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Friday, 11 June 2021

कोरोना ने छीनी फाइव स्टार होटल की नौकरी, घर आकर शुरू कर दिया स्वरोजगार

जोगिन्दर नगर के कुठेहड़ा निवासी लवली ने बेकरी का काम शुरू कर हौंसलों को दी नई उड़ान

12वीं तक की शिक्षा हासिल कर ली, घर की आर्थिक सेहत ऐसी नहीं कि आगे पढ़ा जा सके। दिलो दिमाग पर परिवार की आर्थिकी को मजबूत बनाने का एक दबाव। ऐसी परिस्थिति में आगे की पढ़ाई का सपना त्याग कर रोजगार की तलाश में घर छोड़ना ही बेहतर समझा। इन विकट परिस्थितियों में 17 वर्ष की आयु में नौकरी की तलाश में घर छोड़ दिया और पहुंच गए शिमला। वर्ष 2012 में शिमला की एक कैंटीन के मैस से रोजगार का सफर शुरू करते हुए जिंदगी के अनेक उतार-चढ़ाव व अनुभव लेते हुए वर्ष 2018 में देश की नामी फाइव स्टार होटल कंपनी ऑबराय होटल से जुडक़र आगरा पहुंच गए। लेकिन यहां भी मानो कोरोना महामारी की नजर उनकी नौकरी को लग गई तथा वर्ष 2020 में लगे लॉकडाउन के कारण जून में उनकी यह नौकरी भी जाती रही।
यह कहानी है जोगिन्दर नगर की ग्राम पंचायत कुठेहड़ा के गांव रोपी पंजालतर के 26 वर्षीय लवली की। लवली ने अपनी इस छोटी सी जिंदगी में जीवन का एक ऐसा सफर तय कर लिया है कि वे अब रोजगार की तलाश में इधर-उधर भटकने के बजाए स्वरोजगार से न केवल अपनी जिंदगी को बेहतर बनाने में जुट गए हैं बल्कि दूसरों को रोजगार प्रदान करने की स्थिति में भी पहुंच रहे हैं।
हंसमुख व आत्मविश्वास से लबरेज 26 वर्षीय लवली से बातचीत की तो उन्होने बताया कि जून, 2020 में वैश्विक महामारी कोरोना के चलते फाइव स्टार होटल ओबेरॉय आगरा की नौकरी चली गई। ऐसे में मजबूरी में घर वापिस आना पड़ा। प्रतिमाह 22 से 25 हजार रूपये कमाने वाला व्यक्ति अब बेरोजगार हो गया। लेकिन ऐसे में थोड़ी हिम्मत जुटाकर एवं अपने अनुभव को आगे रखकर स्थानीय स्तर पर ही स्वरोजगार शुरू करने का निर्णय लिया। अगस्त, 2020 को जोगिन्दर नगर कस्बे के नजदीक मच्छयाल नामक स्थान पर बेकरी उत्पाद तैयार करने का फैसला कर लिया। यहां के मौसम एवं परिस्थितियों के तहत प्राकृतिक तौर पर उन्हे बेकरी का काम करने में मुश्किलों का सामना करना पड़ा। इस बीच मशीनों के माध्यम से इसे आगे बढ़ाने का फैसला कर लिया तथा धीरे-धीरे जरूरत के अनुसार मशीनरी का विस्तार करते रहे। वर्तमान में केक, पेस्ट्री, पिज़्ज़ा, बिस्कुट, स्वीस रोल इत्यादि बेकरी उत्पाद तैयार कर लोगों की मांग पर उपलब्ध करवाते हैं।
उनका कहना है कि फाइव स्टार होटल की तर्ज पर यहां के लोगों को उच्च गुणवत्ता युक्त बेकरी उत्पाद उपलब्ध करवाना उनका मूल उद्देश्य है ताकि स्वाद के साथ-साथ लोगों की सेहत भी बनी रहे। उनका कहना है कि आज वे इतना कमा ले रहे हैं कि उन्हे फाइव स्टार होटल की नौकरी जाने का रंज नहीं है। इस बीच अपनी बेकरी में एक अन्य व्यक्ति को भी अपनी सहायता के लिए रोजगार पर रख लिया है।
अब तक का कैसा रहा है 26 वर्षीय लवली का संघर्ष
जब उनके अब तक के जीवन में हुए संघर्ष बारे जानना चाहा तो उन्होने बताया कि वर्ष 2012 में शिमला स्थित आईजीएमसी कॉलेज कैंटीन से उनका रोजगार का सफर शुरू हुआ। जीवन में कुछ बेहतर करने की चाहत में वे चंडीगढ़ पहुंच गए तथा वहां पर एक वर्ष तक गोल्डन टयूलिप में काम किया। इसके बाद बेकरी प्रोडक्ट्स को ही अपनी विशेषज्ञता बनाते हुए वे राजस्थान के उदयपुर पहुंच गये तथा यहां पर एक-एक वर्ष के लिए प्रसिद्ध होटल कंपनी ललित व लीला में काम किया। इसके बाद वे 6 माह के लिए बंगलुरू चले गए तथा वहां के प्रसिद्ध होटल मेरियॉट में काम किया। बाद में दो बार के असफल प्रयास के वाबजूद तीसरे प्रयास में उनका चयन देश की नामी फाइव स्टार होटल कंपनी ओबेरॉय में हो गया तथा वर्ष 2018 में वे आगरा पहुंच गये।
क्या है प्रदेश के युवाओं को संदेश:
लवली का प्रदेश के युवाओं को यही संदेश है कि कोई भी कार्य छोटा या बड़ा नहीं होता है तथा काम करने में शर्म नहीं करनी चाहिए। लग्र, विश्वास व हिम्मत के साथ आगे बढ़ा जाए तो जीवन में कुछ भी पाना नामुमकिन नहीं है। उनका कहना है कि नौकरी के बजाए वे स्वरोजगार के माध्यम से न केवल अच्छा कमा सकते हैं बल्कि इससे उन्हे आत्म संतुष्टि भी मिलती है। साथ ही आगे बढ़ने के लिए उनके पास असीमित अवसर मौजूद होते हैं। बस सही समय पर सही लक्ष्य को केन्द्रित करते हुए पूरे समर्पण व मेहनत के साथ आगे बढ़ने की जरूरत है।










Saturday, 15 May 2021

वैश्विक महामारी कोविड-19 में हारतीं मानवीय संवेदनाएं

वैश्विक महामारी कोविड 19 के इस कठिन समय में अब मानवीय संवदेनाएं न केवल हारती हुई नजर आ रही हैं बल्कि कभी ठोस रिश्ते-नातों का वास्ता देकर अपने होनेे का दंभ भरने वाले कहीं दूर तक नजर नहीं आ रहे हैं। इस महामारी की दूसरी लहर के चंद दिनों में ही हमारे वास्तविक मानवीय चेहरे को न केवल नंगा कर दिया है बल्कि इसे स्वार्थ पर केंद्रित हो चुके अमानवीय मूल्यों के नीचे दफन भी कर दिया है। प्रतिदिन देश व प्रदेश के कई हिस्सों से इस महामारी के दौर में अमानवीय कुकृत्यों की न केवल खबरें देखने व सुनने को मिल रहीं हैं बल्कि उन्हे देखकर दिल भी दहल रहा है।

सच कहूं तो कोविड 19 महामारी ने मनुष्य के भीतर छिपे उस वास्तविक चेहरे को उजागर करके रख दिया है, जिसे हम आधुनिकता की इस झूठी चकाचौंध में आलीशान मकानों, चमचमाती मंहगी गाडियों एवं ऊंचे रूतबे के पीछे छिपाने का असफल प्रयास कर रहे हैं। ऐसे में अब यह प्रश्न खड़ा हो रहा है कि आखिर हम कैसा समाज बना रहे हैं? क्या यही है अब तक की हमारी तरक्की या उन्नति? या फिर झूठी चकाचौंध के आगे हमने इन्सानियत को कहीं खो दिया है? खैर कारण कुछ भी हो सकते हैं लेकिन पिछले कुछ दिनों से कोविड 19 महामारी के चलते घटित हो रही अमानवीय घटनाओं ने न केवल हमारे अमानवीय चेहरे को उजागर कर दिया है बल्कि हमारे द्वारा ओढ़े झूठे, मतलबी व मौकापरस्ती के चोले का भी सच सामने ला दिया है।
महामारी के इस दौर में हमारे चारों को आए दिन घटित हो रही इन्सान के अमानवीय चेहरे की घटनाएं हमें झकझोर कर रख दे रही हैं। कहीं पर परिवार ही अपने मृत सदस्य का संस्कार करने से भागता हुआ नजर आ रहा है तो कहीं वह बेटा अपने मृत मां-बाप का अंतिम संस्कार करने से मना कर रहा है, जिसने उसे न जाने कितने कष्ट सहकर पाला-पोशा बल्कि उसे इस तथाकथित समाज का एक काबिल इन्सान भी बनाया। यही नहीं कहीं पर पत्नी, तो कहीं पर बेटी तो कहीं पर लाचार व असहाय को चुके मां-बाप अपनों के अंतिम संस्कार की समाज से भीख मांगते नजर आ रहे हैं। लेकिन बेदर्द समाज का न केवल दिल पसीज रहा है बल्कि इस संकट की घड़ी में भी हम अंतिम संस्कार की गुहार केवल सरकार व प्रशासन से ही करते नजर आ रहे हैं।
इतना ही नहीं हमने आधुनिक इन्सान का अमानवीय चेहरा बाजारों, सडक़ों, घरों की गलियों व सामाजिक समारोहों में भी हारते हुए देखा है, जहां नियम व कानूनों को धत्ता बताकर कभी ऊंचे रूतबे तो कभी ऊंची पहुंच की धमक के आगे मानवता का कत्ल सरेआम होते रहा है। यही नहीं व्यवस्था में थोड़ी कमियां या थोड़ी देरी होने पर हम पूरी व्यवस्था को धराशयी करने का असफल प्रयास करते हुए भी नजर आए। इस संकट भरे दौर में हमारे शिक्षित होने का अर्थ भी बाखूबी हमें समझा दिया है। हमारी प्रकृति हमें चीखो पुकार के साथ चिल्ला-चिल्ला कर कह रही है कि आखिर कहां वो रिश्ते नाते जिनके बिना हमारे परिवार का एक छोटा सा कार्य या कारज तक सम्पन्न नहीं होता था? कहां है वो पड़ोस व समाज जिसकी दुहाई दे-दे कर हम थकते नजर नहीं आते थे?
सच कहूं तो हमारे आस पास इस महामारी के दौर में घटित हुई कई ऐसी दिल पसीज कर देने वाली घटनाओं के आगे हमारा मानवीय चेहरा हारते हुए नजर आया है। हकीकत तो यह है कि हमारी आंखों के आगे जिंदगी हारती रही लेकिन हम व्यवस्था को कोसते हुए कभी वायरल वीडियो बनाने में मशगूल रहे तो कभी दुष्प्रचार करने में। यही नहीं मुश्किल की इस घड़ी में हारती जिंदगी ऑक्सीजन सिलेंडर की भीख मांगती नजर आई लेकिन हम मुनाफाखोरी से धन कमाने के अवसर तलाशते फिरते रहे। हमें यहां यह नहीं भूलना चाहिए कि ये व्यवस्था, समाज व परिवार हमारा ही बनाया हुआ है और इसमें हुई चूक भी हमारी ही है। बस फर्क इतना है कि मैं व मेरा केन्द्रित इस वर्तमान मानवीय चेहरे को अब हम व हमारे पर केन्द्रित होना होगा। इस महामारी ने ये भी समझा दिया है कि हम सामाजिक, आर्थिक एवं सुविधाओं के तौर पर कितने की सशक्त क्यों न हो, लेकिन ऐसी प्राकृतिक आपदाएं व घटनाएं सबको तहस नहस करके रख देती हैं जिसमें न तो हमारा रूतबा न ही हमारा धन-बल काम आता है बल्कि हमारे द्वारा निर्मित उच्च मानवीय मूल्य एवं संवेदनशील समाज ही हमें सहारा दे सकता है।
दूसरी ओर हकीकत तो यह है कि कोरोना महामारी के इस मुश्किल दौर में हमारे इस झूठे सामाजिक ताने बाने का भी फर्दाफाश हो गया है। अपने पराय होने का वास्तविक अर्थ को बड़े प्रयोगात्मक तरीके से प्रकृति ने हमें समझा दिया है। अगर यूं कहूं कि आज मानवीय मूल्यों, आदर्शों व रिश्तों की नई परिभाषा लिखी जा रही है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होनी चाहिए।
ऐसे में अब समय आ गया है कि हमें स्वार्थ की हांडी में पकते उन झूठे रिश्तों, नातों व समाज को ढ़ोना है या फिर वास्तविकता के धरातल में उस मानवीय चेहरे का पोषण करना है जो हमें जीवन मूल्यों की हकीकत से रू-ब-रू करवा रहा है। अब ये फैसला आपका है कि आप कैसा परिवार, समाज व देश बनाना चाहते हैं।
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