्रत्येक भारतवासी पिछले डेढ़ माह से पूरे समर्पण भाव से अपने-अपने घर में बंद होकर इस जंग से लड़ रहा है। इसी बीच इस कोरोना युद्ध में आने वाला वक्त न केवल कठिन होगा बल्कि हमें मानवता व आर्थिक पक्ष के बीच भी एक भयंकर द्वन्द्व देखने को मिल सकता है। जिसमें या तो मानवीय पक्ष या फिर आर्थिक पक्ष में कौन विजयी पताका लहराएगा ये तो भविष्य के गर्भ में छिपा है। परन्तु भारतीय संस्कृति ने मानवीय कल्याण व उत्थान को हमेशा ऊपर रखा है। लेकिन तथाकथित आधुनिकता से भरी इस दुनिया में मानवीय कल्याण व उत्थान में आर्थिक पक्ष को भी कम नहीं आंक सकते हैं। ऐसे में अब हमें यह तय करना होगा कि मानवीय मूल्यों व भौतिकतावाद (आर्थिक पक्ष) के बीच समन्वय बिठाकर कोरोना की इस जंग से विजयी होना है या फिर मैं व मेरा की पश्चिमी संस्कृति का पोषण कर हम व हमारा वाली मानवता को हराना है।लेकिन कोरोना की इस जंग में अगर पश्चिमी मॉडल व संस्कृति की ओर नजर दौडाएं तो कोरोना महामारी से जुड़े अब तक के आंकड़े व वहां की वर्तमान स्थिति में मानवता व मानवीय मूल्य हारते हुए नजर आ रहे हैं। जिस विकास मॉडल का उदाहरण दे-दे कर हम अपनी नस्सलों को शिक्षित करते हुए गौरवान्वित अनुभव करते रहे हैं, उसी मॉडल के कारण आज भौतिकतावाद के आगे मानवीय पक्ष हारता हुआ नजर आ रहा है। दुनिया के विकसित देशों में कोरोना संक्रमण के बढ़ते आंकड़े व हो रही मौतें तो बस यही कह रही है कि हमें दूसरों के अनुसरण को त्याग कर अपना विकास मॉडल स्वयं विकसित करना होगा। हमारी समृद्ध प्राचीन संस्कृति भी इसी का पोषण करती रही है जिसे अब हमें न केवल आगे बढ़ाना होगा बल्कि अपनी नस्लों को विकसित देशों के उदाहरण देने के बजाए हमें अपनी वैदिक संस्कृति व प्राचीन भारत की ओर मुडऩा होगा। हमें इस बात पर भी गौर करना होगा कि प्राचीन भारत का विकास मॉडल न केवल कोरोना जैसी महा विनाशकारी बीमारी में हमें मजबूत बनाता है बल्कि संकट की इस घड़ी में इसे पुर्नजीवित करने की आवश्यकता भी महसूस हो रही है। 
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी हमेशा ग्रामीण विकास के उत्थान की बात करते रहे हैं। यदि आज हमारे ग्रामीण क्षेत्र आर्थिक पक्ष की दृष्टि से मजबूत होते तो हम कोरोना महामारी को बड़ी कुशलता के साथ न केवल हराने में सक्षम होते बल्कि मानवीय पक्ष भी हमेशा सर्वोपरि रहता। इस बीच न तो लोगों को बड़ी संख्या में एक जगह से दूसरी जगह पलायन को मजबूर होना पड़ता न ही यह संक्रमण बड़े पैमाने पर हमारे गांव व घरों में दस्तक दे पाता। कहने को तो आज हम स्वास्थ्य के क्षेत्र में दुनिया के तथाकथित विकसित देशों के तय मापदंडों के मुकाबले कमतर है, हमारे पास तथाकथित विश्व रैंकिंग वाले शैक्षणिक संस्थान भी नहीं है। लेकिन यहां पर हमें समझना होगा कि जहां हमारे आयुर्वेद व योग में बड़ी से बड़ी महामारी से लडऩे में क्षमता है बल्कि हमारी गुरूकूल शिक्षा पद्धति पश्चिमी देशों की पांच सितारा शिक्षा के मुकाबले कहीं आगे रही है। जिस विज्ञान का दंभ भर कर पश्चिमी देश विकास मॉडल की बात करते हैं ये सब तो हमारे प्राचीन वेद ग्रंथों में पहले से ही मौजूद है लेकिन दुर्भाग्य वश हमने न तो इसे समझने का प्रयास ही नहीं किया बल्कि पश्चिमी देशों के एजेंडे के आगे हम नतमस्तक होते चले गए। जिसका खामियाजा आज पूरी दुनिया के साथ-साथ देश की 135 करोड़ आबादी भी भुगतने को मजबूर हुई है।
लेकिन कोरोना वायरस की इस लड़ाई के बीच भारत के मानवीय दृष्टिकोण के आगे आज इस वैश्विक महामारी की चमक न केवल फिकी पड़ती नजर आ रही है बल्कि कोरोना संक्रमण को भी बड़े पैमाने पर फैलने से रोकने में कुछ हद तक हम कामयाब भी हुए हैं। इस संकट की घड़ी में समाज के छोटे से छोटे तबके से जुड़ा व्यक्ति भले ही आर्थिक तौर पर कमजोर जरूर है लेकिन मानवीय दृष्टिकोण के आगे उसकी जेब कम नहीं पड़ रही है। हमारे समाज में आज कितने ही ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे कि लोग प्रतिदिन इस संकट की घड़ी में न केवल मास्क तैयार करने में जुटे हैं बल्कि आर्थिक अंशदान व जरूरतमंदों को भोजन व राशन उपलब्ध्ध करवाने में भी कतई पीछे नहीं हैं। इस तरह का जज्बा न केवल हमारी समृद्ध संस्कृति का प्रतीक है बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक मानवता का संदेश भी दे रहा है। यहां गौर करने वाली बात तो यह है कि आज कोरोना वायरस (कोविड-19) महामारी के खात्मे को लेकर पूरी दुनिया भारत की ओर देख रही है। ऐसे में यह वक्त न केवल समृद्ध संस्कृति को पूरी दुनिया में ले जाने का है बल्कि आयुर्वेद व योग के माध्यम से हम इस बीमारी को रोकने का प्रयास भी कर सकते हैं।
ऐसी विकट परिस्थति में अब यह आपको ही तय करना है कि क्या हमें पश्चिमी मॉडल की मैं व मेरा केन्द्रित आगे बढऩे वाली संस्कृति का पोषण करना है या फिर हम व हमारा जैसे मानवीय मूल्यों व मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण समृद्ध भारतीय संस्कृति का संरक्षण व संवर्धन कर आने वाली पीढ़ी को शिक्षित करना है। कोरोना महामारी के चलते इस जिंदगी व मौत की लड़ाई में अब यह आपको ही खुलेमन से तय करना है कि हमें पश्चिमी मॉडल अपनाना है या फिर समृद्ध प्राचीन भारतीय संस्कृति को आगे बढ़ाना है।

Thursday, 7 May 2020

कोरोना महामारी के बीच आयुर्वेद विभाग का मधुयष्टियादि काढ़ा बढ़ाएगा रोग प्रतिरोधक क्षमता

जोगिन्दर नगर आयुर्वेदिक फॉर्मेसेी में तैयार हो रहा 36 क्विंटल काढ़ा, कोरोना वारियर्स को जल्द होगा वितरित
वैश्विक महामारी कोरोना वायरस (कोविड-19) के बीच सरकार ने रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के लिए हमारी प्राचीन चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद को प्रमुखता से शामिल किया है। इस जानलेवा महामारी के बीच फ्रंट लाइन पर लड़ रहे कोरोना वारियर्स के साथ-साथ आम लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के लिए सरकार ने प्रदेश आयुर्वेद विभाग के माध्यम से मधुयष्टियादि कषाय (काढ़ा)को लॉच किया है। बनफशा, मीठी सौंफ, मुनक्का, दालचीनी, गुलाब और मधुयष्टि जैसी कई जड़ी-बूटियां से तैयार होना वाला यह काढ़ा इम्युनोबूस्टर के तौर पर काम करता है। यह काढ़ा खांसी, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, बुखार, गले के संक्रमण एवं श्वसन संबंधी विभिन्न बीमारियों के इलाज में भी सहायक होता है। मुख्य मंत्री जय राम ठाकुर ने 1 मई को शिमला से मधुयष्टियादि कषाय (काढ़ा) को लांच किया है तथा अब जल्द ही यह लोगों तक पहुंच जाएगा।
मंडी जिला के जोगिन्दर नगर स्थित राजकीय आयुर्वेदिक फॉर्मेसी में मधुयष्टियादि काढ़े को तैयार किया जा रहा है। पहले चरण में सरकार ने विभाग को 36 क्विंटल काढ़ा तैयार करने को कहा है। इस काढ़े को तैयार करने से लेकर इसकी पैकेजिंग तक आयुर्वेदिक फॉर्मेसी जोगिन्दर नगर में गत 22 अप्रैल से लगभग 45 कर्मचारी प्रतिदिन 12 घंटे काम कर इसे तैयार करने में जुटे हुए हैं। 36 क्विंटल काढ़े के निर्मित लगभग 75 ग्राम भार वाले 45 हजार पैकेट तैयार किये जा रहे हैं। पहले चरण में प्रदेश भर में कोरोना महामारी से फ्रंट लाइन पर लड़ रहे स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग, आयुर्वेद विभाग, पुलिस, मीडिया, जन सम्पर्क व सफाई कर्मियों सहित अन्य लोगों को इसे उपलब्ध करवाया जाएगा ताकि उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाया जा सके।
कैसे करें काढ़े का उपयोग
75 ग्राम पैक में से 1-2 चम्मच काढ़ा एक बर्तन में डाल लें तथा उसमें 200 मिलीमीटर पानी को शामिल करें। अब इस काढ़े को हल्की आंच पर एक चौथाई शेष रहने तक उबालें। उबालने के बाद तरल को एक गिलास में छान लें तथा स्वादानुसार इसमें गुड़, शहद या नींबू रस को मिलाया जा सकता है। इसको पीने से पहले अच्छी तरह से हिला लें ताकि काढ़ा अच्छी तरह से घुल जाए। काढ़े को प्रतिदिन सुबह व शाम खाली पेट सेवन करने से स्वास्थ्य अच्छा रहता है तथा हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। इसके नियमित सेवन करने से व्यक्ति का खांसी, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, बुखार, गले के संक्रमण एवं श्वसन संबंधी विभिन्न बीमारियों से बचाव होता है।
किन-किन घटक द्रव्यों से बना है मधुयष्टियादि कषाय (काढ़ा)
मधुयष्टियादि कषाय (काढ़ा) 10 आयुर्वेदिक औषधीय घटक द्रव्यों से बना है। जिनमें दालचीनी, मधुयष्टि, बनफशा, सौंफ, मुनक्का, गोजिहा, श्लेष्मातक, गुलाब पुष्प, रेशा खात्मी व बदर का एक-एक भाग शामिल होता है।
क्या कहते हैं अधिकारी
उप निदेशक आयुर्वेद विभाग मंडी जोन डॉ. तेजस्वी विजय आजाद से बातचीत की तो उनका कहना है कि जोगिन्दर नगर आयुर्वेदिक फॉर्मेसी में सरकारी आदेशों के तहत 36 क्विंटल मधुयष्टियादि कषाय (काढ़ा) के 75 ग्राम भार वाले 45 हजार पैकेट तैयार किये जा रहे हैं। इन तैयार पैकेट को जल्द ही जिलों को भेज दिया जाएगा ताकि कोरोना वारियर्स को इन्हे वितरित किया जा सके। इन पैकेट को तैयार करने में लगभग 45 कर्मचारी 22 अप्रैल से प्रतिदिन 12 घंटे कार्य करते हुए जुटे हैं। उन्होने बताया कि लोग स्वयं भी घर में तुलसी, दालचीनी, काली मिर्च तथा सौंफ को मिलाकर काढ़ा तैयार कर सकते हैं। इसके अलावा प्रतिदिन प्राणायाम व योग को भी अपनी दिनचर्या में शामिल करने का आहवान किया है जिससे भी व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है।

Wednesday, 18 March 2020

आयुर्वेद में स्टार्ट अप को आयुर्वेद अुनसंधान संस्थान जोगिन्दर नगर में इन्क्युबेशन सैंटर स्थापित

आयुर्वेद क्षेत्र में नवोन्मेषी विचार को बतौर उद्यम विकसित करने में पांच युवा कार्यरत (मुख्य मंत्री स्टार्ट अप योजना)

मुख्य मंत्री स्टार्ट अप योजना के अंतर्गत हिमाचल प्रदेश आयुर्वेद विभाग के जोगिन्दर नगर स्थित आयुर्वेद अनुसंधान संस्थान ने जड़ी बूटियों व आयुर्वेद क्षेत्र में बतौर इन्क्युबेशन सैंटर कार्य करना प्रारंभ कर दिया है। आयुर्वेद एवं जड़ी बूटियों के क्षेत्र में स्टार्ट अप को मदद करने की दिशा में यह संस्थान देश का पहला इन्क्यूबेशन केंद्र बन गया है। वर्तमान में सीएम स्टार्ट अप योजना के तहत नवोन्मेषी विचार को बतौर उद्यम विकसित करने की दिशा में प्रदेश भर के पांच युवा कार्य कर रहे हैं। इस शोध केंद्र के सहयोग से प्रदेश में आयुर्वेद क्षेत्र में स्टार्ट अप के माध्यम से उद्यम स्थापना को लेकर जल्द ही बेहतर परिणाम सामने आने वाले हैं।
प्रदेश के युवाओं, किसानों और उद्यमियों को जड़ी-बूटियों तथा आयुर्वेद क्षेत्र में उद्योग स्थापना की दिशा में स्टार्ट अप प्रदान करने को प्रदेश उद्योग विभाग के साथ मुख्य मंत्री स्टार्टअप योजना के तहत यह इन्क्यूबेशन सैंटर स्थापित किया गया है। इस संस्थान की अनुसंधान संबंधी सुविधाओं का लाभ उठाकर प्रदेश भर से आयुर्वेद क्षेत्र में स्टार्ट अप को चयनित युवा अपने नवीन व नवोन्मेषी विचारों पर गहन अध्ययन व शोध करअपना उद्यम स्थापित कर सकेगें। अब तक प्रदेश भर से जड़ी बूटियों एवं आयुर्वेद में नवोन्मेषी विचार वाले पांच युवाओं को प्रदेश उद्योग विभाग द्वारा चयनित कर यहां भेजा है। जिन्होने अपने नवोन्मेषी विचार को स्टार्ट अप देने की दिशा में शोध कार्य भी प्रारंभ कर दिया है।
मुख्य मंत्री स्टार्ट अप योजना के तहत इस संस्थान में सोलन के कमलेश अर्श रोग पर अपने खानदानी ईलाज से उत्पाद बनाने, हमीरपुर के राजेश हर्बल वाशिंग पाऊडर बनाने, अमित जड़ी-बूटियों से पोषक पदार्थ बनाने, चंबा के रियाज हर्बल वाइन तथा ताबो गोम्पा से सोवा रिग्पा हर्बल आहार बनाने संबंधी अपने नवीन विचारों पर शोध कार्य कर रहे हैं। आयुर्वेद व जड़ी बूटियों के क्षेत्र में नवीन विचार के साथ कार्यरत इन पांचों युवाओं द्वारा तैयार उत्पाद जल्द ही उद्यम के तौर पर स्थापित होंगे। इससे न केवल प्रदेश व देश के लोगों को आयुर्वेद व जड़ी बूटियों से तैयार प्राकृतिक व स्वास्थ्यवर्धक उत्पाद उपलब्ध होंगे बल्कि इस क्षेत्र में प्रयासरत इन युवाओं को स्वावलंबी व आत्मनिर्भर बनने के साथ-साथ बतौर उद्यमी स्थापित होने का भी अवसर मिलेगा। हिमाचल प्रदेश में आयुर्वेद व जड़ी बूटियों के क्षेत्र में स्टार्ट अप के माध्यम से उद्यमशीलता विकसित करने की अपार संभावनाएं मौजूद हैं जो प्रदेश के युवाओं के लिए स्वरोजगार प्रदान करने में अहम कड़ी साबित हो सकता है।
क्या कहते हैं अधिकारी:
इस संबंध में क्षेत्रीय निदेशक, क्षेत्रीय एवं सुगमता केंद्र उत्तर भारत स्थित जोगिन्दर नगर डॉ. अरूण चंदन का कहना है कि आयुर्वेद क्षेत्र में स्टार्ट अप को मदद करने की दिशा में आयुर्वेद अनुसंधान संस्थान जोगिन्दर नगर देश का पहला इन्क्यूबेशन केंद्र बन गया है। मुख्य मंत्री स्टार्ट अप योजना के माध्यम से यहां पर पांच युवा अपने नवोन्मेषी विचार को लेकर शोध कार्य कर रहे हैं जिन्हे संस्थान हर संभव मदद प्रदान कर रहा है।
उनका कहना है कि संस्थान ने 2500 वर्ग फीट का क्षेत्र नवोन्मेषी विचार को लेकर शोध कार्य करने व बैठने के लिए उपलब्ध करवाया है। इसके अलावा संस्थान शोध को लेकर प्रयोगशाला, संकाय इत्यादि के तौर पर भी मदद कर रहा है। अपने नवीन विचार को लेकर यहां कार्यरत कमलेश को उत्तराखंड के ऋषिकेश में गत 1 से 7 मार्च तक आयोजित अंतर्राष्ट्रीय शोध उत्सव में भी भेजा गया जहां पर प्राकृतिक भोजन एवं औषधीय पौधों को लेकर प्रदर्शनी लगाई गई थी। इसी तरह अन्य नवीन विचार को लेकर स्टार्ट अप से जुड़े युवाओं की भी यह संस्थान मदद कर रहा है।
क्या है मुख्य मंत्री स्टार्ट अप योजना:
मुख्य मंत्री स्टार्ट अप योजना के अंतर्गत चयनित युवा व किसान के नमोन्वेषी विचार को बतौर उद्यम विकसित करने तथा शोध कार्य के लिए सरकार प्रतिमाह 25 हजार रूपये की एक वर्ष तक छात्रवृति प्रदान करती है। साथ ही नवीन विचार को लेकर इन्क्यूबेशन सैंटर में उपलब्ध आधारभूत ढांचे की सुविधा को भी नि:शुल्क मुहैया करवाया जाता है। इसके अलावा तैयार उत्पाद के पंजीकरण से लेकर पेटेंट करवाने तक की भी मदद की जाती है।
सीएम स्टार्ट अप योजना के तहत प्रदेश सरकार ने आयुर्वेद अनुसंधान संस्थान जोगिन्दर नगर के अलावा आईआईटी मंडी, एनआईटी हमीरपुर, हिमाचल प्रदेश विश्व विद्यालय शिमला, चितकारा विश्वविद्यालय सोलन, कृषि विश्व विद्यालय पालमपुर, उद्यानिकी एवं बागवानी विश्वविद्यालय नौणी सोलन, जेपी विश्वविद्यालय वाकनाघाट सोलन, हिमालय जैवसंपदा प्रौद्योगिकी संस्थान, पालमपुर तथा हिमाचल प्रदेश विज्ञान, प्रौद्योगिकी और पर्यावरण परिषद् शिमला को भी इन्क्यूबेशन सैंटर के तौर पर स्थापित किया है ताकि युवा अपने नवीन विचारों को इन इन्क्यूवेशन सैंटर के सहयोग से उद्यम में बदल सकें।
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Friday, 6 March 2020

अटल टिंकरिंग लैब से स्कूली बच्चों व युवाओं के नवोन्मेषी विचारों को मिल रही नई दिशा

एटीएल के कारण चौंतड़ा स्कूल के बच्चों द्वारा तैयार मॉडल प्रदेश व राष्ट्रीय स्तर पर सराहे
देश में स्कूली बच्चों के साथ-साथ युवाओं के नवोन्मेषी विचारों को मंजिल तक पहुंचाने तथा रचनात्मक विचार को विकसित करने में सरकार द्वारा स्थापित अटल टिंकरिंग लैब अहम भूमिका निभा रही है।

इसी अटल टिंकरिंग लैब का कमाल है कि आज मंडी जिला के चौंतड़ा स्थित राजकीय आदर्श वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला के बच्चों द्वारा तैयार चार मॉडल जिनमें स्मार्ट मेडिसन बॉक्स, स्मार्ट ई-डस्टबिन, स्मार्ट इरिगेशन तथा स्मार्ट पंपिंग सिस्टम शामिल है न केवल प्रदेश बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी खासे सराहे गए हैं। इसी लैब के माध्यम से तैयार किए गए स्मार्ट मेडिसन बॉक्स को जिला में दूसरा स्थान प्राप्त हो चुका है तो वहीं राज्य स्तर पर बेहतरीन भागीदारी दर्ज करवाई है। इसी तरह स्मार्ट ई-डस्टबिन को भी प्रदेश व राष्ट्रीय स्तर पर खूब सराहा गया है। स्कूल के टीजीटी नॉन मेडिकल अध्यापक एवं अटल टिंकरिंग लैब प्रभारी संदीप वर्मा ने बताया कि स्कूल की छात्राओं रीतिका, रश्मि तथा अंचला ठाकुर के माध्यम से स्मार्ट मेडिसन बॉक्स बनाने का आइडिया मिला।

स्कूल की एटीएल लैब के सहयोग से इस आइडिया को मूर्त रूप देने का प्रयास करते हुए स्मार्ट मेडिसन बॉक्स विकसित किया गया। इस मेडिसन बॉक्स में तीन अलग-अलग खाने बने हुए हैं जिनमें दवाई रखी जाती है। जैसे ही दवाई लेने का समय आता है तो अलार्म बज उठता है। इस मेडिसन बॉक्स का लाभ यह है कि जिन्हे दवाई लेने में भूल हो जाती है उनके लिए यह काफी लाभप्रद है। यह मेडिसन बॉक्स आकार में काफी छोटा है तथा इसे आसानी से कहीं भी ले जाया जा सकता है। इसे तैयार करने में औसतन 500-700 रूपये खर्चा आया है।
इसी तरह स्कूल की छात्रा अंचला ठाकुर के माध्यम से ही स्मार्ट ई-डस्टबिन विकसित करने का आइडिया मिला जिसे भी एटीएल के सहयोग से मूर्त रूप प्रदान किया गया। शहरी निकायों अब तो ग्राम पंचायतों में भी डस्टबिन स्थापित हो रहे हैं, लेकिन इनके खुला रहने के कारण न केवल सडऩ पैदा होती है बल्कि आवारा जानवर भी कचरे में घुसे रहते हैं। इस स्मार्ट ई-डस्टबिन में अल्ट्रासोनिक सेंसर लगा हुआ है। जैसे की कोई व्यक्ति इसके नजदीक जाता है तो यह स्वयं ही खुल जाता है। इसमें तीन बटन जिनमें लाल, हरा व नीला शामिल हैं लगे हुए हैं। लाल बटन जलने का मतलब डस्टबिन भरा, हरे का मतलब खाली तथा नीले का मतलब आधा भरा हुआ होता है। इस डस्टबिन की इंटरनेट के माध्यम से कहीं से भी निगरानी की जा सकती है।
 इसे बनाने में औसतन एक हजार रूपये तक का खर्चा आया है। यही नहीं बच्चों के माध्यम से समाज से आए अन्य रचनात्मक विचारों पर काम करते हुए एटीएल के सहयोग से स्मार्ट इरिगेशन व स्मार्ट पंपिंग सिस्टम को भी विकसित किया गया है, जिन्हे भी प्रदेश व राष्ट्रीय स्तर पर खूब सराहा गया है।वास्तव में अटल टिंकरिंग लैब का प्रमुख उद्देश्य स्कूली बच्चों के साथ-साथ समाज के अन्य लोगों को किताबी ज्ञान के बजाए प्रेक्टिकल ज्ञान के साथ-साथ नई तकनीकों से अवगत करवाकर समाज की विभिन्न समस्याओं को हल करते हुए जीवन को सुगम बनाना है। साथ ही समाज की समुचित भागीदारी नवोन्मेषी विचारों व रचनात्मकता को एटीएल के माध्यम से मूर्तरूप प्रदान करना है।
स्कूल के प्रधानाचार्य कल्याण सिंह ठाकुर का कहना है कि वर्ष 2018-19 के दौरान हिमाचल प्रदेश को 13 हजार स्कूलों की कड़ी राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के माध्यम से दो एटीएल लैब मिली जिनमें चौंतड़ा का सरकारी स्कूल प्रदेश का पहला स्कूल था। अटल टिंकरिंग लैब के संचालन को सरकार 20 लाख रूपये की मदद करती है जिसमें 10 लाख रूपये के विभिन्न इक्यूपमेंट तथा दो लाख रूपये वार्षिक अनुदान दिया जाता है।
उन्होने कहा कि अटल टिंकरिंग लैब का प्रमुख लक्ष्य बच्चों व युवाओं में वैज्ञानिक सोच को विकसित करना है। नीति आयोग ने अटल इनोवेशन मिशन के तहत पूरे देश भर में अटल टिंकरिंग लैब स्थापित करने का प्रयोग किया है। अटल टिंकरिंग लैब में थ्री-डी प्रिंटिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रोबोटिक्स के नए तकनीकों से रूबरू होने का मौका मिलता है। लैब में 6वीं कक्षा के ऊपर के विद्यार्थी, समाज के लोग शामिल होकर अपने नवोन्मेषी विचारों को मूर्तरूप प्रदान कर सकते हैं। यह लैब स्कूल समय के बाद सांय तीन बजे से कार्यरत रहती है।

Wednesday, 4 March 2020

मशरूम खेती से जुडक़र छत्र गांव के कशमीर सिंह आगे बढ़ा रहे हैं आजीविका

हिमाचल खुम्ब विकास योजना के तहत प्रदेश सरकार आर्थिक तौर पर कर रही है किसानों की मदद
जोगिन्दर नगर उप-मंडल के अंतर्गत ग्राम पंचायत मसौली के तहत गांव छत्र के 65 वर्षीय किसान कशमीर सिंह मशरूम की खेती से जुडक़र अपनी आजीविका को आगे बढ़ाने में कार्यरत हैं। बीपीएल परिवार में शामिल कशमीर सिंह दिहाड़ी मजदूरी करने के साथ-साथ पारंपरिक खेती-बाड़ी के माध्यम से अपने परिवार का भरण पोषण कर रहे हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से मशरूम की खेती से जुडक़र वे अपनी आजीविका को आगे बढ़ावा देने में प्रयासरत हैं।
जब इस संबंध में किसान कशमीर सिंह से बातचीत की तो उनका कहना है कि पारंपरिक खेती-बाड़ी के साथ-साथ वे मेलों इत्यादि में घर में ही तैयार की जाने वाली आइसक्रीम को बेचकर अपनी आजीविका को चलाने का प्रयास करते हैं। लेकिन वर्ष 1990-91 के दौरान उन्होने मशरूम उत्पादन से जुडक़र आजीविका को बढ़ावा देने का प्रयास किया तथा इस दिशा में कुछ हद तक वे कामयाब भी हुए हैं। उनका कहना है कि घर के ही एक कमरे में वे मौसमी तौर पर मशरूम का उत्पादन करते हैं। मौसमी मशरूम का उत्पादन तीन से चार माह तक ही चलता है इस दौरान वे लगभग 18 से 20 हजार रूपये तक की अतिरिक्त आमदनी कमा लेते हैं।
बुढ़ापे की दहलीज पर खड़े कशमीर सिंह का कहना है कि मंहगाई भरे इस दौर में 6 सदस्यों वाले परिवार का भरण पोषण करना किसी चुनौती से कम नहीं है, बावजूद इसके उन्होने सोलन से एक सप्ताह का मशरूम खेती को लेकर प्रशिक्षण प्राप्त किया तथा घर के एक कमरे में ही इसका उत्पादन शुरू कर दिया। उन्होने बताया कि वर्तमान में उन्होने 75 बैग मशरूम के लाए हैं जिनमें से प्रत्येक बैग से औसतन तीन से पांच किलोग्राम तक का उत्पादन हो जाता है। मार्केटिंग पर जानना चाहा तो वे कहते हैं कि वे स्वयं ही थैला भरकर मशरूम के पैकेट को जोगिन्दर नगर शहर व आसपास के गांवों में बेचते हैं तथा 100 से 125 रूपये प्रति किलोग्राम की दर से दाम प्राप्त हो जाते हैं। उनका कहना है कि वे इस इकाई को बड़ी इकाई में परिवर्तित करना चाहते हैं लेकिन जमीन के साथ-साथ आर्थिक संसाधनों की कमी आड़े आ रही है।
जब सरकार की अन्य योजनाओं बारे जानना चाहा तो उनका कहना है कि उन्हे सरकार की ओर से प्रतिमाह सामाजिक सुरक्षा पेंशन भी प्राप्त हो रही है। इसके अलावा मकान बनाने के लिए मामला संबंधित विभाग को भी प्रस्तुत किया है ताकि बढ़ते परिवार की जरूरतों को भी पूरा किया जा सके।
क्या कहते हैं अधिकारी
उद्यान विकास अधिकारी चौंतड़ा नवीन कुमार का कहना है कि हिमाचल खुम्ब विकास योजना के तहत सरकार जहां बड़ा मशरूम घर बनाने को 50 हजार रूपये तो वहीं छोटा मशरूम शैड बनाने को 25 हजार रूपये तक की आर्थिक मदद प्रदान कर रही है। साथ ही मशरूम प्रोडक्शन युनिट स्थापना को कुल लागत का 40 प्रतिशत यानि की आठ लाख रूपये तक की भी आर्थिक सहायता दी जा रही है। इसके अलावा पांच दिन तक के प्रशिक्षण हेतु एक हजार रूपये प्रतिदिन प्रति किसान तथा देश के अंदर एक्सपोजर विजिट पर जाने वाले किसानों का सारा खर्चा भी सरकार वहन करती है। साथ ही खाद तथा स्पॉन बनाने की इकाई स्थापना को लेकर भी सरकार कुल लागत का 40 प्रतिशत प्रदान कर रही है। उन्होने किसानों विशेषकर शिक्षित बेरोजगार युवाओं से सरकार की हिमाचल खुम्ब विकास योजना का लाभ उठाकर स्वरोजगार के माध्यम से स्वावलंबी बनने का आहवान किया है।