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Wednesday, 26 November 2014

श्रद्धालुओं व पर्यटकों के लिए बेहतरीन स्थान है श्री रेणुका जी

हिमाचल प्रदेश अपने प्राकृतिक सौंदर्य व धार्मिक स्थानों के चलते न केवल राष्ट्रीय बल्कि अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भी पर्यटन की दृष्टि से ख्याति प्राप्त है। जिसके चलते जहां प्रदेश में प्रतिवर्ष लाखों देशी व विदेशी सैलानी भ्रमण हेतु यहां पहुंचते हैं तो वहीं पर्यटकों के आवागमन के चलते प्रदेश को करोडों रुपयों की आमदन भी होती है। प्रदेश में पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए सैंकडों धार्मिक व प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर स्थान है। जिनमें से एक है जिला सिरमौर का श्री रेणुका जी। यह स्थान जहां प्रदेश की सबसे बडी प्राकृतिक झील के नाते पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र बिन्दु है तो वहीं भगवान परशुराम की जन्मस्थली होने के नाते एक पवित्र धार्मिक स्थान भी है।
रेणुका झील लगभग 3 वर्ग कि0मी0 के दायरे में फैली है। इस झील के चारों ओर हरे भरे जंगल तथा इसमें चहचाहते पक्षियों की मधुर आवाजें मन को मोह लेती हैं। सबसे अहम पहेलु यह है कि जहां झील का शीतल व निर्मल जल पर्यटकों को अपनी ओर आर्किषत करता है तो वहीं दूर से देखने पर झील की आकृति एक सोई हुई महिला जैसी प्रतीत होती है। किंवदतियों के अनुसार भगवान परशुराम की मां रेणुका जब तत्कालिन राम सरोवर में जलमग्न हुई तो इसका आकार एक निद्रामग्न नारी के रुप में परिवर्तित हो गया। तभी से ही इस झील के जल को भी गंगा जल के समान पवित्र माना गया है। झील में पवित्र स्नान हेतु स्नानाघाट भी बनें है। जिसमें महिलाओं व पुरुषों को अलग-अलग से पवित्र स्नान की व्यवस्था है। झील में अठखेलियां करती मछलियां तथा विचरण करते कछुए भी पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। रेणुका का एक अन्य आकर्षण है यहां का लघु चिडियाघर और लायन सफारी। जहां पर हम एशियाई बब्बर शेरों] काले भालू] तेंदुओं] हिरण आदि को देख सकते हैं। यहां पर झील के चारों ओर लगभग 3 कि0मी0 के दायरे में स्थापित रेणुका वन्य प्राणी अभयारण्य भी पर्यटकों को अपनी ओर आर्किषत करता है। जहां पर लंगूर] धोरल] उल्लू] लाल मुर्गे] मुर्गाबी] मोर] बतख इत्यादि भी देखे जा सकते हैंै। रेणुका झील में बोटिंग की सुविधा भी है] जिसके चलते पर्यटक यहां के प्राकृतिक सौंदर्य का ज्यादा आनंद उठा सकते हैं।

                                                 इसके अलावा पर्यटक धार्मिक दृष्टि से यहां पर भगवान परशुराम का मंदिर(जिसे सिरमौर रियासत के तत्कालिन राजा सुरेन्द्र विक्रम प्रकाश ने बनाया था ¼मां रेणुका की प्रतिमा] परशुराम शीला] परशुराम ताल] सिरमौर रियासत की तत्कालिन राज नर्तकी कुब्जा देवी के नाम पर स्थापित कुब्जा पवेलियन) यहां देखने योग्य स्थान हैं। घने पेडों की छाया तथा भगवान परशुराम व मां रेणुका के आर्शीवाद से मन को एक आलौकिक शांति का भी अनुभव मिलता है। यहां आने वाले पर्यटक घण्टों ध्यान लगाते हैं। प्रतिवर्ष नवम्बर महीने में इस पवित्र स्थल पर देवोत्थान एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा तक विशाल अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का श्री रेणुका जी मेला मनाया जाता है। यहां से लगभग 10 कि0मी0 की दूरी पर गांव जामूकोटी में भगवान परशुराम का मंदिर है जहां जाकर भगवान परशुराम के दर्शन करने के साथ-साथ यहां से लगभग 3 कि0मी0 आगे पहाड़ी की चोटी पर पहुंचकर महर्षि जमदग्नि की तपोस्थली तपे-का-टिला भी देखने योग्य स्थान हैं। इस स्थान से जहां आसपास का विहंगम दृष्य देखा जा सकता है तो वहीं यहां का शुद्ध, शांत व स्वच्छ वातावरण यहां बार-बार आने को पे्ररित करता है।

पौराणिक कथानुसार भगवान परशुराम कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मां से मिलने श्रीरेणुकाजी में पधारते हैं। कहते हैं कि प्राचीन काल में आर्यवर्त में हैहवंषी क्षत्रीय राज्य राज करते थे तथा भृगुवंशी ब्राहमण उनके राज पुरोहित थे। इसी भृगुवंशी के महर्षि ऋचिक के घर महर्षि जमदग्नि का जन्म हुआ। इनका विवाह इक्ष्वाकु कुल के ऋषि रेणु की कन्या रेणुका से हुआ। महर्षि जमदग्नि सपरिवार इसी क्षेत्र में तपे का टिला] जो वर्तमान में जामुकोटी में स्थित है] रहने लगे। वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीय को मां रेणुका के गर्भ से भगवान परशुराम का जन्म हुआ। इन्हे भगवान विष्णु का छठा अवतार भी माना जाता है। कथानुसार महर्षि जमदग्नि के पास कामधेनु गाय थी] जिसे पाने के लिए सहóबाहु ने महर्षि जमदग्नि की हत्या कर दी। हत्या का समाचार सुनकर मां रेणुका शोकवश राम सरोवर में कूद गई] जो आज रेणुका झील के नाम से प्रसिद्ध है। उधर महेन्द्र पर्वत पर तपस्या में लीन भगवान परशुराम को जब मां रेणुका की मौत का पता चला तो क्रोधित होकर भगवान परशुराम सहóबाहु को ढ़ूंढ़ने निकल पड़े। तत्पश्चात भगवान परशुराम ने अपनी योगशक्ति से पिता महर्षि जमदग्नि व माता रेणुका को जीवित कर दिया। भगवान परशुराम ने महेन्द्रपर्वत  पर लौटने से पूर्व मां रेणुका को वचन दिया कि वह प्रतिवर्ष कार्तिक मास की दशमी को डेढ़ दिन के लिए रेणुकाजी में आया करेंगें] तभी से लेकर आजतक इस पावन तीर्थ पर प्रतिवर्ष रेणुका मेला बड़ी धूमधाम से यहां मनाया जाता है। मेले में प्रदेश व क्षेत्र की संस्कृति को देखने व जानने का सुअवसर भी मिलता है। पहले यह मेला राजस्तरीय था परन्तु वर्ष 2011 में प्रदेश सरकार ने इसे अन्र्तराष्ट्रीय स्तर का बना दिया है। जबकि इससे पहले प्रदेश सरकार ने वर्ष 1984 में इस क्षेत्र के बेहतर विकास हेतू श्री रेणुकाजी विकास बोर्ड की स्थापना भी की है। यहां ठहरने हेतू हिमाचल पर्यटन विकास निगम का होटल] श्री रेणुका जी विकास बोर्ड का विश्राम गृह] वन विभाग का विश्राम गृह प्रमुख है। इसके अलावा यहां से लगभग 02 कि0मी0 की दूरी पर ददाहू में लोक निर्माण विभाग व पंचायती राज विभाग के विश्राम गृह के साथ-साथ कई निजी होटल भी हैं।

यह स्थान वर्ष भर सडक मार्ग से जुडा हुआ है। यहां से जिला मुख्यालय नाहन लगभग 40 कि0मी0] पांवटा साहिब 60 कि0मी0] चण्डीगढ 100 कि0मी0 तथा देहरादून लगभग 105 कि0मी0 दूर है।



(साभार: आपका फैसला 22 अक्तूबर, 2014, दिव्य हिमाचल 6 नवम्बर, 2014 को संपादकीय पृष्ठ तथा गिरिराज 12 नवम्बर में प्रकाशित)

Monday, 15 September 2014

सात वर्षीय नीरज के लिए राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम लेकर आया नया जीवन

हिमाचल प्रदेश के जिला सिरमौर के पांवटा साहिब विकास खंड की ग्राम पंचायत भाटांवाली के गांव किशनपुरा के प्राथमिक स्कूल की दूसरी कक्षा में पढ़ रहे सात वर्षीय नीरज के लिए राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम किसी नए जीवन से कम साबित नहीं हुआ है। पिछले कुछ महीनों से बुखार, पेट दर्द इत्यादि से परेशान जब इस बच्चे की राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत लगे शिविर में जांच की गई तो चिकित्सकों ने बीमारी की जटिलता को देखते हुए जांच हेतु पीजीआई चंडीगढ़ रैफर किया गया। जब जांच रिपोर्ट आई तो नीरज में थैलेसीमिया बीमारी के लक्षण पाए गए हैं। 
जब इस बारे नीरज की माता श्रीमति सरोज से बातचीत की गई तो उनका कहना है कि उनके बेटे को पिछले कुछ समय से बुखार, पेट दर्द इत्यादि की समस्या रहने लगी तथा स्थानीय स्तर पर डाॅक्टरों को दिखाया जाता रहा लेकिन जब राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत बच्चे की पीजीआई चंडीगढ़ में जांच हुई तो इस गंभीर बीमारी का पता चला है। तीन भाई बहनों में सबसे छोटे नीरज के पिता का देहान्त पिछले दिनों हो गया था ऐसे में इस गरीब परिवार के लिए इस संकट की घडी में राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम सहारा बनकर आया है। श्रीमति सरोज ने बताया कि अब बच्चे का ईलाज पीजीआई चंडीगढ़ से हो रहा है तथा ईलाज हेतु अब तक लगभग 25 हजार रूपये की आर्थिक सहायता भी मिल चुकी है। 
कमोबेश कुछ इसी तरह की कहानी ग्राम पंचायत शिवपुर की 17 वर्षीय प्रदीप कौर की है। 12वीं कक्षा में पढ रही प्रदीप का चैकअप किया गया तो चिकित्सकों ने बीमारी की जटिलता को देखते हुए जांच हेतु पीजीआई चंडीगढ़ रैफर किया तथा जांच रिपोर्ट में इस बच्ची को ब्लड शुगर व आंख में जन्मजात काॅर्निया की बीमारी सामने आई है। इसी तरह भजौन पंचायत की 16 वर्षीय प्रीती व 13 वर्षीय आंचल में भी आंख में जन्मजात काॅर्निया जबकि कोलर पंचायत से 13 वर्षीय अभिषेक को ब्लड कैंसर पाया गया है। यही नहीं जहां टोका नगला की 16 वर्षीय शबनम की एक आंख में भेंगापन पाया गया तो वहीं कफोटा क्षेत्र के पवार गांव की रेणु की आंखों के साथ-2 नाक, कान व गले में भी समस्या सामने आई है। इस तरह की बीमारियों से ग्रस्त बच्चों का ईलाज पीजीआई चंडीगढ व अन्य बडे अस्पतालों में चल रहा है तथा बच्चों को स्वस्थ जीवन की एक नई रोशनी मिली है।  
क्या कहते हैं आंकडेः
ऐसे में यदि जिला सिरमौर के पांवटा विकास खंड के आंकडों का विशलेषण करें तो वर्ष 2013-14 के दौरान कुल 71 क्लस्टर कैंप ( 193 प्राथमिक स्कूल, 41 माध्यमिक, 19 हाई स्कूल तथा 29 वरिष्ठ माध्यमिक स्कूल शामिल हैं ) लगाए गए जिसमें 17067 बच्चों (जिसमें 8980 लडके व 8087 लडकियां शामिल है) की स्वास्थय जांच की गई है। इस जांच के दौरान खून की कमी (अनीमिया) के 1491 (जिसमें 846 लडके व 645 लडकियां), चमडी रोग के 682 (जिसमें 355 लडके व 327 लडकियां), दांतों के 1806 (जिसमें 889 लडके व 917 लडकियां), ईएनटी के 647 (जिसमें 327 लडके व 320 लडकियां), आंखों के 2314 (जिसमें 1234 लडके व 1080 लडकियां ), हृदय रोग के 7 (जिसमें 03 लडके व 04 लडकियां), मानसिक व शारीरिक अक्षमता के 40 (जिसमें 21 लडके व 19 लडकिया शामिल हैं) मामले सामने आए। इस दौरान 107 बच्चों को बीमारी की जटिलता को देखते हुए पीजीआई चंडीगढ़ सहित अन्य बडे अस्पतालों को रैफर किया गया है। 
क्या कहते हैं अधिकारीः
खण्ड चिकित्सा अधिकारी, राजपुर डाॅ0केके पराशर का कहना है कि राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के अन्तर्गत स्कूली बच्चों की स्वास्थ्य जांच की जा रही है तथा आवश्यकता पडने पर बच्चों को मुफत दवाईयां व अन्य उपचार भी दिया जा रहा है। उन्होने बताया कि इस कार्यक्रम के अन्तर्गत गंभीर बीमारी के मामलों जैसे हृदय रोग, शल्य चिकित्सा, अक्षमता इत्यादि पाए जाने पर बच्चों को ईलाज हेतु बडे अस्पतालों में भेजा जा रहा है तथा इस कार्यक्रम के अन्तर्गत बच्चों को ईलाज हेतु आर्थिक सहायता भी मुहैया करवाई जा रही है।
 ऐसे में राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत लग रहे चिकित्सा जांच शिविरों में बच्चों की कई बीमारियां सामने आ रही हंै। ऐसे में जहां यह कार्यक्रम प्रदेश के ग्रामीण व दूरदराज क्षेत्रों में शिक्षा ग्रहण कर रहे प्रदेश के लाखों बच्चों के लिए वरदान साबित हो रहा है तो वहीं ईलाज के दौरान आर्थिक सहायता भी मुहैया करवा रहा है।

Wednesday, 20 August 2014

सरकार की कल्याणकारी योजनाओं से सशक्त हो रही महिलाएं


महिला एवं बाल विकास विभाग की बाल विकास परियोजना पांवटा साहिब में सरकार द्वारा चलाई जा रही विभिन्न कल्याणकारी योजनाआें व कार्यक्रमों को 430 आंगनबाड़ी केन्द्रों व दो मिनी आंगनबाड़ी केन्द्रों के माघ्यम से क्षेत्र के ग्रामीण व दूरदराज क्षेत्रों में रह रहे लोगों तक पहुंचाया जा रहा है। जिसमें बेटी है अनमोल, माता शबरी महिला सशक्तिकरण योजना, मुख्यमंत्री कन्यादान योजना, मदर टेरेसा असहाय मातृ सम्बल योजना, महिला स्वयं रोजगार योजना व विधवा पुर्नविवाह योजना इत्यादि प्रमुख है।
इन योजनाआें से संबंधित जानकारी देते हुए बाल विकास परियोजना अधिकारी श्री मदन चौहान ने बताया कि वर्ष 2013-14 के दौरान पांवटा विकास खण्ड़ में बेटी है अनमोल योजना के तहत 86 मामले में कुल 1,92,000 रुपये की राशि व्यय की गई है। ज्ञात रहे प्रदेश सरकार ने बालिका के महत्व के प्रति जागरुकता लाने के लिए बेटी है अनमोल योजना को दो घटकों में चलाया जा रहा है। पहले घटक के अन्र्तगत गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) गुजर बसर करने वाले प्रत्येक परिवार में जन्मी लडक़ी के जन्म पर (केवल दो लड़कियों तक सीमित) 10000/- रुपये ड़ाकघर में जमा किए जाते हैं, जो 18 वर्ष की आयु पर ब्याज सहित दिए जाते हैं। इसी तरह दूसरे घटक के तहत लडक़ी के स्कूल जाने पर सरकार द्वारा छात्रवृति प्रदान की जाती है। 
इसी तरह माता शबरी महिला सशक्तिकरण योजना के तहत पांवटा विकास खण्ड़ में अनुसूचित जाति के गरीब परिवारों की 125 महिलाआें को जिनके पास अपना गैस कनेक्शन नहीं था को लाभान्वित किया गया। जिस पर प्रदेश सरकार ने प्रति गैस कनेक्शन पर 1300 रुपये उपदान के हिसाब से कुल 1,62,500 रुपये खर्च किए हैं। इस योजना का मुख्य उदेश्य गरीब ग्रामीण महिलाआें को ईंधन की लकड़ी को एकत्रित करने के कार्यों से राहत दिलवाना तथा पर्यावरण में सुधार लाना प्रमुख है। मुख्यमंत्री कन्यादान योजना के अन्तर्गत पांवटा विकास खण्ड़ में वर्ष 2013-14 के दौरान 12 मामलों में तीन लाख रुपये की सहायता राशि प्रदान की है। इस योजना के तहत गरीब परिवारों की बेहसारा महिलाएं/लड़कियां जिनकी वार्षिक आय 35,000 रुपये से अधिक न हो को शादी हेतू 25000/-रुपये की वित्तीय सहायता सरकार द्वारा प्रदान की जाती है। जबकि मदर टेरेसा असहाय मातृ सम्बल योजना के अन्र्तगत नि:सहाय महिलाआें के बच्चे या अनाथ बच्चे जिनकी आयु 18 वर्ष से कम हो, के पालन पोषण हेतू 1500 रुपये प्रति बच्चा प्रति वर्ष (केवल दो बच्चों तक) वितीय सहायता मिलती है। इसी योजना के तहत पांवटा विकास खण्ड़ में 326 ऐसे मामलों में 16,64,079 रुपये की राशि पिछले वर्ष के दौरान उपलब्ध करवाई गई है।
 समाज में महिलाआें को आत्मनिर्भर बनाने के लिए महिला स्वयं रोजगार योजना के तहत सालाना 35000 रुपये या इससे कम आय वाली महिलाआें को अपना काम धन्धा शुरु करने के लिए 2500 रुपये प्रति महिला आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है। पांवटा विकास खण्ड़ में पिछले वितीय वर्ष के दौरान 11 एेसे मामलों में 27,500 रुपये की राशि खर्च की गई है। यही नहीं समाज में विधवाआें को पुर्नविवाह हेतू प्रेरित करने के लिए विधवा पुर्नविवाह योजना लागू की है। इस योजना के तहत पांवटा विकास खण्ड़ में वर्ष 2013-14 के दौरान एेसे एक मामलों में 50,000 रुपये की प्रोत्साहन राशि प्रदेश सरकार ने मुहैया करवाई है। 
बहरहाल पांवटा विकास खण्ड़ में समेकित बाल विकास परियोजना कार्यालय के माध्यम से विभिन्न योजनाआें व कार्यक्रमों के तहत 561 मामलों में लगभग 24 लाख रुपये की राशि प्रदेश सरकार ने महिलाआें के उत्थान व कल्याण हेतू वर्ष 2013-14 के दौरान खर्च की है।