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Thursday, 26 February 2026

जसवाणी के रिखी राम बांस से निर्मित उत्पादों से कर रहे जीवन निर्वाह

 73 वर्ष की आयु में भी पारंपरिक बांस के उत्पादों को प्रतिदिन करते हैं तैयार

लेकिन बाजार में प्लास्टिक की दस्तक से पारंपरिक बांस उत्पादों की घटी है मांग


जिला बिलासपुर की तहसील घुमारवीं के गांव जसवाणी निवासी 73 वर्षीय रिखी राम आज भी हाथों की मेहनत और पारंपरिक हुनर के बल पर जीवन निर्वाह कर रहे हैं। लेकिन बदलते वक्त के साथ उनके चेहरे की झुर्रियों में एक चिंता साफ दिखाई दे रही है कि पीढ़ियों से चली आ रही बांस और लकड़ी के शिल्प की परंपरा अब धीरे-धीरे समाप्ति की कगार पर पहुंच चुकी है।

बेहद हंसमुख स्वभाव के धनी रिखी राम बताते हैं कि जीवन के शुरुआती लगभग 15 वर्ष पढ़ाई में लगाए, लेकिन आठवीं कक्षा में अंग्रेजी विषय में फेल होने के कारण स्कूल छोड़ दिया। पास के गांव भदरोग में लगभग 10-12 वर्षों तक लकड़ी की कारीगरी का काम सीखा। कठिन परिश्रम और लगन से काष्ठकला में महारत हासिल की। समय के साथ वह अकेले ही रोजगार की तलाश में हिमाचल के विभिन्न क्षेत्रों जिनमें जिला शिमला, सिरमौर आदि शामिल है में जाकर लकड़ी का कार्य किया। उनका कहना है कि प्रदेश के पहाड़ी इलाकों में लकड़ी के मकान, दरवाजे-खिड़कियां और अन्य पारंपरिक निर्माण कार्यों में उनकी कारीगरी की काफी मांग रहती थी।
लेकिन दुर्भाग्यवश लगभग 10 वर्ष पूर्व जसवाणी में मकान का काम करते समय हाथ में गंभीर चोट आई और हड्डियां टूट गईं। इस घटना के बाद भारी लकड़ी का कार्य छोड़ना पड़ा। ऐसे में जीवन यापन का संकट सामने था, लेकिन हार नहीं मानी। बांस से टोकरी, खारे और छडोलू (पारंपरिक बांस के बर्तन) बनाने का कार्य शुरू किया। लकड़ी के मुकाबले यह काम अपेक्षाकृत हल्का था और गांव में इसकी मांग भी थी।

रिखी राम कहते हैं कि कुछ वर्षों तक सब कुछ ठीक-ठाक चलता रहा, लेकिन फिर बाजार की बदलती तस्वीर ने उनकी मेहनत पर पानी फेर दिया। वर्तमान में लोग प्लास्टिक से निर्मित सामान की ओर अधिक आकर्षित हो रहे हैं। बाजार में सस्ता और टिकाऊ विकल्प मिलने से पारंपरिक बांस उत्पादों की मांग अब काफी कम हो गई है।
उनका कहना है कि कभी हर घर में बांस की टोकरी और खारे का उपयोग होता था, लेकिन आज सिर्फ खास मौकों तक ही सीमित हो गया है। रिखी राम कहते हैं कि पहले कच्चा माल (बांस) आसानी से आसपास के गांव में मिल जाता था, लेकिन अब बांस मिलना भी मुश्किल हो गया है। कच्चा माल (बांस) की तलाश में अब उनके जैसे कारीगरों को गांव-गांव भटकना पड़ता है तथा बहुत कम मात्रा में यह उपलब्ध हो पाता है। ऐसे में सिर्फ कच्चे माल की कमी ही नहीं, बल्कि तेजी से बदलती जीवनशैली भी इस परंपरा के लिए खतरा बन गई है।

रिखी राम की सबसे बड़ी चिंता यह है कि नई पीढ़ी इस काम से दूर भाग रही है। युवा इसे मेहनत वाला और कम आमदनी वाला पेशा मानते हैं। आधुनिक शिक्षा और नौकरी की दौड़ में पारंपरिक कारीगरी व शिल्पकारी को महत्व नहीं मिल पा रहा है। हालांकि, रिखी राम ने इस उम्मीद के साथ बेटे को यह हुनर सिखाया है कि वह इस परंपरा को आगे बढ़ाएगा। लेकिन वह मानते हैं कि केवल कुछेक लोगों के प्रयास मात्र से यह कला अब लंबे वक्त तक जीवित नहीं रह सकती है।
यह कहानी सिर्फ रिखी राम की नहीं, बल्कि उन सैकड़ों पारंपरिक कारीगरों और शिल्पकारों की भी है जिनकी कला अब बाजारवाद और आधुनिकता की आंधी में कहीं विलुप्त होती जा रही है। ऐसे में समाज ने मिलकर ऐसे कारीगरों को प्रोत्साहन, कच्चे माल की उपलब्धता और बाजार तक पहुंच सुनिश्चित नहीं की, तो बांस और लकड़ी की यह पारंपरिक कारीगरी कहीं इतिहास के पन्नों में दफन होकर न रह जाए।

क्या है कारीगरों और शिल्पकारों के लिए सरकारी सहायता एवं योजना :

सरकार ने पारंपरिक कारीगरों और शिल्पकारों की सहायता के लिए विश्वकर्मा योजना चलाई है। इस योजना के माध्यम से जहां टूल किट खरीदने के लिए 15 हजार रुपये का अनुदान दिया जाता है तो वहीं सस्ती दरों पर ऋण की सुविधा भी प्रदान की जा रही है। इसके अतिरिक्त पांच दिन का एडवांस प्रशिक्षण भी प्रदान किया जाता है। योजना के संबंध में अधिक जानकारी के लिए महाप्रबंधक जिला उद्योग केंद्र या अपने नजदीकी प्रसार अधिकारी (उद्योग) स्थित बीडीओ कार्यालय से संपर्क कर सकते हैं।
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Monday, 12 January 2026

अब सरकारी स्कूलों में भी पूरा हो रहा है अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा का सपना

 घुमारवीं के चुवाड़ी उच्च विद्यालय में बच्चों को अंग्रेजी माध्यम से मिल रही शिक्षा

स्मार्ट क्लासरूम, इंटरनेट, पुस्तकालय, कंप्यूटर लैब जैसी आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित है विद्यालय
हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा शिक्षा क्षेत्र में निरंतर किए जा रहे अभिनव प्रयासों का परिणाम है कि प्रदेश स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में गुणवत्ता की दृष्टि से देश के अग्रणी राज्यों की श्रेणी में शामिल हो चुका है। मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू के मार्गदर्शन में प्रदेश के स्कूली शिक्षा ढांचे में किए जा रहे नवीन प्रयासों के फलस्वरूप आज ग्रामीण एवं दूरदराज क्षेत्रों में न केवल बेहतर शिक्षा की लौ जगी है, बल्कि अब गरीब बच्चों का अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा प्राप्त करने का सपना भी साकार हो रहा है।
जिला बिलासपुर की बात करें तो घुमारवीं उपमंडल की ग्राम पंचायत दकड़ी स्थित राजकीय उच्च विद्यालय चुवाड़ी में ग्रामीण बच्चों को अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा उपलब्ध करवाई जा रही है। आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित इस विद्यालय में बच्चों को स्मार्ट क्लासरूम, आईटी लैब, आधुनिक पुस्तकालय, वाई-फाई सहित अनेक सुविधाएं उपलब्ध हैं। इसके साथ ही बच्चों को अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा ग्रहण करने का विकल्प भी प्रदान किया गया है। सरकार के इस महत्वपूर्ण कदम से न केवल बच्चों को अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाई का अवसर मिल रहा है, बल्कि उनके आत्मविश्वास में भी निरंतर वृद्धि हो रही है।
प्रदेश सरकार की इस पहल से अब अभिभावक अपने बच्चों को निजी विद्यालयों की महंगी फीस चुकाने के बजाय सरकारी विद्यालयों में पढ़ाना अधिक उपयुक्त समझ रहे हैं। इससे जहां एक ओर अभिभावकों का आर्थिक बोझ कम हुआ है, वहीं दूसरी ओर कम खर्च में बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के साथ-साथ आधुनिक सुविधाओं से युक्त गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त हो रही है।
इस संबंध में अभिभावक अनीता, अनु शर्मा एवं माला शर्मा का कहना है कि उनके बच्चे पिछले दो-तीन वर्षों से इसी विद्यालय में अध्ययनरत हैं। विद्यालय में स्मार्ट क्लासरूम, इंटरनेट, पुस्तकालय तथा खेलकूद की बेहतर अधोसंरचना उपलब्ध है और बच्चे अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। उनका कहना है कि निजी विद्यालयों की महंगी फीस से छुटकारा पाकर वे अपने बच्चों को इसी सरकारी विद्यालय में पढ़ा रहे हैं, जहां कम खर्च में निजी विद्यालयों जैसी सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं। सबसे अहम बात यह है कि बच्चे घर के समीप ही अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा प्राप्त कर पा रहे हैं।
अभिभावकों ने प्रदेश के सरकारी विद्यालयों में अंग्रेजी माध्यम की सुविधा उपलब्ध करवाने के लिए मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू का आभार व्यक्त करते हुए सरकार के इस निर्णय की सराहना की है। उनका कहना है कि इस पहल से गरीब, ग्रामीण एवं संसाधनों के अभाव में बेहतर शिक्षा से वंचित बच्चों के सपनों को नई दिशा मिली है।
विद्यालय में अध्ययनरत छात्र-छात्राएं तृषा, वैष्णवी, वूलनाथ, हर्षित, अलीशा, संध्या, नवीन एवं अंशुल का कहना है कि अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा प्राप्त करने की सुविधा से उनके आत्मविश्वास में वृद्धि हुई है।
विद्यालय की मुख्याध्यापिका भावना का कहना है कि बच्चों की वर्तमान आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए विद्यालय में हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा प्राप्त करने का विकल्प उपलब्ध है। विद्यालय पूरी तरह डिजिटल मोड पर कार्य कर रहा है, जहां स्मार्ट क्लासरूम, वाई-फाई, कंप्यूटर शिक्षा के साथ-साथ खेलकूद एवं अन्य गतिविधियों के लिए भी बेहतर आधारभूत ढांचा उपलब्ध है। इसके अतिरिक्त विद्यालय में अंग्रेजी संवाद कौशल (इंग्लिश स्पीकिंग) पाठ्यक्रम तथा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए भी विद्यार्थियों को प्रोत्साहित किया जाता है।
क्या कहते हैं मंत्री:
स्थानीय विधायक एवं प्रदेश सरकार में नगर एवं ग्राम नियोजन, आवास, तकनीकी शिक्षा, व्यावसायिक एवं औद्योगिक प्रशिक्षण मंत्री राजेश धर्माणी ने कहा कि प्रदेश सरकार ने सरकारी विद्यालयों में अंग्रेजी माध्यम का विकल्प उपलब्ध करवाकर अपनी एक महत्वपूर्ण गारंटी को पूरा किया है। इस निर्णय से अब ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों को भी घर के समीप ही सरकारी विद्यालयों में अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा प्राप्त करने की सुविधा मिल रही है।
उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार का उद्देश्य ग्रामीण एवं दूरदराज क्षेत्रों में रहने वाले बच्चों को घर के समीप गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध करवाना है। मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू के नेतृत्व में प्रदेश सरकार ने इस दिशा में कई अहम एवं ऐतिहासिक निर्णय लिए हैं, जिनमें अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा उपलब्ध करवाना भी शामिल है। DOP 12/01/2026
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