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Friday, 4 April 2014

समृद्घ संस्कृति को संजोए है सिरमौर का गिरिपार क्षेत्र

हिमाचल प्रदेश जहां देवभूमि के नाम से विश्व विख्यात है तो वहीं यहां का प्राकृतिक सौंदर्य, शद्घ व शांत वातावरण तथा बर्फ से ढक़े पहाड़ बर्बस ही देशी व विदेशी पर्यटकों को अपनी ओर   आकर्षित करते है। इतना ही नहीं प्रदेश की देव संस्कृति के साथ-साथ यहां की लोक कलाएं व सामाजिक परम्पराएं आज भी देखने को मिल जाती है। जिन्हे हम न केवल मेलों, तीज-त्योहारों, विवाह उत्सवों व धार्मिक अनुष्ठानों के वक्त देख सकते हैं बल्कि हमारा खान-पान, वेशभूषा व रहन सहन में भी यह साफ झलकती है। आज भले ही बदलती दुनिया के साथ-साथ आधुनिकता का प्रभाव हमारी संस्कृति पर पड़ा हो परन्तु फिर भी प्रदेश में ऐसे अनेकों क्षेत्र हैं जहां लोगों ने अपनी पुरातन विरासत संस्कृति को संजोकर रखा है। ऐसे   में यदि सिरमौर जिला के गिरिपार क्षेत्र की बात करें तो हमें यहां की पुरातन संस्कृति, लोक कलाएं व सामाजिक परम्पराएं आज भी देखने को मिल जाती है।
सिरमौर जिला का यह गिरिपार क्षेत्र लगभग 1300 वर्ग कि0 मी0 के क्षेत्र में फैला है जो जिला के कुल क्षेत्रफल का लगभग 45 फीसदी है जबकि यहां की आबादी लगभग पौने तीन लाख के आसपास है जो जिला की कुल आबादी का लगभग 50 फीसदी है। इस गिरिपार क्षेत्र में तीन तहसीलें संगड़ाह, राजगढ़ व शिलाई तथा तीन ही उप तहसीलें रोनहाट, नौहराधार व कमरऊ शामिल है। इस क्षेत्र में निवास करने वाले लोगों को हाटी समुदाय के नाम से भी पुकारा जाता है। प्राप्त जानकारी के अनुसार किसी समय इस इलाके के लोग अपने खेतों से होने वाली पैदावार को पीठ पर ढ़ोकर आसपास के इलाकों में अस्थाई मंडी (हाट) लगाकर बेचते थे, जिसके कारण ये हाटी कहलाए। जानकारों के अनुसार सन 1833 से पहले यहां का गिरिपार और उतराखण्ड़ का जौनसार क्षेत्र भी सिरमौर रियासत का ही हिस्सा थे। गिरिपार के निवासी हाटी व जौनसार के लोग जौनसारा कहलाते थे। परन्तु अंग्रेजी हुकूमत ने जौनसार क्षेत्र को अपने नियन्त्रण में लेकर यूनाइटेड़ प्रोविंसज में शामिल कर लिया जो आजादी के बाद उतर प्रदेश और अब उतराखण्ड़ के नाम से अलग राज्य कहलाया। आज भले ही ये दोनों समुदाय अलग-2 राज्य में हो, परन्तु गिरिपार के हाटी और जौनसारा एक ही पूर्वज के वंशज माने जाते हैं। आज भी दोनों इलाकों के लोगों की संस्कृति, सामाजिक परम्पराएं, रहन सहन और तीज त्योहार एक जैसे ही हैं। लेकिन वर्ष 1967 में जौनसार क्षेत्र अनुसूचित जनजाति घोषित हो गया, परन्तु यहां का गिरिपार वंचित रह गया जिसको लेकर समय-2 पर आज भी इस क्षेत्र के लोग विभिन्न मंचों के माध्यम से मांग करते आ रहे है।
खैर गिरिपार क्षेत्र की कठिन भोगौलिक परिस्थितियां व कमजोर आर्थिक स्थिति से लोगों का जीवन कठिन दौर से गुजरा हो, परन्तु क्षेत्र के वाशिंदों की कड़ी मेहनत, अपनी संस्कृति व जमीन से विषेश जुड़ाव के चलते ही जहां यह क्षेत्र भी तरक्की की दिशा में अग्रसर हुआ है तो वहीं अपनी प्राचीन संस्कृति को संजोकर रखा है। जिसके प्रमाण यहां मनाये जाने वाले त्योहार बूढ़ी दीवाली, माघी व खोडा तथा अप्रैल व अगस्त माह में विशु व हरियालटी मेलों में देखने को मिलते हैं  । जहां इन मेलों में परम्परागत कुश्तियां व थोड़ाटी (ठोड़ा) नृत्य की झलक देखने को मिलती है तो वहीं आपसी मेलजोल, भाईचारे को भी बढ़ावा मिलता है। यही नहीं तीज-त्योहारों के दौरान पकने वाले पारम्परिक पकवान तेल पकी (उडद से भरी रोटी), सिडकू, शाकुली, चिडवा, मूडा, सतौले (असकली), पटवांडे इत्यादि आज भी बडे चाव के साथ पकाए व खाए जाते हैं। इस क्षेत्र में आज भी बहुपति प्रथा देखने को मिल जाती है। इस संबंध में जानकारों का कहना है कि क्षेत्र की कठिन भोगौलिक परिस्थितियां व कमजोर आर्थिक स्थिति के चलते यह प्रथा प्रचलित हुई थी, परन्तु बदलते परिवेश के साथ-2 यह प्रथा भी लगभग 90 फीसदी तक खत्म हो चुकी है। जिसका श्रेय क्षेत्र के लोगों में बढ़ता शिक्षा का प्रचार प्रसार व बेहतर होती आर्थिकी को जाता है। आज गिरिपार क्षेत्र के राजगढ़, संगडाह, शिलाई व हरिपुरधार में सरकारी कॉलेज खुले हैं, जिससे जहां क्षेत्र के युवाआें को घर के नजदीक ही उच्च शिक्षा हासिल करने के अवसर प्राप्त हुए हैं तो वहीं उच्च शिक्षा के माध्यम से आगे बढऩे के नए-नए सुअवसर भी मिल रहे हैं। यही नहीं आज भले ही भारतीय समाज में आधुनिकता के प्रभाव से संयुक्त परिवार तेजी से विघटित हुए हैं, परन्तु इस क्षेत्र में आज भी 40/50 लोगों का संयुक्त परिवार देखने को मिल जाते हैं।
यहां के लोगों का प्रमुख व्यवसाय खेती-बाडी है। जिसमें अदरक, मक्की व गेंहू यहां की मुख्य फसलें हैं परन्तु अब टमाटर, मटर, लहुसन, आलू इत्यादि की खेती भी लोगों ने अपना ली है। गांव-गांव पहुंचती बिजली, पानी व सडक़ें तथा खेती बाडी की आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल के साथ-साथ अब लोग पॉलीहाउस लगाकर व्यावसायिक खेती को अपनाकर अपनी आर्थिकी को ज्यादा मजबूत कर रहे हैं। जिसमें गिरिपार का राजगढ़  क्षेत्र पॉलीहाउस के माध्यम से फूलों की खेती व बागवानी के तहत आडू की पैदावार के लिये पूरे प्रदेश में ही नहीं देश में अग्रणी बन गया है।
ऐसे  में सिरमौर जिला का यह गिरिपार क्षेत्र (हाटी समुदाय) विकट परिस्थितियों के वाबजूद भी जहां अपनी संस्कृति व परंपराओं   को संजोए है तो वहीं शिक्षित होकर तेजी से आगे बढ़ रहा है।  


(साभार: हिमाचल दिस वीक 10 दिसम्बर, 2011, दैनिक आपका फैसला 20 दिसम्बर, 2011 को संपादकीय पृष्ठ में प्रकाशित) 

सिरमौर के ट्रांसगिरि क्षेत्र में खर्चीली परम्पराओं से बाहर निकलने की पहल

हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिला का गिरिपार (ट्रांसगिरी) क्षेत्र लगभग 1300 वर्ग कि0 मी0 के क्षेत्र में फैला है जो जिला के कुल क्षेत्रफल का लगभग 50 फीसदी है जबकि यहां की आबादी लगभग तीन लाख के आसपास है जो जिला की कुल आबादी का लगभग 55 फीसदी है। जानकारी के अनुसार इस क्षेत्र की 125 पंचायतों में 43812 परिवार रहते हैं। प्रशासनिक दृष्टि से गिरिपार क्षेत्र में तीन तहसीलें संगड़ाह, राजगढ़ व शिलाई तथा तीन ही उप तहसीलें रोनहाट, नौहराधार व कमरऊ शामिल है। 
इस क्षेत्र में निवास करने वाले लोगों को हाटी समुदाय के नाम से भी पुकारा जाता है। प्राप्त जानकारी के अनुसार किसी समय इस इलाके के लोग अपने खेतों से होने वाली पैदावार को पीठ पर ढ़ोकर आसपास के इलाकों में अस्थाई मंडी (हाट) लगाकर बेचते थे, जिसके कारण ये हाटी कहलाए। जानकारों के अनुसार सन 1833 से पहले यहां का गिरिपार और उतराखण्ड़ का जौनसार क्षेत्र भी सिरमौर रियासत का ही हिस्सा थे। गिरिपार के निवासी हाटी व जौनसार के लोग जौनसारा कहलाते थे। परन्तु अंग्रेजी हुकूमत ने जौनसार क्षेत्र को अपने नियन्त्रण में लेकर यूनाइटेड़ प्रोविंसज में शामिल कर लिया जो आजादी के बाद उतर प्रदेश और अब उतराखण्ड़ के नाम से अलग राज्य कहलाया। आज भले ही ये दोनों समुदाय अलग-2 राज्य में हो, परन्तु गिरिपार के हाटी और जौनसारा एक ही पूर्वज के वंशज माने जाते हैं। आज भी दोनों इलाकों के लोगों की संस्कृति, सामाजिक परम्पराएं, रहन सहन और तीज त्योहार एक जैसे ही हैं। लेकिन वर्ष 1967 में जौनसार क्षेत्र अनुसूचित जनजाति घोषित हो गया, परन्तु यहां का गिरिपार वंचित रह गया जिसको लेकर समय-2 पर आज भी इस क्षेत्र के लोग विभिन्न मंचों के माध्यम से मांग करते आ रहे है।
खैर गिरिपार क्षेत्र की कठिन भोगौलिक परिस्थितियां व कमजोर आर्थिक स्थिति से लोगों का जीवन कठिन दौर से गुजरा हो, परन्तु क्षेत्र के वाशिंदों की कड़ी मेहनत, अपनी संस्कृति व जमीन से विशेष जुड़ाव के चलते ही जहां यह क्षेत्र भी तरक्की की दिशा में भी अग्रसर हुआ है तो वहीं अपनी प्राचीन संस्कृति को संजोकर रखा है। जिसके प्रमाण यहां मनाये जाने वाले त्यौहार बूढ़ी दीवाली, माघी व खोड़ा तथा अप्रैल व अगस्त माह में विशु व हरियालटी मेलों में देखने को मिलते हंै। जहां इन मेलों में परम्परागत कुश्तियां व थोड़ाटी (ठोड़ा) नृत्य की झलक देखने को मिलती है तो वहीं आपसी मेलजोल, भाईचारे को भी बढ़ावा मिलता है। यही नहीं तीज-त्योहारों के दौरान पकने वाले पारम्परिक पकवान तेल पकी (उडद से भरी रोटी), सिडकू, शाकुली, चिडवा, मूडा, सतौले (असकली), पटवांडे इत्यादि आज भी बडे चाव के साथ पकाए व खाए जाते हैं। इस क्षेत्र में भी बहुपति प्रथा भी प्रचलित थी परन्तु इस संबंध में जानकारों का कहना है कि क्षेत्र की कठिन भोगौलिक परिस्थितियां व कमजोर आर्थिक स्थिति के चलते यह प्रथा प्रचलित हुई थी, परन्तु बदलते परिवेश के साथ-2 यह प्रथा भी लगभग 95 फीसदी तक खत्म हो चुकी है। जिसका श्रेय क्षेत्र के लोगों में बढ़ता शिक्षा का प्रचार प्रसार व बेहतर होती आर्थिकी को जाता है। आज गिरिपार क्षेत्र के राजगढ़, संगडाह, शिलाई व हरिपुरधार में सरकारी काॅलेज खुले हैं, जिससे जहां क्षेत्र के युवाओं को घर के नजदीक ही उच्च शिक्षा हासिल करने के अवसर प्राप्त हुए हैं तो वहीं उच्च शिक्षा के माध्यम से आगे बढ़ने के नए-नए सुअवसर भी मिल रहे हैं।
परन्तु इन सब परिवर्तनों के वाबजूद आज भी गिरिपार क्षेत्र में कुछ ऐसी प्रथाएं प्रचलित हैं, जो बदलते परिवेश के साथ न केवल मेल खा रहीं है बल्कि स्थानीय वाशिंदों के लिए आर्थिक बोझ का कारण भी बन रही हैं। इन्ही प्रथाओं में सुधार लाने के लिए हाटी कल्याण कर्मचारी समिति जिला सिरमौर ने पहल की है। जिसके लिए इस समिति ने बकायदा के एक विशन डाक्यूमेंट जारी किया है जिसमें इस क्षेत्र में सदियों से चली आ रही परम्पराओं व प्रथाओं में व्यापक प्रचार-प्रसार कर समय के साथ बदलाव लाना है।
समिति द्वारा जारी विशन डाक्यूमेंट के तहत शादी समारोह जो 4-5 दिन तक चलता है तथा बकरे काटे जाने व देशी घी परोसे जाने के कई रिकाॅर्ड दर्ज हैं। जिससे नवदम्पति की शुरुआत न केवल भारी कर्ज से होती है बल्कि परिवार की आर्थिकी भी अस्त व्यस्त हो जाती है। समिति का विशन डाक्यूमेंट के तहत कहना है कि प्रतिवर्ष शादी समारोहों पर ही लगभग साढे बारह करोड रुपया खर्च हो जाता है। ऐसे में समिति ने लोगों से आहवान किया है कि जहां शादी के खर्चे को कम करने के लिए केवल एक धाम ही दी जाए तो वहीं बारातियों व अतिथियों की संख्या सीमित रखने के साथ-2 मामा धाम व सार्वजनिक तौर पर शराब परोसने पर प्रतिबंध लगाना है, साथ ही पोलटोज (गैरनू-फैरनू), पेरिऊॅंका, पोरशा प्रथा पर भी प्रतिबंध लगाना है। इसके अतिरिक्त शहरी बैंडबाजों, डीजे इत्यादि की जगह पहाडी लोकगीतों, नृत्यों व रासा नाटी इत्यादि के पारम्परिक कार्यक्रमों पर बल दिया जाना चाहिए।
जिला के गिरिपार क्षेत्र में प्रतिवर्ष 11 जनवरी को मनाए जाने वाले भातीयौज पर ही लगभग 35 से 40 करोड़ रुपये व्यय हो जाते हैं। परम्परा के अनुसार इस आयोजन के लिए प्रत्येक परिवार में एक बकरा काटा जाता है जिससे परिवार पर अनावश्यक आर्थिक बोझ पडता है। इस संबंध में समिति का सुझाव है कि पुरातन समय में जहां यहां प्राकृतिक वातावरण भिन्न था तो वहीं प्रोटीनयुक्त भोजन की उपलब्धता भी नहीं थी। साथ ही बकरी पालन यहां के लोगों का प्रमुख व्यवसाय था, जिसके कारण इसकी उपलब्धता आसानी से हो जाती थी। लेकिन आज परिस्थियां एक दम विपरित हो गई हैं तथा लोगों को इस परम्परा को निभाने के लिए दूसरे क्षेत्रों से बकरे भारी भरकम राशि खर्च कर लाने पडते हैं। ऐसे में इस प्रथा को भी बदले जाने की आवश्यकता है ताकि गरीब परिवारों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ को कम किया जा सके। इसी तरह क्षेत्र के परिवार में किसी सदस्य की मत्यु होने पर शोक प्रकट करने का तरीका भी बहुत डरावना है। जिसे भी वक्त के साथ-2 बदले जाने की आवश्यकता है। इतना ही नहीं समिति ने इस क्षेत्र के युवाओं में नशे की बढती प्रवृति से भी छुटकारा दिलाने के लिए समाज के सभी वर्गों विशेषकर महिलाओं व अध्यापकों से आहवान किया है। साथ ही पहाडी लोक गायन में नशे को प्रोत्साहित करने वाले गाने न गाएं जाएं तथा युवाओं को इस सामाजिक बुराई के खिलाफ जागृत किए जाने पर बल दिया है।
साथ ही समिति ने नये रिवाज शुरु किये जाने पर भी बल दिया है, जिसमें ग्रामीण स्वच्छता अपनाने, कमजोर होती कार्य संस्कृति को बढावा देना तथा बच्चों में शिक्षा के प्रति जागरुक करना शामिल है। इस संबंध में समिति का मानना है कि आज भी इस क्षेत्र के एक तिहाई यानि की लगभग 15हजार घरों में शौचालय की सुविधा नहीं है। साथ ही इस क्षेत्र के युवाओं व बच्चों में पढाई व प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रति रुझान की बहुत कमी है तथा कार्य के प्रति विमुख होती नई पीढ़ी के कारण आज गांवों में जहां खेतीवाडी खत्म होती जा रही है तो वहीं आज गांव के लोगों की फल, सब्जियों, अनाज, घी, दूध इत्यादि के लिए शहरों पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। इसके अतिरिक्त समिति ने इस समाज की विलुप्त होती पहाडी बोली, लोक संस्कृति, आपसी भाईचारा, सयुंक्त परिवार प्रथा, बोआरा (हेला-धाम ) प्रथा, परम्परागत न्याय प्रणाली, खुमली यानि की दहेज प्रथा का न होना इत्यादि को कायम रखने पर भी बल दिया है।
ऐसे में हम कह सकते हैं कि हाटी कल्याण कर्मचारी समिति जिला सिरमौर द्वारा ट्रांसगिरी क्षेत्र को जहां विभिन्न सामाजिक बुराईयों व खर्चीली परम्पराओं से मुक्त कर यहां के समाज को बदलते परिवेश के साथ आर्थिक, सामाजिक व शैक्षिक दृष्टि से सशक्त बनाना है तो वहीं यहां की प्राचीन संस्कृति, लोक कलाओं व पहाडी बोली को भी जीवन्त रखने की एक बेहतरीन पहल है।


 (साभार: दिव्य हिमाचल 26 नवम्बर, 2014 को संपादकीय पृष्ठ में प्रकाशित)

Tuesday, 22 October 2013

श्री साईं स्वयं सहायता समूह की महिलाएं लिख रही हैं सफलता की कहानी

जिला सिरमौर के विकास खंड पांवटा साहिब की ग्राम पंचायत पुरुवाला के कांशीपुर गांव की दस महिलाएं स्वयं सहायता समूह बनाकर आर्थिक व सामाजिक तौर पर सशक्त हो रही हैं। यह महिलाएं न केवल अपनी मेहनत व लगन से अपनी सफलता की कहानी स्वयं लिख रही हैं बल्कि हमारे समाज की अन्य महिलाओं के लिए भी प्रेरणा स्त्रोत बनकर खडी हुई हैं। इन महिलाओं द्वारा पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ-साथ कुछ हटकर करने की चाहत ने ही इन्हे आज अन्य महिलाओं के मुकाबले एक अलग पहचान मिल रही है।
जुलाई, 2012 में समूह की ही कुछ महिलाओं के अथक प्रयास के चलते स्वर्ण जयन्ती ग्राम स्वरोजगार योजना के अन्र्तगत खंड विकास कार्यालय पांवटा साहिब के सहयोग से श्री साईं स्वयं सहायता समूह का गठन किया गया। इस समूह ने सबसे पहले यूको बैंक की शाखा बद्रीपुर पांवटा साहिब में खाता खोला तथा प्रतिमाह 100 रुपये प्रति सदस्य बचत की शुरुआत की। आज यह महिलाएं काफी धनराशि बतौर बचत इक्टठा कर चुकी हैं। लेकिन इनके इस प्रयास को एक नई मंजिल तब मिली जब यूको-आरसेटी ने डीआरडीए जिला सिरमौर के सौजन्य से इन्हे मार्च 2013 में मिठाई के डिब्बे बनाने के लिए पांच दिन का प्रशिक्षण मिला। इसके बाद विभाग ने इन्हे अपना स्वयं का काम शुरु करने के लिए दस हजार रुपये की आर्थिक सहायता राशि मुहैया करवाई। आज इन महिलाओं ने मात्र 6-7 महीनों की मेहनत से ही जहां लगभग 30 हजार मिठाई के डिब्बे बनाकर लगभग 30-35 हजार रुपये का मुनाफा कमा लिया है तो वहीं अपनी मेहनत से समाज में अपनी एक अलग पहचान भी बना रही हैं।
बडे ही आत्मविश्वास से लबरेज इस समूह की प्रधान श्रीमति शीला देवी से बातचीत की तो उनका कहना है कि समूह की सभी सदस्य प्रतिदिन दो से पांच बजे तक मिठाई के डिब्बे बनाने का कार्य करती हैं। जबकि विशेष त्योहारों जैसे रक्षा बंधन, दशहरा, ईद, दिवाली इत्यादि के मौके पर दुकानदारों की अतिरिक्त मांग को पूरा करने के लिए अतिरिक्त समय लगाकर इस कार्य को पूरा करती हैं। साथ ही जानकारी दी कि अकेले रक्षा बंधन के पर्व के दौरान ही उन्होने दस हजार से ज्यादा डिब्बे बनाए हैं। समूह की सचिव श्रीमति ममता देवी का कहना है कि समूह की सभी सदस्य अपने घर के रोजमर्रा के कामकाज, खेतीवाडी, पशुपालन इत्यादि के कार्य निपटाने के बाद ही जो खाली समय बचता है उसी में ही वह यह डिब्बे बनाने का कार्य करती हैं। उनका यह भी कहना है कि यह कार्य करते हुए न केवल आत्मनिर्भरता व स्वावलंबन का एहसास हो रहा है बल्कि इस मंहगाई के दौर में परिवार की आर्थिकी हो मजबूत बनाने में भी सफल हो पा रही हैं।

इसी संबंध में इनका कहना है कि समूह की सभी सदस्य मिठाई के डिब्बे बनाने के लिए कच्चामाल बाजार से खरीदने से लेकर तैयार माल की सप्लाई तक के कार्य वह स्वयं ही करती हैं। साथ ही इनका कहना है कि यदि सरकार उनके इस तैयार माल के लिए मॉर्केटिंग की कुछ व्यवस्था कर दे तो वह इससे भी बेहतर कार्य कर सकती हैं। साथ उनकी सरकार से मांग है कि यदि उन्हे सरकार डिब्बे तैयार करने के लिए मशीन खरीदने के लिए कम ब्याजदर पर ऋण मुहैया करवाए तो उनका समूह जहां अच्छी गुणवता वाले मिठाई के डिब्बे तैयार कर पाएगा तो वहीं बाजार में भी उनके तैयार माल की डिमांड बढऩे के साथ-साथ आमदन में भी बढौतरी होगी। 

क्या कहते हैं अधिकारी:
इस संबंध में खंड विकास अधिकारी पांवटा साहिब श्री सतपाल सिंह राणा का कहना है कि पांवटा विकास खंड में वर्ष 2012-13 के दौरान स्वर्ण जयन्ती ग्राम स्वरोजगार योजना के तहत कुल 138 एेसे महिला स्वयं सहायता समूहों का गठन किया गया है। जिसमें से 20 समूहों को बैंकों से जोडकर लगभग 72 लाख रुपये का ऋण विभिन्न गतिविधियों को चलाने के लिए मुहैया करवाया गया है। जबकि 10 समूहों को अपनी छोटी मोटी गतिविधियों को चलाने के लिए दस-दस हजार रुपये का रिवोलविंग फंड भी मुहैया करवाया है। साथ ही जानकारी दी कि स्वयं सहायता समूहों के लिए समय-समय पर प्रशिक्षण शिविर भी लगाए जाते हैं जिसके माध्यम से समूूहों को बचत करना, कैश बुक मैंटेन करना, इंटरलोनिंग इत्यादि की जानकारी दी जाती है। साथ ही गरीब परिवारों से संबंध रखने वाली महिलाआें व युवतियों को यूको आरसेटी के माध्यम से भी स्वरोजगार से जुडे विषयों पर प्रशिक्षण दिया जाता है। 
(साभार: हिमाचल दस्तक 21 अक्तूबर, आपका फैसला, 20 अक्तूबर, हिमाचल दिस वीक 9 नवम्बर, हिंदुस्तान टाईम्स 25 नवम्बर तथा हिमप्रस्थ अंक नवम्बर, 2013 में प्रकाशित)