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Friday, 11 June 2021

कोरोना ने छीनी फाइव स्टार होटल की नौकरी, घर आकर शुरू कर दिया स्वरोजगार

जोगिन्दर नगर के कुठेहड़ा निवासी लवली ने बेकरी का काम शुरू कर हौंसलों को दी नई उड़ान

12वीं तक की शिक्षा हासिल कर ली, घर की आर्थिक सेहत ऐसी नहीं कि आगे पढ़ा जा सके। दिलो दिमाग पर परिवार की आर्थिकी को मजबूत बनाने का एक दबाव। ऐसी परिस्थिति में आगे की पढ़ाई का सपना त्याग कर रोजगार की तलाश में घर छोड़ना ही बेहतर समझा। इन विकट परिस्थितियों में 17 वर्ष की आयु में नौकरी की तलाश में घर छोड़ दिया और पहुंच गए शिमला। वर्ष 2012 में शिमला की एक कैंटीन के मैस से रोजगार का सफर शुरू करते हुए जिंदगी के अनेक उतार-चढ़ाव व अनुभव लेते हुए वर्ष 2018 में देश की नामी फाइव स्टार होटल कंपनी ऑबराय होटल से जुडक़र आगरा पहुंच गए। लेकिन यहां भी मानो कोरोना महामारी की नजर उनकी नौकरी को लग गई तथा वर्ष 2020 में लगे लॉकडाउन के कारण जून में उनकी यह नौकरी भी जाती रही।
यह कहानी है जोगिन्दर नगर की ग्राम पंचायत कुठेहड़ा के गांव रोपी पंजालतर के 26 वर्षीय लवली की। लवली ने अपनी इस छोटी सी जिंदगी में जीवन का एक ऐसा सफर तय कर लिया है कि वे अब रोजगार की तलाश में इधर-उधर भटकने के बजाए स्वरोजगार से न केवल अपनी जिंदगी को बेहतर बनाने में जुट गए हैं बल्कि दूसरों को रोजगार प्रदान करने की स्थिति में भी पहुंच रहे हैं।
हंसमुख व आत्मविश्वास से लबरेज 26 वर्षीय लवली से बातचीत की तो उन्होने बताया कि जून, 2020 में वैश्विक महामारी कोरोना के चलते फाइव स्टार होटल ओबेरॉय आगरा की नौकरी चली गई। ऐसे में मजबूरी में घर वापिस आना पड़ा। प्रतिमाह 22 से 25 हजार रूपये कमाने वाला व्यक्ति अब बेरोजगार हो गया। लेकिन ऐसे में थोड़ी हिम्मत जुटाकर एवं अपने अनुभव को आगे रखकर स्थानीय स्तर पर ही स्वरोजगार शुरू करने का निर्णय लिया। अगस्त, 2020 को जोगिन्दर नगर कस्बे के नजदीक मच्छयाल नामक स्थान पर बेकरी उत्पाद तैयार करने का फैसला कर लिया। यहां के मौसम एवं परिस्थितियों के तहत प्राकृतिक तौर पर उन्हे बेकरी का काम करने में मुश्किलों का सामना करना पड़ा। इस बीच मशीनों के माध्यम से इसे आगे बढ़ाने का फैसला कर लिया तथा धीरे-धीरे जरूरत के अनुसार मशीनरी का विस्तार करते रहे। वर्तमान में केक, पेस्ट्री, पिज़्ज़ा, बिस्कुट, स्वीस रोल इत्यादि बेकरी उत्पाद तैयार कर लोगों की मांग पर उपलब्ध करवाते हैं।
उनका कहना है कि फाइव स्टार होटल की तर्ज पर यहां के लोगों को उच्च गुणवत्ता युक्त बेकरी उत्पाद उपलब्ध करवाना उनका मूल उद्देश्य है ताकि स्वाद के साथ-साथ लोगों की सेहत भी बनी रहे। उनका कहना है कि आज वे इतना कमा ले रहे हैं कि उन्हे फाइव स्टार होटल की नौकरी जाने का रंज नहीं है। इस बीच अपनी बेकरी में एक अन्य व्यक्ति को भी अपनी सहायता के लिए रोजगार पर रख लिया है।
अब तक का कैसा रहा है 26 वर्षीय लवली का संघर्ष
जब उनके अब तक के जीवन में हुए संघर्ष बारे जानना चाहा तो उन्होने बताया कि वर्ष 2012 में शिमला स्थित आईजीएमसी कॉलेज कैंटीन से उनका रोजगार का सफर शुरू हुआ। जीवन में कुछ बेहतर करने की चाहत में वे चंडीगढ़ पहुंच गए तथा वहां पर एक वर्ष तक गोल्डन टयूलिप में काम किया। इसके बाद बेकरी प्रोडक्ट्स को ही अपनी विशेषज्ञता बनाते हुए वे राजस्थान के उदयपुर पहुंच गये तथा यहां पर एक-एक वर्ष के लिए प्रसिद्ध होटल कंपनी ललित व लीला में काम किया। इसके बाद वे 6 माह के लिए बंगलुरू चले गए तथा वहां के प्रसिद्ध होटल मेरियॉट में काम किया। बाद में दो बार के असफल प्रयास के वाबजूद तीसरे प्रयास में उनका चयन देश की नामी फाइव स्टार होटल कंपनी ओबेरॉय में हो गया तथा वर्ष 2018 में वे आगरा पहुंच गये।
क्या है प्रदेश के युवाओं को संदेश:
लवली का प्रदेश के युवाओं को यही संदेश है कि कोई भी कार्य छोटा या बड़ा नहीं होता है तथा काम करने में शर्म नहीं करनी चाहिए। लग्र, विश्वास व हिम्मत के साथ आगे बढ़ा जाए तो जीवन में कुछ भी पाना नामुमकिन नहीं है। उनका कहना है कि नौकरी के बजाए वे स्वरोजगार के माध्यम से न केवल अच्छा कमा सकते हैं बल्कि इससे उन्हे आत्म संतुष्टि भी मिलती है। साथ ही आगे बढ़ने के लिए उनके पास असीमित अवसर मौजूद होते हैं। बस सही समय पर सही लक्ष्य को केन्द्रित करते हुए पूरे समर्पण व मेहनत के साथ आगे बढ़ने की जरूरत है।










Saturday, 15 May 2021

वैश्विक महामारी कोविड-19 में हारतीं मानवीय संवेदनाएं

वैश्विक महामारी कोविड 19 के इस कठिन समय में अब मानवीय संवदेनाएं न केवल हारती हुई नजर आ रही हैं बल्कि कभी ठोस रिश्ते-नातों का वास्ता देकर अपने होनेे का दंभ भरने वाले कहीं दूर तक नजर नहीं आ रहे हैं। इस महामारी की दूसरी लहर के चंद दिनों में ही हमारे वास्तविक मानवीय चेहरे को न केवल नंगा कर दिया है बल्कि इसे स्वार्थ पर केंद्रित हो चुके अमानवीय मूल्यों के नीचे दफन भी कर दिया है। प्रतिदिन देश व प्रदेश के कई हिस्सों से इस महामारी के दौर में अमानवीय कुकृत्यों की न केवल खबरें देखने व सुनने को मिल रहीं हैं बल्कि उन्हे देखकर दिल भी दहल रहा है।

सच कहूं तो कोविड 19 महामारी ने मनुष्य के भीतर छिपे उस वास्तविक चेहरे को उजागर करके रख दिया है, जिसे हम आधुनिकता की इस झूठी चकाचौंध में आलीशान मकानों, चमचमाती मंहगी गाडियों एवं ऊंचे रूतबे के पीछे छिपाने का असफल प्रयास कर रहे हैं। ऐसे में अब यह प्रश्न खड़ा हो रहा है कि आखिर हम कैसा समाज बना रहे हैं? क्या यही है अब तक की हमारी तरक्की या उन्नति? या फिर झूठी चकाचौंध के आगे हमने इन्सानियत को कहीं खो दिया है? खैर कारण कुछ भी हो सकते हैं लेकिन पिछले कुछ दिनों से कोविड 19 महामारी के चलते घटित हो रही अमानवीय घटनाओं ने न केवल हमारे अमानवीय चेहरे को उजागर कर दिया है बल्कि हमारे द्वारा ओढ़े झूठे, मतलबी व मौकापरस्ती के चोले का भी सच सामने ला दिया है।
महामारी के इस दौर में हमारे चारों को आए दिन घटित हो रही इन्सान के अमानवीय चेहरे की घटनाएं हमें झकझोर कर रख दे रही हैं। कहीं पर परिवार ही अपने मृत सदस्य का संस्कार करने से भागता हुआ नजर आ रहा है तो कहीं वह बेटा अपने मृत मां-बाप का अंतिम संस्कार करने से मना कर रहा है, जिसने उसे न जाने कितने कष्ट सहकर पाला-पोशा बल्कि उसे इस तथाकथित समाज का एक काबिल इन्सान भी बनाया। यही नहीं कहीं पर पत्नी, तो कहीं पर बेटी तो कहीं पर लाचार व असहाय को चुके मां-बाप अपनों के अंतिम संस्कार की समाज से भीख मांगते नजर आ रहे हैं। लेकिन बेदर्द समाज का न केवल दिल पसीज रहा है बल्कि इस संकट की घड़ी में भी हम अंतिम संस्कार की गुहार केवल सरकार व प्रशासन से ही करते नजर आ रहे हैं।
इतना ही नहीं हमने आधुनिक इन्सान का अमानवीय चेहरा बाजारों, सडक़ों, घरों की गलियों व सामाजिक समारोहों में भी हारते हुए देखा है, जहां नियम व कानूनों को धत्ता बताकर कभी ऊंचे रूतबे तो कभी ऊंची पहुंच की धमक के आगे मानवता का कत्ल सरेआम होते रहा है। यही नहीं व्यवस्था में थोड़ी कमियां या थोड़ी देरी होने पर हम पूरी व्यवस्था को धराशयी करने का असफल प्रयास करते हुए भी नजर आए। इस संकट भरे दौर में हमारे शिक्षित होने का अर्थ भी बाखूबी हमें समझा दिया है। हमारी प्रकृति हमें चीखो पुकार के साथ चिल्ला-चिल्ला कर कह रही है कि आखिर कहां वो रिश्ते नाते जिनके बिना हमारे परिवार का एक छोटा सा कार्य या कारज तक सम्पन्न नहीं होता था? कहां है वो पड़ोस व समाज जिसकी दुहाई दे-दे कर हम थकते नजर नहीं आते थे?
सच कहूं तो हमारे आस पास इस महामारी के दौर में घटित हुई कई ऐसी दिल पसीज कर देने वाली घटनाओं के आगे हमारा मानवीय चेहरा हारते हुए नजर आया है। हकीकत तो यह है कि हमारी आंखों के आगे जिंदगी हारती रही लेकिन हम व्यवस्था को कोसते हुए कभी वायरल वीडियो बनाने में मशगूल रहे तो कभी दुष्प्रचार करने में। यही नहीं मुश्किल की इस घड़ी में हारती जिंदगी ऑक्सीजन सिलेंडर की भीख मांगती नजर आई लेकिन हम मुनाफाखोरी से धन कमाने के अवसर तलाशते फिरते रहे। हमें यहां यह नहीं भूलना चाहिए कि ये व्यवस्था, समाज व परिवार हमारा ही बनाया हुआ है और इसमें हुई चूक भी हमारी ही है। बस फर्क इतना है कि मैं व मेरा केन्द्रित इस वर्तमान मानवीय चेहरे को अब हम व हमारे पर केन्द्रित होना होगा। इस महामारी ने ये भी समझा दिया है कि हम सामाजिक, आर्थिक एवं सुविधाओं के तौर पर कितने की सशक्त क्यों न हो, लेकिन ऐसी प्राकृतिक आपदाएं व घटनाएं सबको तहस नहस करके रख देती हैं जिसमें न तो हमारा रूतबा न ही हमारा धन-बल काम आता है बल्कि हमारे द्वारा निर्मित उच्च मानवीय मूल्य एवं संवेदनशील समाज ही हमें सहारा दे सकता है।
दूसरी ओर हकीकत तो यह है कि कोरोना महामारी के इस मुश्किल दौर में हमारे इस झूठे सामाजिक ताने बाने का भी फर्दाफाश हो गया है। अपने पराय होने का वास्तविक अर्थ को बड़े प्रयोगात्मक तरीके से प्रकृति ने हमें समझा दिया है। अगर यूं कहूं कि आज मानवीय मूल्यों, आदर्शों व रिश्तों की नई परिभाषा लिखी जा रही है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होनी चाहिए।
ऐसे में अब समय आ गया है कि हमें स्वार्थ की हांडी में पकते उन झूठे रिश्तों, नातों व समाज को ढ़ोना है या फिर वास्तविकता के धरातल में उस मानवीय चेहरे का पोषण करना है जो हमें जीवन मूल्यों की हकीकत से रू-ब-रू करवा रहा है। अब ये फैसला आपका है कि आप कैसा परिवार, समाज व देश बनाना चाहते हैं।
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Wednesday, 21 April 2021

चौंतड़ा के देवराज भारती ने प्राकृतिक खेती से जुडक़र लिख डाली सफलता की कहानी

सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती करना बना अब फायदे का सौदा, 5 बीघा जमीन भी हुई जहरमुक्त

कहते हैं कि यदि दिल से कुछ कर गुजरने की तमन्ना हो तो न उम्र, न संसाधनों का अभाव, न ही जीवन में असफल होने का डर आगे बढऩे से रोक पाता है। बल्कि धुन के पक्के ऐसे लोग तमाम सुविधाओं व किंतु परन्तु को दर किनार कर कड़ी मेहनत के दम पर जहां निर्धारित लक्ष्य को आसानी से प्राप्त कर लेते हैं तो वहीं दूसरों के लिए प्रेरणास्त्रोत भी बन जाते हैं। ऐसी ही कुछ कहानी है मंडी जिला के चौंतड़ा विकास खंड के अंर्तगत ग्राम पंचायत पस्सल के गांव डमेहड़ के 72 वर्षीय प्रगतिशील किसान देव राज भारती की। जिन्होने मात्र तीन वर्षों की अथक मेहनत व प्रयास के दम पर सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती को अपनाकर सफलता की कहानी लिख डाली है। इनकी यह उपलब्धि आज पूरे जोगिन्दर नगर क्षेत्र ही नहीं बल्कि प्रदेश के लाखों किसानों के लिए प्रेरणास्त्रोत भी बन गई है। 

पेशे से भाषा अध्यापक रह चुके 72 वर्षीय देवराज भारती ने लगभग साढ़े पांच बीघा जमीन को सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती के तहत न केवल पूरी तरह से जहरमुक्त बना दिया है बल्कि उनके निरंतर प्रयासों से प्राकृतिक खेती अब फायदे का सौदा साबित होने लगी है। इस संबंध में देवराज भारती से चर्चा की तो उनका कहना है कि वर्ष 2018 में कृषि विभाग की आत्मा परियोजना के माध्यम से सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती को अपनाने का निर्णय लिया। शुरू में उन्हे कई दिक्कतों का सामना करना पड़ा लेकिन विभागीय अधिकारियों के निरंतर मार्गदर्शन एवं आगे बढऩे की हिम्मत ने आज उन्हे एक सफल किसान बना दिया है। उन्होने बताया कि प्राकृतिक खेती से जुडऩे को राजस्थान के गंगा नगर कस्बे से एक थार पारकर स्वदेशी नस्ल की गाय लेकर आए हैं जिस पर सरकार ने उन्हे 25 हजार रूपये का उपदान एवं पांच हजार रूपये टांस्पोर्टेशन चार्जेच दिये हैं। सिंचाई के लिए टयूबवैल स्थापित किया है। इनका कहना है कि जमीन में अब केंचुआ आ गया है तथा जमीन पूरी तरह से रसायनमुक्त हो चुकी है। 

साढ़े पांच क्विंटल मटर एवं 30 किलो धनिया तैयार कर बेचा, लगभग 12 हजार की हुई आमदन

देवराज भारती ने बताया कि इस वर्ष उन्होने लगभग एक बीघा जमीन में मटर व धनिया की खेती की जिससे लगभग साढ़े पांच क्विंटल मटर तथा 30 किलोग्राम हरा धनिया तैयार हुआ। जिससे लगभग 12 हजार रूपये की शुद्ध आमदन हुई है। इसके अलावा देसी किस्म की गेंहू की फसल भी लगभग तैयार है। साथ ही मस्सर व चना दालों की भी बिजाई की है जिनके परिणाम भी बेहतर आ रहे हैं। इसके अतिरिक्त खेतों में फूल गोभी, अरबी, मूली, आलू, अदरक इत्यादि की भी बिजाई कर रहे हैं जिनके परिणाम भी अच्छे आ रहे हैं। उन्होने बताया कि यह सब पूरी तरह देसी गाय के गोबर व गोमूत्र से तैयार घन जीवामृत, जीवमृत एवं बीजामृत के उपयोग से ही संभव हो पाया है तथा सभी तरह के उत्पाद पूरी तरह से प्राकृतिक तौर पर तैयार किये जा रहे हैं। 

इसके अलावा उन्होने संसाधन भंडार भी स्थापित किया है जहां से आसपास के किसान मामूली दरों पर प्राकृतिक तौर पर तैयार घनजीवामृत, जीवामृत एवं बीजामृत प्राप्त कर सकते हैं। संसाधन केंद्र से ही उन्हे लगभग 10 हजार रूपये की आय प्राप्त हो चुकी है। साथ ही बताया कि गाय शैड निर्माण को सरकार ने 8 हजार रूपये की आर्थिक मदद की है। प्राकृतिक खेती की व्यापक जानकारी लेने को वर्ष 2020 में हरियाणा के कुरूक्षेत्र स्थित गुरूकूलम में भी तीन दिन का प्रवास कर चुके हैं। उन्होने ज्यादा से ज्यादा किसानों से सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती से जुडऩे का आहवान किया ताकि जहां हमारी फसलों को जहरमुक्त बनाया जा सके तो वहीं खाद्यान्नों की गुणवत्ता भी बढ़ सके। इससे न केवल व्यक्ति शरीरिक व मानसिक तौर पर स्वस्थ रहेगा बल्कि गंभीर बीमारियों से बचाव होगा।  

तैयार फसल बेचने एवं देसी नस्ल की गाय को लेकर आ रही दिक्कतें, सरकार से मांगा उचित सहयोग 

बकौल देवराज भारती का कहना है कि प्राकृतिक तौर पर तैयार फल, सब्जियां व अन्न इत्यादि को बेचने के लिए किसानों को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। इस दिशा में सरकार कुछ ऐसे कदम उठाए जिससे न केवल उनके यह तैयार उत्पाद आसानी से बिक जाएं बल्कि लोगों को भी इनका लाभ मिल सके। इसके अलावा देसी नस्ल की गाय खरीदने में भी किसानों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है इस संबंध में भी सरकार उचित कदम उठाये ताकि किसानों को गुणवत्तायुक्त देसी गाय की आसानी से उपलब्धता हो सके।

क्या कहते हैं अधिकारी:

जब इस बारे आत्मा परियोजना के खंड तकनीकी प्रबंधक (बी.टी.एम.) चौंतड़ा सुनील कुमार से बातचीत की तो इनका कहना है कि वर्ष 2018 में देवराज भारती सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती के साथ जुड़े तथा वे अब एक सफल किसान बन चुके हैं। उन्होने बताया कि 66 किसानों से शुरूआत करते हुए वर्तमान में चौंतड़ा ब्लॉक के अंतर्गत लगभग 18 से 19 सौ किसानों को प्राकृतिक खेती से जोडऩे का प्रयास हुआ है। घनजीवामृत, जीवमृत एवं बीजामृत उपलब्ध करवाने के लिए 16 संसाधन भंडार स्थापित किये हैं जिनके माध्यम से किसान 5 रूपये किलो देसी गाय का गोबर, दो रूपये प्रति लीटर जीवामृत तथा गोमूत्र आठ रूपये प्रति लीटर की दर से प्राप्त कर सकते हैं। इसके अलावा देसी गाय खरीदने, गाय का शैड बनाने एवं प्लास्टिक का ड्रम खरीदने के लिए भी सरकार सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती को अपनाने के लिए किसानों को उपदान मुहैया करवा रही है।  



Friday, 12 March 2021

अवैज्ञानिक दोहन के कारण खतरे में है पौष्टिक तत्वों से भरपूर जंगली कंद 'तरड़ी'

 शिवरात्रि व होली पर्व में घरों में बड़े चाव के साथ पकाई जाती है तरड़ी की सब्जी

शिवरात्रि तथा होली पर्व के दौरान हमारे घरों में बड़े चाव के साथ परोसी जाने वाली जंगली कंद तरड़ी की महक बीते वक्त के साथ लगातार कम होती जा रही है। हमारे ग्रामीण परिवेश में रंगो के त्यौहार होली पर्व के वक्त लोग घर में आने वाले मेहमानों को देसी पकवानों के साथ तरड़ी की सब्जी को आमतौर पर परोसते हैं। लेकिन अवैज्ञानिक व अंधाधुंध दोहन के चलते अब पोष्टिक तत्वों से भरपूर यह जंगली कंदमूल तरड़ी लगातार हमारे भोजन से गायब होती जा रही है। हिमाचल प्रदेश में सर्दियों के मौसम में तरड़ी की सब्जी आम मिल जाती थी। बाजार में भी तरड़ी की महक देखने को मिलती थी, लेकिन अब बाजार में भी तरड़ी की आवक में कमी देखी जा रही है। ऐसे में प्राकृतिक तौर पर पाई जाने वाले इस जंगली कंद को न केवल व्यावसायिक तौर पर प्रोत्साहित करने की आवश्यकता महसूस हो रही है बल्कि इसके अवैज्ञानिक दोहन को लेकर भी जन जागरूकता लाने की जरूरत लग रही है।
तरड़ी नामक यह कंद खाने में स्वादिष्ट होने के साथ-साथ अति बलवर्धक व सेहत के लिए बहुत ही गुणकारी होता है। तरड़ी में बहुत ज्यादा मात्रा में जरूरी तत्वों के अलावा बिटामिन बी ग्रुप व फोस्फेट्स, कैल्शियम, जिंक, आयरन व क्रोमियम पाया जाता है। यह प्राकृतिक तौर पर पैदा होने वाला कंद तरड़ी नामक आहार मनुष्य के शरीर के लिए बहुत ही गुणकारी होता है। यह कंद पूरी तरह से जैविक होने के कारण बाजार में इसकी खासी मांग रहती है तथा दाम भी अच्छे मिल जाते हैं। वर्तमान में इसकी बाजार में औसत कीमत 150 से 200 रूपये प्रति किलो है।
तरड़ी नामक कंद मूल रूप से जंगल में प्राकृतिक तौर पर पैदा होता है। इसके पौधे बेलनुमा होते हैं तथा इस बेल के नीचे कंद के रूप में तरड़ी नामक कंद पाया जाता है। जिसे सब्जी या चाट बनाकर खाया जा सकता है। तरड़ी के बीज बेल पर ही लग कर बेल सूखने पर नीचे गिर जाते हैं। लेकिन इस जंगली कंद को किसान व्यावसायिक दृष्टि से तैयार करें तो उनके लिए आमदनी का एक अच्छा जरिया हो सकता है।
क्या कहते हैं अधिकारी
क्षेत्रीय निदेशक, क्षेत्रीय एवं सुगमता केंद्र उत्तर भारत, जोगिन्दर नगर डॉ. अरूण चंदन का कहना है कि जंगली कंद तरड़ी पौष्टिक तत्वों से भरपूर होता है। तरड़ी के औषधीय गुणों के कारण इसकी बाजार में अच्छी मांग रहती है। किसान तरड़ी को अपनी बेकार पड़ी जमीन या खेतों की मेड़ों में तैयार कर सकते हैं। तरड़ी नामक कंद हिमाचल प्रदेश सहित मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर इत्यादि राज्यों में भी पाया जाता है। दक्षिण भारत में यह बहुतायत में पाया जाता है लोग इसे खूब पसंद करते हैं।
उनका कहना है कि प्रदेश के किसान तरड़ी को व्यासायिक खेती के तौर पर अपनाते हैं तो यह उनकी आर्थिकी को आश्चर्यजनक रूप से मजबूती प्रदान कर सकता है। सबसे अहम बात यह है कि जंगली जानवर भी इसे नुक्सान नहीं पहुंचा पाते हैं।



Wednesday, 3 March 2021

कोरोना महामारी के कठिन दौर में पीएम स्वनिधि बनी रेहड़ी-फहड़ी विक्रेताओं का सहारा

जोगिन्दर नगर में पीएम स्ट्रीट वेंडर्स आत्मनिर्भर निधि के तहत 41 स्ट्रीट वेंडर्स लाभान्वित

जोगिन्दर नगर शहरी क्षेत्र में प्रधान मंत्री स्ट्रीट वेंडर्स आत्मनिर्भर निधि (पीएम स्वनिधि) के तहत 41 रेहड़ी-फहड़ी विक्रेताओं को लाभान्वित किया गया है। पीएम स्वनिधि के अंतर्गत इन लाभान्वित रेहड़ी-फहड़ी विक्रेताओं को आजीविका व रोजगार को पुन: पटरी पर लाने के लिए विभिन्न बैंकों के माध्यम से सरकार ने 10 हजार रूपये का लघु ब्याज सब्सिडी आधारित ऋण आवंटित किया है।

पीएम स्वनिधि के अंतर्गत ऋण प्राप्त करने वाले जोगिन्दर नगर शहर के रेहड़ी-फहड़ी विक्रेता साधु राम का कहना है कि वे जोगिन्दर नगर शहर के पुलिस थाना चौक में पिछले लगभग 13 वर्षों से फल व सब्जी की दुकान लगाते हैं जिसके माध्यम से उनका व परिवार का भरण पोषण होता है। उन्होने बताया कि पिछले वर्ष मार्च में कोरोना महामारी के कारण लगे लॉकडाउन से उनका यह रोजगार काफी प्रभावित हुआ। लेकिन इस बीच उन्हे पीएम स्ट्रीट वेंडर्स आत्मनिर्भर निधि बारे स्थानीय नगर परिषद के माध्यम से पता चला तथा उन्होने स्वयं को पीएम स्वनिधि के तहत पंजीकृत करवा लिया। उन्होने बताया कि पीएम स्वनिधि के तहत उन्हे 10 हजार रूपये का ऋण सस्ती व आसान दरों में कोरोबार को पुन: स्थापित करने को प्राप्त हुआ है। इसके लिए वे सरकार विशेषकर प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी का आभार व्यक्त करते हैं।

इसी तरह जोगिन्दर नगर शहर में ही बस स्टैंड के पास रेहड़ी लगाने वाले गोपाल सिंह, पुलिस थाना चौक में चाय की दुकान चलाने वाले धनी राम, रेलवे स्टेशन के पास चाट, बर्गर इत्यादि की रेहड़ी लगाने वाले राम भरोसे ने भी पीएम स्वनिधि के तहत 10 हजार रूपये का ऋण आसान दरों में उपलब्ध करवाने के लिए सरकार का आभार जताया है। इनका कहना है कि कोरोना महामारी के इस कठिन दौर में पीएम स्वनिधि उनके रोजगार को पुन: पटरी पर लाने में बड़ी सहायक सिद्ध हुई है तथा वे इस छोटी सी लेकिन बड़ी अहम रकम से वे अपने स्वरोजगार को आगे बढ़ाने में पुन: कामयाब हुए हैं। इसके लिए वे सरकार का धन्यवाद करते हैं।
क्या है प्रधान मंत्री स्ट्रीट वेंडर्स आत्मनिर्भर निधि (पीएम स्वनिधि) योजना
वैश्विक महामारी कोरोना वायरस (कोविड-19) के चलते लगे लॉकडाउन से शहरी क्षेत्रों में प्रभावित हुए रेहड़ी फहड़ी विक्रेताओं की आजीविका को पुन: शुरू करने के लिए केंद्र सरकार ने पीएम स्ट्रीट वेंडर्स आत्मनिर्भर निधि (पीएम स्वनिधि) योजना की शुरूआत की है। इसके माध्यम से शहरी क्षेत्रों के प्रभावित रेहड़ी-फहड़ी विक्रेताओं की आजीविका व रोजगार को पुन: पटरी पर लाने के लिए 10 हजार रूपये के एक लघु ब्याज सब्सिडी आधारित ऋण उपलब्ध करवाने का प्रावधान है। यह स्कीम 24 मार्च, 2020 को या इससे पूर्व शहरी क्षेत्रों में वेंडिग कर रहे सभी पथ विक्रेताओं के लिए उपलब्ध है, लेकिन पथ विक्रेता के पास स्थानीय शहरी निकाय द्वारा जारी पहचान पत्र होना या फिर सर्वेक्षण के दौरान उसे चिन्हित किया गया हो।
12 आसान किस्तों में मिलेगा 10 हजार का ऋण, ब्याज पर मिलेगी 7 प्रतिशत सब्सिड़ी
पीएम स्वनिधि योजना के तहत पथ विक्रेताओं को 12 आसान किस्तों में 10 हजार रूपये का ऋण अपनी विभिन्न गतिविधियों को चलाने के लिए दिया जा रहा है। जिसमें 7 प्रतिशत की दर से ब्याज सब्सिडी भी उपलब्ध है। इस योजना के तहत ऋण वापिसी की मासिक किस्त 746 रूपये से लेकर 927 रूपये तक रहेगी। साथ ही औसतन एक सौ रूपये प्रतिमाह कैशबैक प्रोत्साहन की सुविधा भी उपलब्ध है। इस 10 हजार रूपये के ऋण प्राप्ति के लिए कोई कोलेट्रल गारंटी नहीं रखी गई है। सबसे अहम बात यह है कि समय पर या जल्द ऋण वापसी करने वाले पथ विके्रता अगले ऋण के लिए भी पात्र होंगे। इसके अतिरिक्त इस योजना के तहत यदि पथ विक्रेता डिजिटल के माध्यम से लेन-देन करता है तो उसे प्रतिमाह ऋण वापिसी पर 50 रूपये कैशबैक की सुविधा भी दी गई है। सरकार इस योजना के माध्यम से 10 हजार रूपये के ऋण पर लाभार्थी को 1348 रूपये की ऋण सब्सिडी भी उपलब्ध करवा रही है जो अधिकत्तम 1600 रूपये तक हो सकती है।
क्या कहते हैं अधिकारी:
नगर परिषद जोगिन्दर नगर के कार्यकारी अधिकारी एवं उपमंडलाधिकारी (नागरिक) अमित मैहरा ने योजना की पुष्टि करते हुए कहा कि जोगिन्दर नगर शहरी निकाय क्षेत्र में प्रधान मंत्री स्ट्रीट वेंडर्स आत्मनिर्भर निधि (पीएम स्वनिधि) के तहत कुल 41 रेहड़ी-फहड़ी विक्रेता पंजीकृत हैं। जिनमें से 37 लाभार्थियों को 10-10 हजार रूपये का ऋण उपलब्ध करवाया जा चुका है, जबकि शेष बचे 4 लाभार्थियों को भी आवश्यक कागजात पूर्ण होने पर उन्हे भी जल्द लाभान्वित कर दिया जाएगा। इस तरह 37 लाभार्थियों को 3 लाख 70 हजार रूपये का ऋण बैंकों के माध्यम से उपलब्ध करवाया गया है।